World Happiness Report: वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट और भारत-विरोधी पश्चिमी देशों का एजेंडा
भारत में न तो कोई आर्थिक संकट है, न युद्ध से ग्रसित है और न ही यहां राजनैतिक अस्थिरता है। लेकिन फिर भी हैप्पीनेस रिपोर्ट में गरीबी, हिंसा, अराजकता और युद्ध से जूझ रहे देशों को भारत से कहीं ज्यादा खुशहाल बताया जाता है।

World Happiness Report: यूरोप और अमेरिका की एक बहुत बड़ी समस्या है। दरअसल, ये दुनिया को एक ही चश्में से देखना पसंद करते हैं। उन्हें लगता है कि जैसी उनकी संस्कृति, धर्म, पहनावा, खान-पान, और जनसंख्या इत्यादि है, वैसे ही दुनिया के बाकी देश होने चाहिए। उन्हें यूरोप और अमेरिका जैसा ही व्यवहार करना चाहिए। जो ये लोग कहें वैसा ही रहना और खाना चाहिए।
यही नहीं, आपके यहां खुशहाली है या नहीं इसके भी मापदंड यूरोप और अमेरिका तय कर देंगे। अगर आप उनके मापदंडों पर खरे उतरे तो ठीक, नहीं तो आप एक पिछड़े और अविकसित देश हैं। जहां लोगों के पास खुशहाली नहीं है और वे सभी भूख से मर रहे हैं।
अब इन्होने अपनी बात को मनवाने का एक नया तरीका खोज लिया है। वह है सालाना अंग्रेजी में एक रिपोर्ट जारी कर देना। वे सभी रिपोर्ट्स सलीके से लिखी हुई और बढ़िया तस्वीरों के साथ डिजायन की जाती हैं। इसलिए पहली बार देखने में आपको वे आकर्षक लग सकती हैं। अन्दर क्या लिखा है उसे भी पूरा पढ़ने की जरुरत नहीं है क्योंकि उसके मुख्य बिंदु आपको समाचारपत्रों के माध्यम से जबरन पढ़ा दिए जायेंगे।
फिर भी आपको लगता है कि नहीं, मुझे तो वह रिपोर्ट पूरी पढ़नी है, तो इन्टरनेट की इस दुनिया में वो भी आसानी से उपलब्ध हो जायेंगी। आपको बस उस रिपोर्ट का नाम डालना है और उसकी वेबसाइट आपके सामने होगी। आप वेबसाइट खोलिए और उस रिपोर्ट को मुफ्त में डाउनलोड कर लीजिये।
ध्यान रहे, मुफ्त में इसलिए उपलब्ध नहीं है कि यह कोई समाज कल्याण का काम है। बल्कि मुफ्त इसलिए बांटी जा रही है जिससे यूरोप और अमेरिका अपने मापदंडों को दुनिया में स्थापित कर सकें।
पिछले दिनों ऐसी ही एक रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र संघ की एक संस्था सस्टेनेबल डेवलपमेंट सोल्यूशन नेटवर्क (Sustainable Development Solutions Network) ने वर्ल्ड हैप्पीनेस के नाम से जारी की। इस रिपोर्ट में कुल 137 देशों में भारत को 126वां स्थान दिया गया। जबकि खुशहाल देशों की इस सूची में पिछले साल 146 देशों थे और तब भारत को 135वें स्थान पर रखा गया था।
पहली बात तो यह रिपोर्ट किसी भी नजरिये से वैश्विक नहीं हो सकती क्योंकि इसी संयुक्त राष्ट्र संघ की जनरल असेम्बली के फिलहाल 193 देश सदस्य हैं। इस लिहाज से इस रिपोर्ट में दुनिया की पूरी झलक नहीं दिखाई देती क्योंकि लगभग एक चौथाई देशों का तो जिक्र ही नहीं हुआ। दूसरा, सालभर में एक ही संस्था द्वारा जारी रिपोर्ट्स में अचानक से 9 देश और कम हो गये!
अब इस रिपोर्ट का पाखंड देखिये। पिछले साल भारत से ऊपर जिन देशों की रैंकिंग थी, उसमें कई देश राजनैतिक और आर्थिक संकटों से जूझ रहे थे। जैसे मैक्सिकों को 46वां स्थान दिया गया। दुनिया जानती है कि यह देश सालों से आतंरिक ड्रग वॉर में फंसा हुआ है। यहां इतनी गरीबी है कि मैक्सिकन नागरिक बेहतर जिंदगी की तलाश में अमेरिका में अवैध घुसपैठ करते हैं। इसलिए अमेरिका को मैक्सिकों के साथ लगने वाली अपनी अंतरराष्ट्रीय सीमाओं पर एक दीवार तक खड़ी करनी पड़ गयी थी।
ऐसे ही पिछले साल चीन को 72वां स्थान दिया गया। क्या यूरोप और अमेरिका इस बात से अंजान है कि उनके देशों की बड़ी से बड़ी टेक्नोलॉजी कम्पनियां चीन में व्यापार नहीं कर सकती? वहां बीते 7 दशकों से लोकतंत्र नहीं है और एक ही पार्टी की सरकार है। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने हांगकांग, तिब्बत, ताइवान, और मंगोलिया में जातीय नरसंहार किये हैं। जिनपर तमाम अमेरिका और यूरोप के विश्वविद्यालयों के शोध उपलब्ध हैं। यही नहीं, कोरोना से पूरी दुनिया में मौतों का अकेला जिम्मेदार चीन था और आज भी यह देश इस महामारी से उबर नहीं सका है।
पिछले साल की रिपोर्ट में गृहयुद्ध और आतंकवाद से ग्रसित लीबिया को 86वां, कैमरून को 102वां, नाइजर को 104वां, नाइजीरिया को 118वां, माली को 123वां, चाड को 130वां, इथोपिया को 131वां और यमन को 132वां स्थान दिया गया था। जबकि पाकिस्तान और श्रीलंका अपने दौर के सबसे बड़े वित्तीय संकट से गुजर रहे हैं और उन्हें क्रमश 121वां और 127वां स्थान दिया गया था।
गौरतलब है कि इस साल भी यही सब देश भारत से आगे है। फिलहाल मैक्सिकों को 36वां, चीन को 64वां, कैमरून को 96वां, नाइजीरिया को 95वां, पाकिस्तान को 108वां, श्रीलंका को 112वां, चाड को 114वां, माली को 120वां, और इथोपिया को 124वां स्थान दिया गया हैं। जबकि नाइजर, लीबिया और यमन के नाम इस बार नदारद हैं।
सबसे आश्चर्यजनक तो यूक्रेन की रैंकिंग है। पिछले बार जब यह देश रूस के खिलाफ युद्ध लड़ रहा था तब उसे 98वां स्थान दिया गया। आज भी यह देश जंग लड़ रहा है और दुनिया से मदद मांग रहा है। फिर भी यूक्रेन की खुशहाली पहले से और बढ़ गयी है। दरअसल इसबार की रिपोर्ट में यूक्रेन को 92वें पायदान पर रखा गया है। क्या इससे बड़ा कोई पाखण्ड हो सकता है?
हालांकि, देखा जाये तो इन देशों की रैंकिंग भी कोई ज्यादा खास अच्छी नहीं है लेकिन विषम हालातों के बावजूद भी भारत से अच्छी है। जबकि भारत में न तो कोई आर्थिक संकट है, न यह देश युद्ध से ग्रसित है और न ही यहां राजनैतिक अस्थिरता है। अतः इस आधार पर यह रिपोर्ट एक राजनैतिक एजेंडा से ज्यादा कुछ और नहीं नजर आती।
अब सवाल उठता है कि आखिर ऐसी रिपोर्ट्स के माध्यम से यूरोप और अमेरिका अपनी बात कैसे थोपते हैं? तो इसके दो तरीके समझ आते हैं। पहला, 'क्षेत्रवाद', यानी अपने यहां के देशों को टॉप रैंकिंग देना। दूसरा, एक ऐसी विधि तैयार करना जिससे यूरोप और अमेरिकी देश हमेशा अव्वल रहे। विश्वास न हो तो खुशहाली वाली रिपोर्ट के किसी भी अंक को उठा लीजिये। इसमें पहले 50 देशों में 70 प्रतिशत से अधिक देश यूरोप और अमेरिकी महाद्वीपों के मिलेंगे।
आश्चर्यजनक रूप से पिछले साल इस रिपोर्ट में पनामा जैसे टैक्स चोरी करने वाले देश को 37वें स्थान पर रखा गया था। इसबार इसे 38वां स्थान दिया गया है। जबकि इस देश का अपना स्वयं का कोई आर्थिक ढांचा नहीं है। दूसरे देशों के ब्लैक मनी पर यह देश चलता है और इसका कोई स्थाई भविष्य नहीं है।
दरअसल, इस रिपोर्ट में सैम्पल सर्वे की एक बड़ी भूमिका होती है। इन सभी सैम्पल्स को यूरोप की एक मैनजमेंट कंपनी गैलप इकट्ठा करती है। ये लोग जमीनी हकीकत नहीं बल्कि अपने दफ्तरों में ऑनलाइन माध्यम से किसी भी देश के मात्र 1,000 लोगों के सैम्पल इक्कठा करते है। कुछ विशेष मामलों में यह सैम्पल संख्या 2,000 से 3,000 के बीच भी हो सकती है। अब भारत जैसा देश जिसकी जनसंख्या 135 करोड़ है, उसे अपनी पसंद के इस मामूली सैम्पल के आधार पर कैसे नापा जा सकता है?
इस सैम्पल के अलावा, क्रय-शक्ति समता आधारित जीडीपी और जनसंख्या जैसे कारकों को भी इसमें जोड़ा गया हैं। अब एकतरफ वो विकसित देश है जिनकी जनसंख्या स्थिर अथवा गिर रही है। अतः जनसंख्या कम और आय अधिक होने के कारण क्रय शक्ति अधिक है।
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इसी पैमाने पर भारत को देखें तो 1950 से 1990 तक हमारी जनसंख्या वृद्धि उच्चतम होकर अब अपेक्षाकृत कम है। फिर भी पिछले दशकों की जनसंख्या का प्रभाव अभी बना हुआ है। वहीं, क्रय शक्ति आधारित जीडीपी में हम विश्व में तीसरे स्थानपर है। यानि किसी भी लिहाज से भारत यूरोप और अमेरिकी विकसित देशों से पीछे नहीं है। फिर भी इस वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट में भारत को दुनिया में सबसे कम खुशहाल देश बताया गया है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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