Amla or Akshaya Navami 2020: आयु, आरोग्य और धन की प्राप्ति के लिए करें आंवला नवमी
Amla Navami: कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को आंवला नवमी मनाई जाती है। इस दिन स्वस्थ रहने की कामना के साथ आंवला वृक्ष की पूजा की जाती है और आंवले के वृक्ष के नीचे बैठकर भोजन किया जाता है। इसके पीछे मान्यता है किइससे आयु और आरोग्य में वृद्धि होती है। इस दिन पूजन करके आंवले को प्रसाद के रूप में ग्रहण भी किया जाता है। इसे अक्षय नवमी भी कहा जाता है, क्योंकि इस दिन किया गया कोई भी शुभ कार्य अक्षय फल देने वाला होता है। अर्थात् उसके शुभ फल में कभी कमी नहीं आती। आंवला नवमी 23 नवंबर 2020, सोमवार को आ रही है।

मथुरा प्रस्थान किया था श्रीकृष्ण ने
पौराणिक मान्यता के अनुसार कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि अर्थात् आंवला या अक्षय नवमी के दिन ही द्वापर युग का प्रारंभ हुआ था, जिसमें श्रीहरि विष्णु के आठवें अवतार भगवान श्रीकृष्ण ने जन्म लिया था। आंवला नवमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण ने वृंदावन-गोकुल की गलियों को छोड़कर मथुरा प्रस्थान किया था। यही वो दिन था जब उन्होंने अपनी बाल लीलाओं का त्याग कर कर्तव्य के पथ पर कदम रखा था। इसीलिए आंवला नवमी के दिन से वृंदावन परिक्रमा प्रारंभ होती है।
कैसे करें आंवला नवमी की पूजा
आंवला नवमी के दिन आंवला वृक्ष की पूजा की जाती है। वृक्ष का पूजन करके उसमें जल और कच्चा दूध अर्पित किया जाता है। फिर उसकी परिक्रमा करते हुए तने में कच्चा सूत या मौली आठ बार लपेटी जाती है। आंवला नवमी की कथा सुनी या पढ़ी जाती है। इसके बार परिजनों, मित्रों आदि के साथ वृक्ष के नीचे बैठकर भोजन किया जाता है।
आंवला नवमी की कथा
एक सेठ आंवला नवमी के दिन आंवले के पेड़ के नीचे ब्राह्मणों को भोजन कराया करता था और उन्हें सोने का दान दिया करता था। उसके पुत्रों को यह सब देखकर अच्छा नहीं लगता था और वे पिता से लड़ते-झगड़ते थे। घर की रोज-रोज की कलह से तंग आकर सेठ घर छोड़कर दूसरे गांव में रहने चला गया। उसने वहां जीवनयापन के लिए एक दुकान लगा ली। उसने दुकान के आगे आंवले का एक पेड़ लगाया। उसकी दुकान खूब चलने लगी। वह यहां भी आंवला नवमी का व्रत-पूजा करने लगा तथा ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान देने लगा। उधर, उसके पुत्रों की व्यापार ठप हो गया। उनकी समझ में यह बात आ गई किहम पिताश्री के भाग्य से ही खाते थे। बेटे अपने पिता के पास गए और अपनी गलती की माफी मांगने लगे। पिता की आज्ञानुसार वे भी आंवला के पेड़ की पूजा और दान करने लगे। इसके प्रभाव से उनके घर में भी पहले जैसी खुशहाली आ गई।
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