Diwali 2019: मुगल काल में भी मनाई जाती थी दिवाली, किताबों में हैं जिक्र
नई दिल्ली। भले ही लोग कहे कि दिवाली पर पटाखे ना फोड़ो, प्रदूषण ना फैलाओ लेकिन बिना पटाखों के दिवाली पूरी कहां होती है। बहुत कम ही घर ऐसे होंगे जहां दीपक के साथ फूलझड़ी ना जली हो, लेकिन क्या कभी आपने सोचने की कोशिश की आखिर पटाखों की शुरुआत कब और किसने की और इसका अविष्कार कहां पर हुआ, तो आपको बता दें कि पटाखों का अविष्कार भारत में नहीं चीन में हुआ था वो भी दुर्घटनावश।

चीन के एक शहर में हुआ था पटाखों का अविष्कार
कहा जाता है कि चीन के एक शहर में एक रसोइए ने गलती से साल्टपीटर (पोटैशियम नाईट्रेट) आग पर डाल दिया था, जिसके कारण आग के कलर में परिवर्तन हुआ जिससे लोगों के अंदर उत्सुकता पैदा हुई और उसके बाद उस रसोइए ने आग में कोयले और सल्फर का मिश्रण डाला, जिससे काफी तेज़ आवाज के साथ रंगीन लपटें उठने लगी, बस, यहीं से आतिशबाज़ी यानी पटाखों की शुरुआत हुई।

मुगलकाल में भी मनाई जाती थी दिवाली
भारत के इतिहास पर नजर डाले तो पटाखों की शुरूआत कब, कहां से हुई ,इसका स्पष्ट प्रमाण तो नहीं मिलता है लेकिन मुगलकाल की किताबों में दिवाली का जिक्र है, कई जगहों पर लिखा है कि लोग अपने घरों को लैंप और मोमबत्ती से सजाकर दिवाली मनाते थे और मुगल बादशाह अकबर के शासन काल में (1556 से) दिवाली के जश्न की शुरुआत आगरा से की गई थी तो वहीं शाहजहां ने भी रोशनी के इस त्योहार को बड़ी श्रद्धा और उत्साह से मनाया था।

शिवकाशी
पटाखे की शुरूआत वैसे तो चीन में हुई थी लेकिन भारत में भी एक ऐसा शहर है जिसे Cracker City यानी पटाखों के शहर के नाम से जाना जाता है और वो शहर है शिवकाशी। ये शहर चेन्नई से 500 किमी की दूरी पर स्थित है।
पहली बार पटाखा कंपनी की शुरुआत
20वीं शताब्दी में शिवकाशी में पहली बार पटाखा कंपनी की शुरुआत हुयी थी। इस छोटे से शहर को पटाखों का शहर बनाने का क्रेडिट पी अय्या नादर और उनके भाई शनमुगा नादर को जाता है। इन्होंने ही अनिल ब्रांड के पटाखों का निर्माण किया था।

शिवकाशी को बनाया पटाखा हब
1923 में ये दोनों भाई माचिस बनाने का तरीका सीखने के लिए कोलकाता गये थे। उसके बाद इन्होंने ये बिजनेस शुरू किया और दोनों ने अपनी पहली कंपनी खोली और आज एक छोटी सी कंपनी से पूरा शहर पटाखा हब बन गया। भारत के राज्य तमिलनाडु के विरुधुनगर जिले में स्थित शिवकाशी आज भारत के पटाखा उद्योग की राजधानी है जहां तकरीबन 8,000 बड़े और छोटे कारखाने हैं जिनमें कुल मिलाकर 90 प्रतिशत पटाखों का उत्पादन होता है।












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