Rath Yatra 2026: भगवान जगन्नाथ पड़े बीमार, 15 दिन तक चलेगा इलाज, क्या है अनासर प्रथा?

Rath Yatra 2026: सबको रोगमुक्त करने वाले भगवान जगन्नाथ आज से बीमार पड़ गए हैं, चौंक गए ना आप ये सोचकर कि हम क्या कह रहे हैं तो भाई बात एकदम सही है, दरअसल भगवान जगन्नाथ उनके बड़े भाई बलराम और बहन सुभद्रा को ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन शाही स्नान कराया गया जिसके बाद तीनों लोग जुकाम-बुखार से पीड़ित हो गए और इस कारण अब वो 15 दिनों तक भक्तों को दर्शन नहीं देंगे, इसी कारण 12वीं सदी का विश्वविख्यात पूरी मंदिर आज से दो हफ़्ते के लिए बंद रहेगा।

दरअसल ये एक प्रथा है, जिसे कि 'अनासर' कहा जाता है, ज्येष्ठ या स्नान पूर्णिमा के दिन जगन्नाथ मंदिर में भगवान भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा का 108 कलशों के जल से विशेष अभिषेक किया जाता है। मान्यता है कि इस स्नान के बाद भगवान अस्वस्थ हो जाते हैं। इसलिए उन्हें लगभग 15 दिनों तक आम श्रद्धालुओं के दर्शन से दूर रखा जाता है। इसी अवधि को अनासर प्रथा काल और इस परंपरा को 'अनासर रस्म' कहा जाता है।

Rath Yatra 2026

16 जुलाई को शुरू होगी जगन्‍नाथ रथ यात्रा

अब जगन्नाथ मंदिर के दरवाज़े रथ यात्रा से एक दिन पहले खुलेंगे, जो इस साल 16 जुलाई को है। रथ यात्रा से एक दिन पहले, नए रंग-रोगन वाली मूर्तियों को गर्भगृह में लोगों के दर्शन के लिए रखा जाता है। मंदिर की परंपरा के अनुसार, 'स्नान यात्रा' के बाद भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा को बुखार आ जाता है, इस यात्रा के दौरान उन्हें पवित्र जल के 108 घड़ों से स्नान कराया जाता है।

'एकांतवास में भगवान, शाही वैद्य करते हैं इलाज'

धार्मिक विद्वान पंडित सूर्यनारायण रथ शर्मा ने कहा, 'वे एकांतवास में चले जाते हैं और 'राज वैद्य' उनका इलाज करते हैं, चूंकि यह रस्म गुप्त होती है, इसलिए भक्तों को देवताओं के दर्शन करने की अनुमति नहीं होती है।'

भगवान को चढ़ते हैं फल,, पनीर और आयुर्वेदिक लड्डू

उन्होंने बताया कि 'इस दौरान देवताओं को उनका नियमित 'महाप्रसाद' नहीं चढ़ाया जाता है और उन्हें केवल फल, पनीर और आयुर्वेदिक 'लड्डू' ही दिए जाते हैं। देवताओं का इलाज इंसानों की तरह किया जाता है और 'अनासर' काल के एकांतवास के दौरान वे 'बीमारी' से ठीक हो जाते हैं। जब पुरी में ये देवता एकांतवास में होते हैं, तो भक्त पुरी से लगभग 25 किलोमीटर दूर ब्रह्मगिरि स्थित अलारनाथ मंदिर में दर्शन करते हैं।'

जगन्नाथ रथ यात्रा से जुड़ी 10 खास बातें

  • दुनिया की सबसे बड़ी रथ यात्रा: जगन्नाथ रथ यात्रा भारत के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में गिनी जाती है, जिसमें लाखों श्रद्धालु शामिल होते हैं।
  • तीन देवताओं की यात्रा: इस यात्रा में भगवान भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा तीन अलग-अलग रथों में विराजमान होकर निकलते हैं।
  • तीन रथ बनते हैं: परंपरा के अनुसार तीनों रथ हर वर्ष नई लकड़ी से तैयार किए जाते हैं। पुराने रथों का दोबारा उपयोग नहीं किया जाता।
  • रथों के नाम भी अलग: भगवान जगन्नाथ का रथ - नंदीघोष, बलभद्र का रथ - तालध्वज, सुभद्रा का रथ - दर्पदलन (देवदलन)
  • झाड़ू लगाने की परंपरा: रथ यात्रा शुरू होने से पहले छेरा पहरा रस्म में गजपति महाराजा सोने की झाड़ू से रथों के आसपास सफाई करते हैं। यह सभी के समान होने का संदेश देता है।
  • गुंडिचा मंदिर तक की यात्रा: रथ यात्रा जगन्नाथ मंदिर से शुरू होकर लगभग 3 किलोमीटर दूर गुंडिचा मंदिर तक जाती है, जहां भगवान कुछ दिनों तक विराजमान रहते हैं।
  • अनासर काल के बाद निकलती है यात्रा: स्नान पूर्णिमा के बाद भगवान लगभग 15 दिनों तक अनसर (अनासर) काल में रहते हैं। इसके बाद नवयौवन दर्शन होता है और फिर रथ यात्रा शुरू होती है।
  • रथ को खींचना शुभ माना जाता है: मान्यता है कि भगवान के रथ की रस्सी खींचने से पुण्य की प्राप्ति होती है और जीवन के कष्ट दूर होते हैं।
  • वापसी यात्रा को बहुदा यात्रा कहते हैं: गुंडिचा मंदिर में प्रवास के बाद भगवान वापस मुख्य मंदिर लौटते हैं। इस वापसी यात्रा को बहुदा यात्रा कहा जाता है।
  • यूनेस्को स्तर पर भी प्रसिद्ध सांस्कृतिक विरासत: पुरी की रथ यात्रा भारत की सबसे प्रसिद्ध धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में शामिल है। इसकी भव्यता और ऐतिहासिक महत्व के कारण इसे देखने देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु और पर्यटक आते हैं।
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