Bahuda Yatra: गुंडिचा मंदिर से अपने धाम लौटेंगे भगवान जगन्नाथ, जानिए 'बाहुड़ा यात्रा' से जुड़ी खास बातें
Bahuda Yatra: आज प्रभु जगन्नाथ की वापसी पुरी मंदिर में वापसी होगी, भगवान बलभद्र और बहन सुभद्रा के रथ वापस लौटते हैं, इस यात्रा को 'बाहुड़ा यात्रा' कहते हैं।
आपको बता दें कि आषाढ़ शुक्ल द्वितीया से दशमी तिथि तक भगवान अपनी मौसी के यहां गुंडिचा मंदिर में ठहरते हैं। पुरी में 'बाहुड़ा यात्रा' से पहले सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं।

आपको बता दें कि इस साल दो दिन रथ यात्रा 7 जुलाई और 8 जुलाई यानी कि दो दिन चलेगी, साल 1971 के बाद से इस बार ये यात्रा दो दिन चली थी। इस यात्रा में भारी संख्या में लोग एकत्र होंगे, जिसके लिए सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए हैं।
ओडिशा के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (कानून एवं व्यवस्था) संजय कुमार ने एएनआई से बात करते कहा है कि ' भगवान के आशीर्वाद से, हमारी सभी व्यवस्थाएं सही हैं, पुलिस बल, पुलिसकर्मी, अधिकारी, हर किसी ने अपना स्थान ले लिया है। हमने रिहर्सल भी किया है, इसलिए आज हमें किसी समस्या की आशंका नहीं है।'
जगन्नाथ के रथ को 'नंदीघोष' के नाम से जाना जाता है
मालूम हो कि तीनों भगवान तीन रथों पर सवार होकर अपनी मौसी के घर पहुंचते हैं। ये तीनों रथ बहुत ज्यादा सुंदर थे। भगवान जगन्नाथ के रथ को 'नंदीघोष' के नाम से जाना जाता है और जिसमें 16 पहिए होते हैं और इनका रथ तीनों में सबसे बड़ा है। जबकि उनके बड़े भाई भगवान बलभद्र के रथ को 'तलध्वज' कहते हैं, उनके रथ को 14 पहिए होते हैं।
बहन सुभद्रा के रथ को 'दर्पदलन' कहा जाता है
जबकि बहन सुभद्रा के रथ को 'दर्पदलन' कहा जाता है, जिसमें 12 पहिए होते हैं। ये अकेली ऐसी यात्रा है जिसमें जगन्नाथ जी के साथ देवी रूक्मिणी नहीं होती हैं। कहते हैं कि इस यात्रा में जो भी शामिल होता है उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। मालूम हो कि गुंडिचा मंदिर और जगन्नाथ मंदिर के बीच में मात्र तीन किमी की दूरी है।
जगन्नाथ मंदिर की आरती (Jagannath Aarti)
- चतुर्भुज जगन्नाथ
- कंठ शोभित कौसतुभः ॥
- पद्मनाभ, बेडगरवहस्य,
- चन्द्र सूरज्या बिलोचनः
- जगन्नाथ, लोकानाथ,
- निलाद्रिह सो पारो हरि
- दीनबंधु, दयासिंधु,
- कृपालुं च रक्षकः
- कम्बु पानि, चक्र पानि,
- पद्मनाभो, नरोतमः
- जग्दम्पा रथो व्यापी,
- सर्वव्यापी सुरेश्वराहा
- लोका राजो, देव राजः,
- चक्र भूपह स्कभूपतिहि
- निलाद्रिह बद्रीनाथशः,
- अनन्ता पुरुषोत्तमः
- ताकारसोधायोह, कल्पतरु,
- बिमला प्रीति बरदन्हा
- बलभद्रोह, बासुदेव,
- माधवो, मधुसुदना
- दैत्यारिः, कुंडरी काक्षोह, बनमाली
- बडा प्रियाह, ब्रम्हा बिष्णु, तुषमी
- बंगश्यो, मुरारिह कृष्ण केशवः
- श्री राम, सच्चिदानंदोह,
- गोबिन्द परमेश्वरः
- बिष्णुुर बिष्णुुर, महा बिष्णुपुर,
- प्रवर बिशणु महेसरवाहा
- लोका कर्ता, जगन्नाथो,
- महीह करतह महजतहह ॥
- महर्षि कपिलाचार व्योह,
- लोका चारिह सुरो हरिह
- वातमा चा जीबा पालसाचा,
- सूरह संगसारह पालकह
- एको मीको मम प्रियो ॥
- ब्रम्ह बादि महेश्वरवरहा
- दुइ भुजस्च चतुर बाहू,
- सत बाहु सहस्त्रक
- पद्म पितर बिशालक्षय
- पद्म गरवा परो हरि
- पद्म हस्तेहु, देव पालो
- दैत्यारी दैत्यनाशनः
- चतुर मुरति, चतुर बाहु
- शहतुर न न सेवितोह ...
- पद्म हस्तो, चक्र पाणि
- संख हसतोह, गदाधरह
- महा बैकुंठबासी चो
- लक्ष्मी प्रीति करहु सदा ।












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