Plastic Pollution: कभी नष्ट न होने वाला दैत्य बन चुका है प्लास्टिक
अगर कभी धरती से सबकुछ खत्म हो जाए तब भी प्लास्टिक का कचरा बचा रहेगा। वह एक ऐसा अजर अमर दैत्य बन गया है जिसे पैदा तो किया जा सकता है लेकिन उसे कभी खत्म नहीं किया जा सकता।

Plastic Pollution: वर्ष 1907 में बेल्जियम के कैमिस्ट लिओ बेकलेंड ने प्लास्टिक की खोज की। तब से हमारे जीवन में इसकी घुसपैठ लगातार बढ़ती ही गई है। महज एक सदी के भीतर यह हमारे अस्तित्व के लिए एक ऐसा खतरा बन चुका है जिससे छुटकारा पाने का कोई उपाय हमारे पास नहीं है।
प्लास्टिक की खोज के पीछे लिओ का मकसद जो भी रहा हो, धरती को बर्बाद करना तो बिल्कुल ही नहीं रहा होगा। लेकिन आज पर्यावरण के लिए खतरों में प्लास्टिक सबसे बड़ा खतरा बन गया है। कुछ चीजें वायु को प्रदूषित कर रही हैं, कुछ जल को और कुछ मिट्टी को। लेकिन, प्लास्टिक ऐसी बला है जो जल-थल-नभ, तीनों तत्वों को प्रदूषित करती है। इसके खतरों से निपटने के लिए दुनिया भर में प्रयास हो रहे हैं। अलग-अलग देशों में, अलग-अलग तरीके आजमाए जा रहे हैं। लेकिन, इसका वर्चस्व कम होने का नाम ही नहीं ले रहा है।
विश्व पर्यावरण दिवस की आज आज पचासवीं सालगिरह है। इस अवसर पर करीब 170 देशों ने, जिनमें भारत भी शामिल है, एक अंतरराष्ट्रीय संधि में शामिल होने के लिए सहमति जताई है। जीरो ड्राफ्ट नामक इस संधि का मसौदा (ड्राफ्ट) नवंबर तक तैयार करने का निश्चय किया गया है। ताकि इसे यूनाइटेड नेशंस एन्वॉयर्नमेंट प्रोग्राम (यूएनईपी) की इन्टरगवर्नमेंटल नेगोशिएशन कमेटी के तीसरे सत्र में पेश किया जा सके। इसका आयोजन केन्या की राजधानी नैरोबी में होने जा रहा है।
इस संधि का मकसद है, प्लास्टिक प्रदूषण पर लगाम लगाना। आईएनसी दरअसल, यूएनईपी के एक ऐतिहासिक संकल्प की देन है। पिछले साल मार्च में लिए गए इस संकल्प में प्लास्टिक प्रदूषण के खात्मे के लिए, 2024 तक एक ऐसा समझौता कायम करने पर जोर दिया गया था, जिसका पालन कानूनी रूप से बाध्यकारी हो। एक बार मंजूर होने के बाद, अंतिम समझौता 2025 तक सुझावों और सुधारों के लिए खुला रहेगा। यह समझौता प्लास्टिक के प्रॉडक्शन, डिजाइन और डिस्पोजेबल, तीनों की ही बात करता है।
तीन दिन पहले, जब पेरिस में आईएनसी के दूसरे सत्र का आयोजन किया जा रहा था तो भारत ने एक अलग दृष्टिकोण पेश किया। उसका कहना था कि एक मैटेरियल के रूप में प्लास्टिक समस्या नहीं है, बल्कि इसका कचरा समस्या है। यह अपने आपमें एक अस्पष्ट किस्म की सोच है। कचरा खुद में कोई उत्पाद नहीं होता, बल्कि उपभोग के बाद, उत्पाद का अपशिष्ट होता है। एक ऐसे परिदृश्य में, जहां दुनिया हर साल 40 करोड़ टन प्लास्टिक का उत्पादन कर रही हो और जिसके वर्ष 2060 तक तीन गुना, 123.1 करोड टन हो जाने का अनुमान लगाया रहा है, प्लास्टिक मैटेरियल को कैसे निरापद माना जा सकता है। वह भी तब जब हमारे देश में प्रति व्यक्ति प्लास्टिक वेस्ट हर साल करीब बाइस फीसदी की दर से बढ़ रहा हो और इसमें हमारा सालाना योगदान पैंतीस लाख टन पहुंच गया हो।
वर्तमान में हर साल 35.3 करोड़ टन प्लास्टिक कचरा उत्पन्न होता है। इसका सिर्फ नौ फीसदी ही रिसाइकिल हो पाता है। 19% को जलाकर नष्ट किया जाता है, 50% लैंडफिल में चला जाता है और 22% अपशिष्ट प्रबंधन के बाद बचा रह जाता है। यूएनईपी की वेबसाइट पर दिए गए आंकड़ों के अनुसार, 1950 से 2017 तक दुनिया में 7 से 9.2 अरब टन प्लास्टिक का उत्पादन हुआ। इसमें बीते पांच सालों का दो सौ करोड़ टन और जोड़ लिया जाए तो यह कम से कम दस-ग्यारह अरब टन हो जाएगा।
अब सोचिए कि इस प्लास्टिक का करीब आधा हमारी मिट्टी में, हमारे जल स्रोतों में, कचरे के अंबार में समाया हुआ है। आठ अरब की आबादी और इतने ही टन प्लास्टिक। हर आदमी पर करीब एक टन प्लास्टिक का बोझ। सोचिए हम कितनी ज्यादा विस्फोटक स्थिति में जी रहे हैं। प्लास्टिक जैसे किसी राक्षस की तरह हमारी नदियों, झीलों और समुद्रों को प्रदूषित कर जल जीवन को नष्ट कर रहा है, मिट्टी में मिलकर उसकी उत्पादकता नष्ट कर रहा है, तरह-तरह से हमारी सेहत पर बुरा असर डालकर हमारी जिंदगी को छोटा कर रहा है।
सिंगल यूज प्लास्टिक के जोखिम
पर्यावरण और सेहत, दोनों के लिहाज से प्लास्टिक का सबसे खतरनाक रूप सिंगल यूज प्लास्टिक है। यह न तो डिकंपोज होता है और न इसे जलाना उचित होता है। इसके टुकड़ों से हवा में जहरीले रसायन फैलते हैं, जो सभी जीवित प्राणियों के लिए हानिकारक होते हैं। इनका कचरा जमीन पर फैलकर बरसात के पानी को धरती में जाने से रोकता है। इससे भूजल के स्तर में कमी आती है। पहाड़ों पर भी हमने पर्यटन के नाम पर प्लास्टिक वेस्ट के अंबार लगा दिए हैं।
हमारा देश, दुनिया के उन देशों में से है, जिसकी सीमाओं का और जमीन का एक बड़ा हिस्सा समुद्र से घिरा है। नदियों और नालों के रास्ते हम हर दिन हजारों टन प्लास्टिक समुद्र में पहुंचाते हैं। बाकी दुनिया का हाल तो और भी बुरा है। कुल मिलाकर सालाना 1.9 से 2.3 करोड़ टन कचरा पानी में समा जाता है। यहां वह समुद्र की पारिस्थितिकी को नष्ट करता है। यहां तक कि आर्कटिक जैसा निर्जन भी इससे अछूता नहीं रहा है।
पिछले साल जर्मनी के अल्फ्रेड वेगनर इंस्टिट्यूट के रिसर्चरों ने अपने अध्ययन में पाया था कि लहरों, हवाओं और नदियों के रास्ते पैकेजिंग मैटेरियल, कपड़े व पर्सनल केयर उत्पाद आर्कटिक महासागर में पहुंचकर उसकी आबोहवा को बिगाड़ रहे हैं। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय की, 'अवर वर्ल्ड इन डेटा' की 2021 की रिपोर्ट के मुताबिक महासागरों में दुनिया भर से हर साल जितना प्लास्टिक जाता है, उसका लगभग 80 फीसदी एशियाई नदियों से आता है।
भारत में पिछले साल सिंगल यूज प्लास्टिक से बने स्ट्रॉ, कटलरी, झंडे, आइसक्रीम या कैंडी स्टिक, प्लेट, कप जैसे 19 आइटमों के उत्पादन और बिक्री पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी गई थी। बनाने वाले को सात साल की कैद और एक लाख तक के जुर्माने की सजा का प्रावधान किया गया था। अमेरिका, इंगलैंड, ताइवान जैसे सोलह देश हमसे पहले ही इसे प्रतिबंधित कर चुके हैं।
सेहत का दुश्मन माइक्रो प्लास्टिक
प्लास्टिक का अतिक्रमण अब सिर्फ पहाड़, खेतों, समंदर तक ही सीमित नहीं रहा है। माइक्रो प्लास्टिक के रूप में वह हमारे शरीर के भीतर भी प्रवेश कर चुका है। ब्राजील में पहली बार इसे जीवित मनुष्यों के फेफड़ों में मौजूद पाया गया। वहां तेरह लोगों की सर्जरी की गई, उनमें से ग्यारह के फेफड़ों में पैकेजिंग में इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक के पॉलीप्रोपाइलिन व पीईटी जैसे कण मिले। इसके बाद एनवायरमेंट इंटरनेशनल जर्नल में प्रकाशित एक स्टडी में दावा किया गया था कि 22 लोगों के ब्लड सैंपल लिए गए, जिनमें लगभग सभी के खून में माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी पाई गई।
इसी साल फरवरी में तो और भी चौंकाने वाली बात सामने आई। पब्लिक लाइब्रेरी ऑफ साइंस के जर्नल प्लॉस वन में एक स्टडी प्रकाशित हुई, जिसमें बताया गया था कि एक मरीज के दिल की बाईपास सर्जरी के दौरान उसके टिश्यू में माइक्रोप्लास्टिक की काफी मात्रा मौजूद मिली। यह पहली बार था, जब इंसान की नसों में प्लास्टिक होने का पता लगा था। इसे लेकर यूनिवर्सिटी ऑफ हल और हल यॉर्क मेडिकल स्कूल ने एक संयुक्त अध्ययन किया और पाया कि यह तो बहुत लोगों के साथ हो रहा है। नसों में पाए जा रहे ये सभी पार्टिकल्स पेंट, कपड़ों और पैकेजिंग मैटेरियल बनाने में काम आने वाले अल्केड राल और पॉलीविनाइल एसिटेट के थे।
माइक्रो प्लास्टिक एक ऐसी चीज है, जिसका हमें पता भी नहीं चलता और वह हमारे शरीर में घर बनाता जाता है। प्रत्येक व्यक्ति सॉंस के जरिए, टोंटी के पानी, चीनी, नमक, शहद, बीयर, पैकेज्ड वाटर आदि के जरिए हर साल इसके 74 हजार से एक लाख 21 हजार पार्टिकल्स अपने भीतर खींच लेता है। इसमें 94.4 प्रतिशत योगदान है बोतलबंद पानी का।
माइक्रो प्लास्टिक के कण हमारे शरीर में पहुंचकर तरह-तरह की बीमारियां पैदा करते हैं। इससे कई प्रकार के डायबिटीज, कैंसर, हार्मोन असंतुलन, इम्यूनिटी कमजोर होना, नपुंसकता, बांझपन, बच्चों के मष्तिष्क का अविकसित रह जाना जैसे दुष्परिणाम देखने में आए हैं। प्लास्टिक में बिस्फेनॉल ए पाया जाता है, जो वायु प्रदूषण के जरिए मोटापे के लिए जिम्मेदार जीन को और अधिक ताकतवर व सक्रिय बना देता है। इससे शरीर को ज्यादा खाने की जरूरत महसूस होने लगती है और उसका मोटापा बढ़ने लगता है।
जारी है प्लास्टिक से जंग
सच तो यह है कि प्लास्टिक पॉल्यूशन हमारी धरती और इस पर रहने वाले सभी प्राणियों के जीवन के लिए एक बहुत बड़ा खतरा बना हुआ है। प्लास्टिक चाहे वह नॉर्मल हो या माइक्रोप्लास्टिक हो या बायोडिग्रेडिबेल, सिंगल यूज प्लास्टिक हो या रियूजेबल, किसी भी रूप में वह हमें सुविधाओं से ज्यादा समस्याएं ही दे रहा है और हमें तरह-तरह से भारी नुकसान पहुंचा रहा है।
यह एक ऐसी समस्या है, जिससे छुटकारा पाने के लिए हम सभी को व्यक्तिगत और साझा प्रयास करने की जरूरत है। इसे देखते हुए बहुत से देश प्लास्टिक को तरह-तरह से प्रोसेस भी कर रहे हैं। जैसे कि फिलीपींस में प्लास्टिक फ्लेमिंगो नाम का एक ग्रुप बोतल, सिंगल यूज प्लास्टिक, चॉकलेट के रैपरों आदि का इस्तेमाल कंस्ट्रक्शन मैटेरियल बनाने के लिए कर रहा है और देश में प्लास्टिक कचरे को नदियों में जाने से रोकने की कोशिश में जुटा है। फिनलैंड में पुराने फोन और प्लास्टिक चीजों को फेंकने की बजाए पुनर्उपयोग के लिए तैयार किया जा रहा है। दुनिया भर में इनोवेटर्स इस समस्या के समाधान के उपाय खोजने में लगे हैं और मक्का, शकरकंद, आलू, कैक्टस जैसी चीजों से बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक बना रहे हैं।
हमारा देश भी इसमें पीछे नहीं है। पिछले साल प्रकाशित एक खबर के मुताबिक देश के 11 राज्यों में करीब एक हजार किलोमीटर सड़कें प्लास्टिक के कचरे से बनाई गई हैं। इसमें लगभग दस हजार करोड़ प्लास्टिक बैग के बराबर प्लास्टिक की खपत का अनुमान लगाया गया है ।
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एलन वाइजमैन ने 2007 में प्रकाशित अपनी किताब 'द वर्ल्ड विदआउट अस' में बताया कि धरती पर सारे मनुष्यों के खत्म हो जाने के बाद क्या होगा। किताब के मुताबिक दो दिन के बाद सारे सब-वे पानी में डूबे नजर जाएंगे, दो साल बाद सारी सड़कें जमीन में धंस चुकी होंगी, चार साल बाद सारी इमारतें भरभराकर ढह चुकी होंगी, पॉंच सौ साल में सारे रिहायशी इलाके जंगल में बदल जाएंगे... लेकिन, मानव निर्मित एक चीज हमेशा धरती पर मौजूद रहेगी-वह है प्लास्टिक। यह हवा, बारिश, समुद्रों के प्रहार से टूट सकता है, बारीक कणों और रेशों में बदल सकता है, लेकिन कभी खत्म नहीं होगा।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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