धंतेरस पर अब नहीं मिलता बिना पेंदी का लोटा

Brass utensils sale down in Dhanteras before Diwali
मिर्जापुर। आज धंतेरस है और देश भर के लोग खरीददारी करेंगे। उत्‍तर भारत में खास तौर से बर्तन खरीदने का चलन है, जिसमें एक समय था जब लोग आज के दिन बिना पेंदी का पीतल का लोटा घर लाते थे। लेकिन आज यह महज़ इतिहास बनकर रह गया है।

बिन पेंदी का लोटा कभी यूपी के मिर्जापुर की शान हुआ करता था। स्टील की चमक के आगे पीतल के इस बिन पेंदी के लोटे की बातें बीते जमाने की यादें ही रह गयी हैं। हालात यह है कि अब यह महज कुछ घरों में एंटीक पीस बनकर ही रह गया है। सदियों पुराना मिर्जापुर का पीतल उद्योग लगभग बंदी की कगार पर है।

पीतल निर्माण और उनके कारोबारियों तथा कारीगरों का इलाका भी उजडऩे को है। स्थिति यह है कि आज इस विधा के मजदूर बेरोजगारी का दंश झेल रहे हैं। वहीं इतिहास की बात करें तो कभी मिर्जापुर के पीतल के बर्तनों का कोई मुकाबला नहीं था। यहां का पीतल सर्वश्रेष्ठ माना जाता था। यहां के बर्तनों की मांग सारे देश में थी। पीतल उद्योग यहां का मुख्य व्यवसाय था।

पीतल उद्योग से प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रुप में लगभग 50 हजार लोग जुड़े थे पर आज स्थितियां अलग हैं लाह-चपडा के कारोबार के बंदी के बाद बर्तन मंडी में आई इस गिरावट के कई कारण बताये जा रहे हैं लेकिन पीतल उद्योग को चौपट करने में दोषपूर्ण सरकारी नीतियों जैसे व्यापार कर की दोषपूर्ण उगाही व कच्चे माल का दोषपूर्ण वितरण आदि प्रमुख रुप से शामिल हैं।

वहीं पिछड़े इलाके में नई इकाईयों को पांच साल तक मिलने वाली छूट और उद्योग को जीवित रखने के लिए मिलने वाली सुविधाओं का नहीं मिलना भी एक कारण है। इस व्यवसाय से जुडे मजदूर भुखमरी की स्थिति में पहुंच गये हैं। मिर्जापुर में मुख्य रुप से पीतल के लोटे, गगरा, हंडा, परात, थाल, पतीला, घंटा, कलछुल व थाली आदि बनाए जाते हैं। कच्चा माल गलाने के लिए भठ्ठी का प्रयोग होता है। कभी कच्चे माल को गलाने के लिए कसरहट्टी मुहल्ले के घर घर में भठ्ठियां थीं जो अब नाम मात्र की रह गयी हैं।

बदलते समय के साथ यहां के बर्तनों की मांग भी कम होती जा रही है। दरअसल यहां के वजनदार बर्तन काफी महंगे होते हैं, इनके मुकाबले स्टील सस्ता है। यहां हंडा, परात, गगरा आदि बड़े-बड़े बर्तन बनाये जातें हैं जिनका प्रचलन अब आम नहीं है। धाॢमक व शादी उत्सवों में ही अब परम्परा के निर्वहन के लिए इनकी मांग है। यहां बर्तन उद्योग की गिरावट में सरकारी उपेक्षा अवश्य रही है पर यहां के निर्माता भी इसके लिए कम जिम्मेदार नहीं हैं।निर्माता मौके और समय के अनुरुप अपने को नहीं ढाल पाये हैं, फैंसी और नये आइटम नहीं प्रस्तुत कर सके। वह उन्हीं पुराने पर परागत बर्तनों के निर्माण से आगे नहीं सोच सके जिसका खामियाजा सबके सामने है।

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+