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कर्ण के गुण ने उन्हें बनाया महान, पढ़िए ये रोचक कथा

नई दिल्ली। संसार में गुणीजन का महत्व और सम्मान सर्वत्र होता है, इस बात से हम सभी भली-भांति परिचित हैं। कहा जाता है कि गुणों में एक स्वर्गिक सुगंध होती है, जो स्वतः प्रसारित होकर सहज ही सबको आकर्षित कर लेती है। यह भी माना जाता है कि यदि आपमें कोई विशेष गुण है, तो आपके धुर विरोधी भी उस एक गुण के लिए आपकी प्रशंसा करने को बाध्य हो जाते हैं, कैसे, महाभारत के एक सुंदर प्रसंग से जानते हैं।

कर्ण के गुण ने उन्हें बनाया महान, पढ़िए ये रोचक कथा

महाभारत के युद्ध के दौरान भगवान कृष्ण और अर्जुन के मध्य के संवाद जगत प्रसिद्ध हैं। इस वार्ता में अर्जुन की दुविधा का समाधान करते हुए श्री कृष्ण ने वह दिव्य ज्ञान सर्वजन के लिए सुलभ कराया है, जो सदैव प्रासंगिक रहेगा। महाभारत की कथा में यह तथ्य उभरकर आता है कि श्रीकृष्ण कर्ण के बहुत बड़े प्रशंसक थे और यह बात अर्जुन को बिलकुल नहीं सुहाती थी। एक दिन वार्ता के बीच अर्जुन ने श्रीकृष्ण से बोल ही दिया कि भगवन्! आप सदा ही कर्ण का पक्ष लिया करते हैं, उसकी प्रशंसा किया करते हैं। आखिर उसमें ऐसा क्या है, जो वह आपकी प्रशंसा का पात्र है?

आज के युग में कर्ण-सा दानी इस संसार में दूसरा कोई नहीं

कृष्ण ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया कि हे अर्जुन! कर्ण अपने आपमें महान योद्धा, ज्ञानी, निष्कपट मित्र और दिव्य वरदानों से युक्त वीर है, किंतु इन सब गुणों से बढ़कर उसकी महानता है उसकी दानशीलता। आज के युग में कर्ण-सा दानी इस संसार में दूसरा कोई नहीं। अर्जुन ने कहा- भगवन्! दान तो हम सब करते हैं। उसमें ऐसा क्या विशेष है? भगवान ने कहा कि मैं इसका प्रमाण समय के साथ दूंगा।

श्री कृष्ण ने कहा कि अर्जुन! आज तुम स्वयं कर्ण की दानवीरता देख लो

समय के साथ वह पल भी आया, जब कर्ण युद्ध में बुरी तरह घायल हुआ और अपनी अंतिम सांसें गिन रहा था। इसी समय श्री कृष्ण ने कहा कि अर्जुन! आज तुम स्वयं कर्ण की दानवीरता देख लो। ऐसा कह कर श्री कृष्ण ब्राह्मण का वेष धरकर कर्ण के पास जाकर खड़े हो गए। कर्ण ने उनसे कहा- हे ब्राह्मण देवता! आप मेरे पास किस प्रयोजन से पधारे हैं? ब्राह्मण ने कहा- महाराज! मैं अत्यंत निर्धन हूं और कुछ सहायता पाने की आशा से आपके पास आया था, पर आप तो स्वयं ही असहाय दिख रहे हैं। मैं जाता हूं, कहीं और से प्रबंध का प्रयास करता हूं।

कर्ण ने तोड़ा सोने का दांत

कर्ण ने उसी पल ब्राह्मण को रोका और पास में पड़ा पत्थर उठाकर अपने दांत पर प्रहार किया। उस भीषण प्रहार से उसका सोने का एक दांत टूट कर गिर पड़ा। कर्ण ने उसे ब्राह्मण को देते हुए कहा कि कृपया इसे स्वीकार कर मुझे अनुग्रहित करें। ब्राह्मण ने कहा कि श्रीमान्! मैं यह रक्त रंजित दांत दान में नहीं ले सकता। इस पर मृतप्राय होते हुए भी कर्ण ने धरती पर एक बाण चलाया और पानी की धारा फूट पड़ी। कर्ण ने पानी से साफ कर वह दांत ब्राह्मण को अर्पित किया।

भगवन्! मेरा अंतिम संस्कार आपके द्वारा किया जाए

कर्ण से वह दांत लेते ही कृष्ण अपने असली रूप में आ गए और प्रसन्न होकर उससे वर मांगने को कहा। कर्ण ने कहा कि भगवन्! मेरा अंतिम संस्कार आपके द्वारा किया जाए और आप मेरी जाति को अपनी शरण में लें। श्री कृष्ण ने उसकी दोनों बातें स्वीकार कर पूरी कीं। इस पूरे घटनाक्रम को देखकर अर्जुन ने भी कर्ण और उसकी दानशीलता को प्रणाम किया।

धन घट सकता है पर गुण नहीं

साथियों, संसार में रूप घट सकता है, धन घट सकता है, पर गुण एक ऐसी संपत्ति है, जिसे यदि पूरे मन से विस्तारित किया जाए, तो वह एक दिन आपको सबके सम्मान का पात्र बना देता है। तो अपने गुणों का विस्तार कीजिए और अपने सम्मान का मार्ग प्रशस्त कीजिए।

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