अच्छा हुआ 'मैने प्यार किया' नहीं किया

दरअसल पिछले 24 साल से थियेटर से जुडे़ पीयूष को इससे इतना लगाव था कि फिल्मी दुनिया की चकाचौंध भी उन्हें थियोटर से अलग नहीं कर पाई। पियूष को इस बाद का कतई अफसोस नहीं कि उन्होंने इतनी बड़ी फिल्म ठुकरा दी थी। वह कहते हैं कि "अच्छा हुआ 'मैंने प्यार किया' फिल्म में मैंने मुख्य किरदार नहीं किया, अगर किया होता तो शायद मेरे कदम धरती पर न होते। स्टारडम एक ऐसी चीज है जिसके जादू से कोई बच नहीं सकता। उस वक्त शयद मैं उस सफलता को संभाल नहीं पाता"।
थियेटर को पूरे 24 साल देने के बाद पीयूष ने 2002 में मुंबई का रुख किया। फिलहाल पीयूष अपनी आने वाली फिल्म 'आई लव अमेरिका' और 'शो मस्ट गो ऑन' में व्यस्त हैं।
बहुत कुछ सीखा है मुंबई से
पीयूष बताते हैं कि मुंबई से काफी कुछ सीखने को मिला है। सबसे पहले तो मुझमें इतनी हिम्मत ही नहीं थी कि मुंबई जाऊं, और यह हिम्मत क्यों
नहीं होती थी यह आज तक नहीं पता चला, शयद मुझे असुरक्षा थी। थियेटर के मेरे साथी आशीष विद्यार्थी, मनोज बाजपयी मुंबई में अपनी किस्मत
आजमा रहे थे, लेकिन तब भी मैं दिल्ली में थियेटर में व्यस्त रहा। मुझे थियेटर के प्रति लगाव इस कदर था कि बॉलीवुड की चमक भी दिखाई नहीं
दी। काफी वक्त बिताने के बाद मुझे लगा कि थियेटर से ज्यादा कुछ मिल नहीं रहा है तो सोचा कि मुंबई जाकर किस्मत आजमानी चाहिए। दिल्ली
और मुंबई में तो बहुत अंतर है, यह बात मुंबई जाकर पता चली। मुंबई वह जगह नहीं थी कि जहां मुझ पर अगर कोई मुसीबत आ जाए तो कुछ ही
पलों में मेरे जानकार मेरे पास पहुंच जाते, मुंबई में तो हर इंसान को अपनी लड़ाई अकेले ही लडऩी पड़ती है।
इम्प्रोवाइजेशन की मिली छूट
फिल्मों के डायलॉग्स तो वही बोलने पड़ते हैं जो स्क्रिप्ट में लिखें हों, लेकिन साहित्य में रुचि होने की वजह से पीयूष को फिल्मों में इम्प्रोवाइजेशन
की खुली छूट मिली। बस पीयूष को सीन समझ दिया जाता था और वह अपनी तरफ से डायलॉग बोल देते थे। पीयूष कहते हैं कि, मैं कम फिल्में
करना पसंद करूंगा लेकिन अपने पसंद की। मुझे जिस तरह का रोल पसंद आएगा मैं उसी रोल पर ध्यान दूंगा। पहले अपने कैरेक्टर के बारे में जानता
हूं फिर फिल्म करता हूं। फिल्मों में गीत, म्यूजिक और कहानी लिखने के अलावा पीयूष का सपना फिल्म डायरेक्ट करने का है। उन्होंने कहा 'मेरी
फिल्म में बहुत गीत होंगे और वो कमर्शियल होगी। मैं चाहता हूं कि मेरी फिल्म मनोरंजन से भरपूर हो, ताकि लोग खुश होकर सिनेमा से निकलें।'
थियेटर का पैशन कहीं गुम हो गया
70, 80 और 90 दशक में जो थियेटर देखने को मिलता था अब उसे पीयूष मिस करते हैं। वह कहते हैं कि थियेटर के प्रति लोगों का रुझन जाने क्यों कम होता जा रहा है। उस वक्त जो जुनून लोगों में थियेटर के प्रति था अब नहीं है। हालांकि अंग्रेजी थियेटर आज भी बहुत पॉपुलर है। लेकिन ना जाने क्यों हिंदी थियेटर की लोकप्रियता कम होती जा रही है। थियेटर का लगाव तो यूके में जाकर पता चलता है जहां नाटक की टिकटें ब्लैक में बिकती हैं और लोग एक दिन पहले लाइन में खड़े होने शुरू हो जाते हैं।
हिन्दी सिनेमा में बदलाव
पियूष का कहना है कि आजादी के बाद से हिन्दी सिनेमा में जबरदस्त बदलाव आया। वह कहते हैं कि पहले फिल्मों में समाज के लिए एक संदेश होता था। इसमें सामाजिक मूल्य होते थे लेकिन बाद में इसका स्वरुप पूरी तरह बदल गया। हालांकि वह 'देव डी' और 'गुलाल' जैसी प्रयोगवादी फिल्मों की सफलता से खुश हैं और उम्मीद करते हैं कि आगे भी लोग ऐसी फिल्मों को पसंद करेंगे। पियूष क्रांतिकारी पंजाबी कवि अवतार सिंह पाशा से काफी मुतासिर हैं और वह उनपर एक फिल्म भी बनाना चाहते हैं। हालांकि पियूष यह भी मानते हैं कि पाशा की कविताएं पढ़ने व गाने के लिहाज से तो अच्छी हैं लेकिन उन्हें संगीतबद्ध करना कठिन है।












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