Khatu Shyam Ji: कौन थे खाटू श्याम जी? क्या है उनका आमलकी एकादशी से कनेक्शन?
Khatu Shyam Ji ki katha: बाबा श्याम घटोत्कच के पुत्र थे, जिनका नाम पहले बर्बरीक था, उन्हें मां भवानी ने कुछ विशेष शक्तियां दी थीं।

Khatu Shyam Ji: बाबा श्याम के दर से कोई भी खाली हाथ नहीं लौटता है, बाबा सबकी मुराद पूरी करते हैं और इसलिए दूर-दूर से लोग खाटू श्याम के मंदिर पर मत्था टेकने आते हैं। आपको बता दें कि फाल्गुन माह की एकादशी यानी कि आमलकी एकादशी पर बाबा श्याम के मंदिर में भव्य मेला लगता है, जिसमें शरीक होने के लिए देश के कोने- कोने से लोग पहुंचते हैं। आपको बता दे कि आमलकी एकादशी पर बाबा का विशेष पूजा-अर्चना की जाती है,इस दिन मंदिर में विशेष आरती होती है, मंदिर को दुल्हन की तरह सजाया जाता है। दरअसल इसके पीछे एक रोचक कथा है, जिसे जानना काफी जरूरी है।
बाबा श्याम भीम के पोते थे
दरअसल बाबा श्याम पांडु पुत्र महाबलशाली भीम के पोते थे। वनवास के दौरान पांडव जब वन में भटक रहे थे तो इस दौरान भीम की मुलाकात हिडिंबा नाम की एक राक्षसी से हुई थी, जो कि भीम को देखते ही उन पर मोहित हो गई थी। मां कुंति को जब इस बात का पता चला तो उन्होंने भीम और हिडिंबा की शादी करा दी, इस शादी से दोनों को एक पुत्र पैदा हुआ, जिनका नाम घटोत्कच था, इन्हीं के बेटे का नाम बर्बरीक था, जो मां दुर्गा के बहुत बड़े भक्त थे। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर मां ने उन्हें तीन दिव्य वाण दिए थे, जिसक वार कभी भी खाली नहीं जाता था, यही नहीं मां ने बर्बरीक को कभी ना हारने का आशीष भी दिया था।
दिव्यवाणों का प्रयोग करना चाहा
महाभारत के युद्ध के दौरान बर्बरीक ने अपने उन दिव्यवाणों का प्रयोग करना चाहा और जैसे ही उन्होंने युद्ध क्षेत्र पर कौरवों पर वार करने के लिए अपना धनुष उठाया, वैसे ही वहां पर एक साधु प्रकट हो गए, जिन्होंने उनसे भिक्षा में उनका शीश मान लिया। अब साधु की बात तो बर्बरीक टाल नहीं सकते थे क्योंकि वो धर्म का पालन करते थे, लेकिन उन्हें समझ में आ गया कि ये कोई आम साधु नहीं हैं, उन्होंने कहा कि ऋषिवर मैं आपको खुशी-खुशी अपना शीश दे दूंगा लेकिन आप मुझे अपनी असल पहचान बताएं।'
श्रीकृष्ण ने उनका शीश एक पहाड़ी पर रख दिया
जिस पर साधु ने उन्हें अपना असली रूप दिखाया और वो कोई और नहीं स्वयं भगवान कृष्ण थे, जो जानते थे कि बर्बरीक तो महाभारत का युद्ध एक बार में ही समाप्त कर देगा इसलिए उन्होंने उसे रोकने के लिए ये माया रची थी। प्रभु को अपने समक्ष देखकर बर्बरीक एकदम से आत्मविभोर हो गए और उन्होंने खुशी-खुशी अपना शीश भगवान के चरणों में रख दिया लेकिन उन्होंने महाभारत का सारा युद्द देखने की इच्छा प्रकट की थी इसलिए श्रीकृष्ण ने उनका शीश एक पहाड़ी पर रख दिया और उन्हें आशीर्वाद दिया कि उन्हें लोग बाबा श्याम के रूप में पूजेंगे।
फाल्गुन महीने की शुक्ल पक्ष की एकादशी
बाबा श्याम ने उस कटे शीश से ही पूरा महाभारत युद्ध देखा, वो पहाड़ी जहां उनका शीश था, वो खाटू नगरी में था, शीश वाले स्थान पर ही उनका मंदिर बनाया गया और इसलिए उनका नाम खाटू श्याम हो गया। जिस दिन बाबा श्याम का शीश खाटू नगरी में मिला था वो दिन फाल्गुन महीने की शुक्ल पक्ष की एकादशी यानी आमलकी एकादशी थी, तब से ये दिन उत्सव के रूप में मनाया जाने लगा।












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