वोट बैंक के राजनीतिक भंवर में क्यों फंसा है भारत का मुसलमान?
Muslim Voter: चुनावी अभियान के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने टाइम्स नाउ चैनल को जो इंटरव्यू दिया है, वह एक तरह से मुस्लिम समुदाय को उनका सीधा संबोधन है। इस साक्षात्कार में मोदी ने मुस्लिम समुदाय से आत्ममंथन करने की अपील की है।
2002 के गुजरात दंगों के बाद नरेंद्र मोदी की विशेषकर मुस्लिम समुदाय में जैसी छवि बनी या बनाई गई, उसकी वजह से मुस्लिम समुदाय को उनका सीधा संबोधन हैरतअंगेज लग सकता है। मोदी के प्रति मुस्लिम समुदाय के बड़े हिस्से की धारणा यही है कि वे उनके विरोधी हैं।

मोदी को लेकर मुस्लिम समुदाय के मन में किस तरह का भाव है, और वह कितना गहरा है, इसका एक उदाहरण कोरोना की महामारी के दौरान इंदौर से आए एक वीडियो से जाहिर होता है। इलाज से कोरोना मुक्त हो चुके एक मुस्लिम परिवार के लोग जब कोरोना केंद्र से अपने घर के लिए निकले तो उन्हें पत्रकारों से मिलवाया गया। एक निश्चित दूरी पर स्थित पत्रकारों ने उस परिवार का फोटो लिया और उनकी प्रतिक्रिया पूछी तो उस परिवार के एक नन्हें बच्चे ने बिना लाग लपेट के कह दिया था कि मोदी को मारेंगे। वह वाकया इस बात का सबूत है कि उस संभ्रांत से दिखने वाले उस परिवार में प्रधानमंत्री मोदी को लेकर कैसी बातें होती होंगी, जिसका असर बच्चे के मन पर पड़ा था।
बहरहाल प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी इस छवि को तोड़ने की कोशिश की है। एक टीवी इंटरव्यू के जरिए उन्होंने मुसलमान समुदाय के पढ़े-लिखे लोगों से अपील की है कि वे आत्ममंथन करें। उन्होंने यह भी कहा कि आप सोचिए कि देश आगे बढ़ रहा है, फिर भी आपके समुदाय में कमी महसूस हो रही है। इसकी वजह क्या है। क्या वजह रही कि कांग्रेस के शासन काल में सरकारी योजनाओं का फायदा मुस्लिम समुदाय को नहीं मिला। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि भारत में जब योग की बात की जाती है तो उसे मुस्लिम विरोधी बता दिया जाता है। जबकि अरब देशों में योग स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल हो गया है।
मुस्लिम वोट बैंक को लेकर यह स्थापित अवधारणा है कि कुछ भी हो जाए, वह भारतीय जनता पार्टी का समर्थन नहीं कर सकता। इसके साथ ही मुस्लिम समुदाय की रहनुमाई करने वाले कुछ दल भी स्थापित हैं। जिनमें सबसे पहला नाम कांग्रेस का आता है। उसके बाद समाजवादी खेमे के दल आते हैं। इन दिनों बिहार में लालू प्रसाद यादव का राष्ट्रीय जनता दल मुस्लिम वोट बैंक पर अपना एकाधिकार मानता है तो उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी को लेकर भी ऐसी ही सोच है।
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी इस समुदाय की इन दिनों बड़ी हमदर्द हैं। एक दौर में कांग्रेस का पूरे देश के मुस्लिम वोट बैंक पर एकाधिकार था। इसके बाद समाजवादियों ने इसमें सेंध लगानी शुरू की। इसके लिए उन्होंने उर्दू की शब्दावली का इस्तेमाल शुरू किया। कांग्रेस के स्वर्णिम दिनों के कोलाइडोस्कोप की खूबसूरती का आधार ब्राह्मण, मुसलमान और दलित मतदाताओं का कोलाज था। लेकिन समाजवादी क्षत्रपों के उभार के बाद मुस्लिम वोट बैंक के एकाधिकार की कांग्रेसी अवधारणा छीजने लगी। इसके साथ ही कांग्रेस का राजनीतिक आधार सिमटने लगा।
दिलचस्प यह है कि मुस्लिम रहनुमाई वाले सभी दलों में एक चीज समान थी। उन्होंने मुस्लिम वोट बैंक को सिर्फ और सिर्फ यह डर दिखाया कि बीजेपी आ जाएगी तो मुसलमानों का नाश कर देगी। एक हद तक बीजेपी की अपनी राजनीति भी इसके लिए जिम्मेदार रही। इसी डर में पूरे देश में मुस्लिम वोट बैंक उस दल की ओर एकमुश्त समर्थन देता रहा, जो बीजेपी को हराने की कूव्वत रखता हो या जिसके जरिए बीजेपी को हराना संभव हो।
मुस्लिम वोट बैंक का यह डर कम से कम पिछले बीस सालों में समाप्त हो जाना चाहिए था। नरेंद्र मोदी ने केंद्रीय सत्ता संभालने के बाद 'सबका साथ सबका विकास और सबका विश्वास' का जो नारा दिया, उसका एक मकसद मुस्लिम समुदाय को भी सहभागी बनाना था। प्रधानमंत्री का ताजा बयान उनके इस नारे का विस्तार कहा जा सकता है।
बीजेपी के कथित डर के आधार पर बने मुस्लिम वोट बैंक को अव्वल तो उन दलों के शासन में सरकारी योजनाओं का भरपूर फायदा मिलना चाहिए था, जिन्होंने उनके वोटों के दम पर सत्ताएं हासिल कीं। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मुस्लिम समुदाय का अधिसंख्य हिस्सा अब भी गरीबी और अशिक्षा की मार झेल रहा है। इससे साबित होता है कि मुस्लिम समुदाय को मुख्यधारा में लाने की उन दलों की ओर से गंभीर कोशिश नहीं हुई, जिन्होंने उन्हें अपने राजनीतिक आधार के लिए वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया और उनके मत के दम पर कभी केंद्र तो कभी राज्य में राज हासिल किया।
वोट बैंक बनने का एक असर यह हुआ कि मुस्लिम समुदाय का एक तबका प्रगति की धारा से जुड़ने में हिचकता रहा। वह खुद को अपने पुराने सामाजिक और राजनीतिक खांचे में ही बांधे रखने में ही अपनी भलाई देखता रहा। इसका असर यह भी हुआ कि मुस्लिम समुदाय का बड़ा हिस्सा आधुनिक शिक्षा से वंचित रहा। उनके मजहबी रहनुमा भी उनको इसी हाल में रखकर अपनी राजनीति साधते रहे।
मुस्लिम समुदाय के अगड़े तबके के लोग शिक्षा हासिल करते रहे, आगे बढ़ते रहे, उनके बच्चे अमेरिका और ब्रिटेन की चमकीली दुनिया में पढ़ने और नौकरी करने के लिए जाते रहे। जबकि जिस तबके के वोट बैंक के आधार पर उन्हें राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक ताकत हासिल हुई, वह तबका पिछड़ा ही रहा। इसका असर यह हुआ कि हर सामाजिक बदलाव को मुस्लिम समुदाय कभी खुद तो कभी अपने कथित नेतृत्व वाले दलों और नेताओं के बहकावे में अपने सामाजिक विकास को अपनी परंपराओं और संस्कृति पर कुठाराघात मानता रहा। इसकी वजह से वह दूसरे समुदायों के साथ सहज ही घुलने-मिलने से बचता रहा।
चुनावों के बीच मुस्लिम समुदाय के प्रगतिवाद विरोधी रूख की ओर ध्यान दिलाकर प्रधानमंत्री मोदी ने डर की बुनियाद पर विकसित मुस्लिम वोट बैंक की ओर जहां मुस्लिम समुदाय का ध्यान दिलाने की कोशिश की है, वहीं इसके जरिए उनकी रहनुमाई करने वाले दलों की ओर सवालिया निशान भी लगा दिया है। प्रधानमंत्री मोदी भी राजनीति में हैं। इसलिए उनके इस बयान में राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश नजर आती है तो इससे इंकार भी नहीं किया जा सकता।
लेकिन यह सच है कि मोदी ने मुस्लिम समुदाय के इस अंतर्विरोध पर मुस्लिम समुदाय के ही लोगों का ध्यान दिलाने की कोशिश करके एक तरह से शांत पड़े तालाब में पत्थर उछाल दिया है। यह बात और है कि इससे उठने वाली लहरें उन दलों के वजूद को चुनौती दे सकती हैं, जिनका बड़ा राजनीतिक आधार मुस्लिम वोट बैंक भी है। चूंकि इस पर चर्चा से मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति करने वाले दलों पर बड़ा सवाल उठ सकता है, शायद यही वजह है कि इस मसले पर जितनी गहन चर्चा होनी चाहिए, वैसी नहीं हो रही है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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