Govardhan Puja (Annakut) 2018: गोवर्धन पूजा-अन्नकूट का क्या महत्व, जानिए पूजा का पूरा विधि-विधान

लखनऊ। कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को अन्नकूट-गोवर्धन पूजा की जाती है। यह प्रतिपदा अमावस्या के बादवाली ( पूर्वविद्धा ) ली जानी चाहिए। क्योंकि जिस दिन चन्द्रदर्शन हो, उस दिन गोवर्धन पूजा निषेध है। दीपावली की तरह इसमें भी दीपोत्सव का विधान है।

गोवर्धन पूजा-अन्नकूट का क्या महत्व, जानिए पूजा की विधि

गुजरात, महाराष्ट्र राज्यों में इसी दिन से नव वर्ष की शुरूआत होती है। यह वैष्णवों का मुख्य पर्व है और इसका आयोजन कृष्ण मन्दिरों एंव विष्णु मन्दिरों और आस्तकि गृहस्थों के घर में किया जाता है। यह पर्व वज्र भूमि में अधिक लोकप्रिय है। इस पर्व को दो भागों में विभक्त किया गया है।

गोवर्धन पूजा

इस दिन घर के आंगन में गोबर से गोवर्धन का चित्र बनाकर उसकी पूजा रोली, चावल, खीर, बताशे, चावल, जल, दूध, पान, केसर, पुष्प आदि से दीपक जलाने के पश्चात की जाती है। गायों को स्नानादि कराकर उन्हें सुसज्जित कर उनकी पूजा करें। गायों को मिष्ठान खिलाकर उनकी आरती कर प्रदक्षिणा करनी चाहिए।

अन्नकूट

अन्नकूट शब्द का अर्थ होता है अन्न का समूह। विभिन्न प्रकार के अन्न को समर्पित और वितरित करने के कारण ही इस उत्सव या पर्व को नाम अन्नकूट पड़ा है। इस दिन अनके प्रकार का पक्वान, मिठाई आदि का भगवान को भोग लागायें। सभी नैवेद्यों के बीच भारत का पहाड़ अवश्य बनायें। भोग सामग्री की इतनी विविधता और विपुलता होनी चाहिए, जितनी बनाई जा सकें। अन्नकूट के रूप में अन्न और शाक-पक्वानों को भगवान को अर्पित किये जाते है तथा भगवान को अर्पण करने के पश्चात वह सर्वसाधारण में वितरण किया जाता है। कृषिप्रधान देश का यह अन्नमय यज्ञ वास्तव में सर्वसुखद है। अन्नकूट और गोवर्धन की यह पूजा आज भी कृष्ण और बिष्णु मन्दिरों में अत्यन्त उत्साह से की जाती है।

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