Sawan or Shravan 2019: प्रदोष व्रत 29 जुलाई को, बना शुभ संयोग
नई दिल्ली। श्रावण का महीना, सोमवार का दिन और प्रदोष व्रत... यह अत्यंत शुभ और दुर्लभ संयोग बन रहा है 29 जुलाई को। जी हां, श्रावण सोमवार के दिन प्रदोष व्रत का आना अपने आप में बहुत शुभ संयोग वाला दिन है। श्रावण माह, सोमवार का दिन और प्रदोष व्रत तीनों ही भगवान शिव को समर्पित और प्रिय हैं। इसलिए इस दिन भगवान शिव की पूजा करने का बहुत अधिक महत्व है। यह दुर्लभ संयोग कई वर्षों में एक बार आता है इसलिए यह दिन केवल शिव भक्तों के लिए ही नहीं बल्कि संपूर्ण मानव जाति के लिए खास दिन है। इस दिन प्रदोष का व्रत रखकर पूर्ण विधि-विधान से शिव परिवार का पूजन करने से शिव की कृपा प्राप्त होती है। प्रदोष व्रत त्रयोदशी तिथि को किया जाता है। इस व्रत के प्रभाव से व्यक्ति को अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता, उसके परिवार से बीमारियों का साया हमेशा के लिए हट जाता है और सुख, सौभाग्य, धन-धान्य से परिपूरित हो जाता है।

श्रावण के दोनों पक्षों में सोम प्रदोष का संयोग
इस बार का श्रावण माह इस मायने में भी बहुत खास है क्योंकि इस माह के कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष दोनों के प्रदोष व्रत के दिन सोमवार है। इसलिए दोनों ही पक्षों में सोम प्रदोष का शुभ संयोग बना है। पहला सोम प्रदोष 29 जुलाई को और दूसरा 12 अगस्त को आएगा।

सोम प्रदोष व्रत कथा
सोम प्रदोष व्रत की कथा के अनुसार किसी समय एक नगर में एक ब्राह्मणी रहती थी। उसके पति की मृत्यु हो गई थी और परिवार में आय का अन्य कोई साधन नहीं था। इसलिए जीवनयापन करने के लिए सुबह होते ही वह अपने छोटे से पुत्र के साथ भीख मांगने निकल पड़ती थी। भिक्षा मांगकर ही ब्राह्मणी स्वयं व पुत्र का पेट पालती थी। एक दिन ब्राह्मणी घर लौट रही थी तो उसे एक लड़का घायल अवस्था में कराहता हुआ मिला। ब्राह्मणी दयावश उसे अपने घर ले आई। वह लड़का विदर्भ का राजकुमार था। शत्रु सैनिकों ने उसके राज्य पर आक्रमण कर उसके पिता को बंदी बना लिया था और राज्य पर अपना अधिकार कर लिया था। इसलिए वह राजकुमार बचता हुआ मारा-मारा फिर रहा था। उसका कोई आश्रय नहीं था इसलिए वह ब्राह्मणी के घर ही रहने लगा।
अंशुमति नामक एक गंधर्व कन्या
एक दिन अंशुमति नामक एक गंधर्व कन्या ने राजकुमार को देखा और उस पर मोहित हो गई। अगले दिन अंशुमति अपने माता-पिता को राजकुमार से मिलाने लाई। उन्हें भी राजकुमार भा गया। कुछ दिनों बाद अंशुमति के माता-पिता को स्वप्न में भगवान शंकर ने आदेश दिया कि राजकुमार और अंशुमति का विवाह कर दिया जाए। उन्होंने वैसा ही किया। ब्राह्मणी प्रदोष व्रत करती थी। उसके व्रत के प्रभाव और गंधर्वराज की सेना की सहायता से राजकुमार ने विदर्भ से शत्रुओं को खदेड़ दिया और पिता के राज्य को पुन: प्राप्त कर आनंदपूर्वक रहने लगा। राजकुमार ने ब्राह्मण-पुत्र को अपना प्रधानमंत्री बनाया। ब्राह्मणी के प्रदोष व्रत के माहात्म्य से जैसे राजकुमार और ब्राह्मण-पुत्र के दिन फिरे, वैसे ही भगवान भोलेनाथ अपने सभी भक्तों को भी संकट से बाहर निकालते हैं।

प्रदोष व्रत की पूजा विधि
प्रदोष व्रत करने के लिए व्रती त्रयोदशी के दिन सूर्योदय पूर्व उठ जाए। नित्यकर्मों से निवृत होकर भगवान शंकर का ध्यान करे। पूरे दिन निराहार रहते हुए शिवजी का मानसिक ध्यान करता रहे। सूर्यास्त से एक घंटा पहले स्नान आदि कर स्वच्छ श्वेत वस्त्र धारण करे। पूजन स्थल को गंगाजल या स्वच्छ जल से शुद्ध करने के बाद गाय के गोबर से लीपकर मंडप तैयार करे। विभिन्न् रंगों और फूलों से रंगोली सजाएं। पूजा में बैठने के लिए कुशा के आसन का प्रयोग करें। अब उतर-पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठ जाएं और पहले गणेश पूजन फिर पंचोपचार या षोडशोपचार से शिव पूजन करें। पंचामृत या केवल शुद्ध जल से शिव महिम्नस्तोत्र, रूद्र पाठ, शिवाष्टक में से किसी एक का पाठ करते हुए अभिषेक करें। बिल्व पत्र, आंकड़े के फूल, धतूरा आदि अर्पित करें। दूध से बनी मिठाई का नैवेद्य लगाएं। प्रसाद वितरण करें
प्रदोष व्रत के लाभ
- प्रदोष व्रत से आयु और आरोग्य की प्राप्ति होती है।
- जो व्यक्ति वर्ष के सभी प्रदोष व्रत करता है उसकी धन संबंधी समस्या एक वर्ष के भीतर समाप्त हो जाती है।
- वैवाहिक जीवन में सुख शांति, दांपत्य जीवन में मधुरता के लिए यह व्रत अवश्य करना चाहिए।
- अविवाहित युवक-युवतियां यदि इच्छित जीवनसाथी की प्राप्ति के लिए व्रत करें तो उसकी कामना जरूर पूरी होती है।
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