Wedding Season: जब 'विवाह' में व्यापार है, तब दहेज भी कारोबार है

Wedding Season: 23 नवंबर को देवउठनी एकादशी के दिन नारायण निद्रा से जागे तो हिन्दुओं ने अपने पवित्र मांगलिक कार्यों को करना प्रारंभ कर दिया। उनके लिए विवाह से अधिक मांगलिक कार्य भला और क्या होगा? इसलिए नारायण के निद्रा त्यागते ही एक बार फिर देशभर में विवाह की बहार आ गयी। कॉन्फेडरेशन ऑफ आल इंडिया ट्रेडर्स ने अनुमान लगाया है कि इस सीजन में 23 नवंबर से 15 दिसंबर तक मात्र 23 दिन के अंदर लगभग 35 लाख विवाह होंगे जिसमें 4.25 लाख करोड़ का व्यापार होने का अनुमान है। यह लग्न सीजन विवाहित होने वाले जोड़ों से अधिक व्यावसायिक जगत के लिए फायदेमंद होनेवाला है।

भारत परिवार आधारित सामाजिक संरचना है। यहां पारिवारिक और सामाजिक संबंधों पर ही सबसे अधिक धनराशि खर्च की जाती है। कुछ दशक पहले तक विवाह में बाजार का दखल सिर्फ गहनों और कपड़ों की खरीदारी तक सीमित था। इसके अलावा विवाह की पूरी व्यवस्था सामाजिक सहयोग से पूरी की जाती थी। लेकिन बदलते समय के साथ साथ विवाह की पूरी व्यवस्था समाज आधारित होने की जगह बाजार आधारित होती चली गयी। बाजार द्वारा प्रायोजित नित नये प्रयोग ने नयी नयी परंपराओं को जन्म दिया है जिसमें डीजे बैण्ड का शोर ही नहीं बल्कि प्री वेडिंग शूटिंग और डेस्टिनेशन वेडिंग जैसे मंहगे शौक भी विवाह की परंपरा बनते जा रहे हैं।

Wedding Season Estimated business of Rs 4.25 lakh crore in marriage Season

असल में भारतीय समाज किताब आधारित संरचना नहीं है। यह परंपराओं पर आधारित एक लचीली व्यवस्था है जिसमें समय के साथ बदलाव आते जाते रहते हैं। नब्बे के दशक में देश में पूंजीवाद बढ़ा और बाजार ने पैर पसारे तो विवाह संस्कार में भी अपनी जगह बनाते चले गये। समाज ने इसे रोका भी नहीं। कन्याधन के नाम पर वधू पक्ष द्वारा जो कुछ दिया जाता था, वो आमतौर पर कन्या के घरेलू इस्तेमाल का सामान और गहना कपड़ा ही होता था। लेकिन बाजार का दखल बढ़ा तो टीवी, फ्रिज, कूलर या एसी, मोटरसाइकिल या फिर फोर व्हीलर सहित घर का हर साजो सामान दहेज का हिस्सा बन गया।

भारतीय सामाजिक सरंचना ऐसी है कि यहां लड़के का विवाह नहीं होता, बल्कि लड़की का विवाह होता है। लड़की का पिता ही अपनी लड़की के लिए वर की तलाश करता है और विवाह निश्चित करता है। इस व्यवस्था में वर या लड़का सिर्फ पूरक की भूमिका ही निभाता है। विवाह के बाद क्योंकि दोनों को अपनी नयी गृहस्थी शुरु करनी होती है इसलिए कन्या पक्ष अपनी लड़की को गृहस्थी का हर वो सामान देता है जो उसके लिए जरूरी होता है। यह परिवार की संपत्ति में लड़की का हिस्सा भी होता है जो विवाह के समय उसको दे दिया जाता है।

कानूनी रूप से लड़कियां पैतृक संपत्ति में हिस्सेदार तो स्वतंत्रता के बाद बनायी गयीं लेकिन सामाजिक रूप से उनकी यह हिस्सेदारी सदियों पुरानी है। अब क्योंकि कन्या को ही विवाह के बाद वर के घर जाने की प्रथा है तो उसे चल अचल संपत्ति के बराबर कन्याधन के रूप में दे दिया जाता है। लेकिन इधर के कुछ दशकों में दुल्हन ही दहेज है का जो प्रचार हुआ उससे यह भ्रम पैदा करने की कोशिश की गयी कि असल में यह कन्याधन दहेज है और उसकी विदाई सिर्फ दो कपड़ों में ही होनी चाहिए। जो लोग इस प्रचार तंत्र का हिस्सा रहे हैं वो वही लोग हैं जो पिता की पैतृक संपत्ति में बेटी के हिस्सेदारी की बात करते हैं।

ऐसा होने पर पारिवारिक और सामाजिक व्यवस्था बिगड़ती है इसलिए कन्याधन के रूप में उसे पैतृक संपत्ति में हिस्सेदारी देने की यह प्रथा ज्यादा तर्कसंगत रही है। लेकिन जिन लोगों ने दहेज उन्मूलन अभियान चलाया उन्होंने इस व्यवस्था पर गंभीरता से सवाल उठाया। हालांकि सामाजिक रूप से इसमें कोई खास बदलाव नहीं आया जो आज बाजार के लिए सबसे बड़े व्यापार का हिस्सा बन गया है।

भारत में कन्यादान को सबसे बड़ा पुण्य समझा जाता है। अगर किसी को कन्या नहीं है तो किसी दूसरे की लड़की के विवाह में अपना योगदान देकर लोग इस पुण्य का भागी होना चाहते हैं। ऐसे में न केवल वधू पक्ष का परिवार बल्कि उनके रिश्तेदार और सगे संबंधी भी इस विवाह के मौसम में खूब खरीदारी करते हैं। इससे बाजार को जो बल मिलता है उससे भारतीय अर्थव्यवस्था की नींव मजबूत होती है।

भारत में उत्सव पर्व तथा विवाह ये बाजार के लिए व्यापार के दो प्रमुख अवसर बन गये हैं। व्यापारिक घरानों का अपना आंकलन और अध्ययन है कि विवाह पर जो खर्च होता है उसमें एक सीजन में ही 60 हजार करोड़ के गहने खरीदे जाते हैं। इसके बाद कपड़ों का बाजार, कंज्यूमर आइटम का बाजार भी बम बम रहता है। व्यावसायिक घरानों के अध्ययन के अनुसार ही देखें तो सालाना 8 से 10 लाख करोड़ का व्यापार विवाह से उत्पन्न होता है। इसमें न सिर्फ दहेज का सामान, गहने, कपड़े, कन्ज्यूमर आइटम बल्कि परिवहन, टूरिज्म, होटल इंडस्ट्री को भी तगड़ा कारोबार मिलता है और करोड़ों लोगों को रोजगार भी।

भारत में विवाह हर कारोबारी के लिए कुछ न कुछ व्यावसायिक अवसर पैदा करता है। कन्फडरेशन ऑफ आल इंडिया ट्रेडर्स के ताजा अध्ययन को ही देखें तो भारत में विवाह के अलग अलग बजट हैं। शुरुआत 3 लाख से होती है। जिन विवाहों का इस सीजन में आंकलन किया गया है इसमें से लगभग 6 लाख विवाह ऐसे होंगे जिनका बजट 3 लाख तक होगा। इसके बाद 10 लाख विवाह ऐसे होंगे जिनमें प्रति विवाह 6 लाख रूपये तक खर्च होगा। इसके बाद लगभग 12 लाख विवाह ऐसे होंगे जिनमें औसत 10 लाख रूपये तक खर्च होगा। 6 लाख विवाह ऐसे होंगे जिनका बजट 25 लाख तक होगा। 50 हजार शादियां ऐसी होंगी जिनमें 50 लाख से एक करोड़ तक का खर्च होगा। जबकि 50 हजार विवाह ऐसे होंगे जिनका बजट एक करोड़ से ऊपर होगा।

इस तरह विवाह बाजार के हर हिस्से के लिए कुछ न कुछ कारोबार पैदा करते हैं। अगर डिजाइनर ड्रेस का कारोबार करनेवाले बिजनेस पाते हैं तो कपड़े के छोटे कारोबारी भी अपने लिए व्यापार का अवसर पाते हैं। ऐसे ही हर सेक्टर में ऊपर से लेकर नीचे तक विवाह सबके लिए कुछ न कुछ कारोबार और रोजगार पैदा करता है। अब तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी अपने मन की बात में डेस्टिनेशन वेडिंग पर सवाल उठाया है। अगर देश के बाहर जाकर विवाह करनेवालों की संख्या में कमी आती है तो यह कारोबार भी भारत में ही बढ़ेगा।

लेकिन मुश्किल यह है कि अगर विवाह एक समृद्ध व्यापार हो चुका है तो दहेज वाली व्यवस्था पर कुछ लोग सवाल कैसे उठायेंगे। अब जिस तरह ये विवाह पूरी तरह से बाजार के कारोबार का जरिया बन गये हैं उससे दहेज या मंहगी शादियों पर सवाल उठाना कारोबार पर सवाल उठाने जैसा होगा, जो 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर भारत के व्यापार जगत को तो बिल्कुल पसंद नहीं आयेगा।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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