Waheeda Rehman: किसी करिश्मे से कम नहीं वहीदा रहमान का 72 साल लंबा फिल्मी कैरियर
यह उनकी सबसे चर्चित फिल्म 'गाइड' का ही करिश्मा था कि जैसे ही 26 सितंबर को वहीदा रहमान के लिए दादा साहेब फाल्के सम्मान की घोषणा हुई, गाइड के गाने 'आज फिर जीने की तमन्ना है' पर एक वृद्धा का डांसिंग वीडियो वायरल हो गया। दुनिया ने मान लिया कि ये वहीदा रहमान ही हैं, जबकि वह उनकी कोई प्रशंसक थी।

1955 से 2021 के बीच फिल्मी दुनिया का संभवत: सबसे लंबा कैरियर अपने नाम करने वाली वहीदा रहमान ने गाइड फिल्म अपनी जिद्द के कारण की थी क्योंकि बहुत सारे प्रशंसक और निर्माता उनको यह फिल्म न करने के लिए कह रहे थे। इस फिल्म में उनका रोल एक्स्ट्रा मेरिटल अफेयर्स वाला था। प्रशंसकों और निर्माताओं ने कहा कि इससे तो आपकी छवि खराब हो जाएगी, हमारी फिल्म का क्या होगा? लेकिन वहीदा अड़ी रहीं। उन्हें कुछ प्रयोग करना था। फिल्म इतनी सफल हुई कि भारत की तरफ से ऑस्कर के लिए ऑफीशियल एंट्री बनी। इसी फिल्म के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पहला फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला था।
दबाव में आना वहीदा की फितरत में शुरू से ही नहीं था। पहली बार उनकी मां मुमताज बेगम उन्हें लेकर राज खोसला की फिल्म 'सीआईडी' के सेट पर आईं थीं, विशाखापत्तनम से मुंबई। गुरुदत्त जैसा प्रतिष्ठित निर्देशक उन्हें ब्रेक दे रहा था और वह शर्तें रख रही थीं कि अपना नाम नहीं बदलूंगी, जो उन दिनों बड़ा चलन था। कपड़े वही पहनूंगी, जो मुझे भी अच्छे लगेंगे आदि। वहीदा ने साफ कहा कि जरूरत हो तो दिन में 24 घंटे काम करवा लो, लेकिन अपनी शर्तों पर ही करूंगी।
वहीदा ने यह शर्त भी रख दी कि रात साढ़े नौ बजे के बाद फिल्म से जुड़ा कोई भी व्यक्ति चाहे वो गुरुदत्त ही क्यों ना, फोन नहीं करेगा। इसकी वजह बाद में उन्होंने इंटरव्यू में बताई कि मां दिल की मरीज थीं, रात को बाकी बेटियों के साथ फोन पर बात करती थीं और अपनी मां को जरा भी तनाव में नहीं देखना चाहती थीं। कितना भी बड़ा स्टार हो अपनी बात रखने से कभी नहीं हिचकीं। जब राज कपूर ने फिल्म 'तीसरी कसम', जो फणीश्वर नाथ रेणु की किताब 'मारे गए गुलफाम' पर आधारित थी, का अंत सुखांत करने का तय किया तो रेणु के साथ वहीदा ने भी विरोध किया। लेकिन राजकपूर माने नहीं, फिल्म को तब उतनी कामयाबी नहीं मिली थी, लेकिन नेशनल अवॉर्ड मिला और क्लासिक फिल्मों में शामिल हुई।
जब वहीदा रहमान को दादा साहेब फाल्के सम्मान के लिए सूचना प्रसारण मंत्रालय की तरफ से किसी महिला अधिकारी का फोन गया, तो उन्होंने उसे प्रतिक्रिया देने से मना कर दिया। कहा कि जब आधिकारिक ऐलान होगा तब कोई प्रतिक्रिया दे पाऊंगी। आधे घंटे बाद मंत्री अनुराग ठाकुर के ट्वीट के बाद ही उन्हें भरोसा हुआ।
जिस दिन उन्हें दादा साहेब फाल्के अवार्ड देने का ऐलान हुआ वह दिन भी बेहद खास था। उनके सबसे पहले हीरो देवआनंद की 100वीं जयंती थी। मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में आने से पहले वह केवल देवआनंद की फैन थीं। ऐसे में देवआनंद के साथ पारी की शुरूआत करना उनके लिए सुखद था। तभी 'सीआईडी' के सेट पर जब वहीदा ने उन्हें 'देव साहब' कहकर पुकारा तो देव आनंद की प्रतिक्रिया थी कि कौन देव साहब? यहां कोई देव साहब नहीं हैं। उन्होंने मना कर दिया कि देव साहब मत कहो, सिर्फ देव कहो, जो मेरा ये नाम नहीं लेता, उसके साथ मैं काम नहीं कर पाता।
लेकिन देव साहब ना होते तो वह फिल्मी दुनिया से वापस ही लौट गई होतीं। सीआईडी के बाद देव आनंद के साथ वहीदा ने दो और फिल्में साइन कीं, 'सोलवां साल' और 'रूप की रानी चोरों का राजा'। लेकिन बीच में ही मां की हार्ट अटैक से मौत हो गई तो वहीदा टूट गईं और मुंबई और एक्टिंग दोनों छोड़ने का मन बना लिया। लेकिन देव साहब ने समझाया कि जब किसी से शादी करने का भी विचार नहीं है, तो शादीशुदा दोनों बहनों के साथ जिंदगी बिताकर क्या करोगी? पहले ये दो फिल्में पूरी करो, फिर सोचना। वहीदा के लिए ये राय अनमोल बन गई।
एक दौर में मुंबई फिल्म इंडस्ट्री के त्रिमूर्ति के तौर पर विख्यात थे राज कपूर, दिलीप कुमार और देव आनंद। गिनती की हीरोइन थीं, जो तीनों के ही साथ परदे पर सुपरहिट फिल्में दे पाई थीं। वहीदा रहमान उन गिनती की तारिकाओं में शामिल थीं। दिलीप कुमार के साथ उन्होंने चार फिल्में कीं, 1966 में 'दिल दिया दर्द लिया', 1967 में 'राम और श्याम', 1968 में 'आदमी' और 1984 में 'मशाल'। हालांकि केवल 'राम और श्याम' को ही जनता ने अपना खुलकर प्यार दिया।
1963 में उनकी राजकपूर के साथ पहली फिल्म 'एक दिल सौ अफसाने' भी नहीं चली, लेकिन दूसरी फिल्म ने तो इतिहास रच दिया। इस मूवी को मास्को फिल्म फेस्टीवल में स्पेशल एंट्री भी मिली। ये फिल्म थी 'तीसरी कसम'। चूंकि तीसरी कसम में राजकपूर उन्हें 'मालकिन' बुलाते थे, तो तब से मालकिन ही कहना शुरू कर दिया।
तमिलनाडु में जन्मी उस दौर के मद्रास प्रांत के कई शहरों में रहीं। वहीदा रहमान को तीन वजहों से मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में पसंद किया गया। पहला तो उनको उर्दू-हिंदी बोलने का अच्छा अभ्यास था। दूसरे उस दौर में उनको भरत नाट्यम जैसे भारतीय क्लासिक नृत्यों में महारत हासिल थी। तीसरे साड़ियों का जो फैशन उन्होंने चलाया, दशकों तक लोगों ने उसे सराहा। 1984 में 'मशाल' फिल्म की शूटिंग के दौरान उनकी सहयोगी अभिनेत्री रति अग्निहोत्री उनसे अनुमति लेकर एक बार उनके मेकअप रूम में ही घंटों बैठी रहीं, और बस उन्हें निहारती रहीं।
वहीदा रहमान के पिता मोहम्मद अब्दुर रहमान विशाखापतनम के डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर थे और जब बेटी को भरतनाट्यम की क्लास में 13 साल की उम्र में ही भेजा तो रिश्तेदार पूछने लगे, कि क्या मुसलमान लड़की को नचाओगे? लेकिन ऐसे उदार पिता का साया बस उनके सिर से तभी उठ गया जब उनकी 17 साल की उम्र थी, मां भी जल्दी ही चली गईं।
एक समय था जब वहीदा और गुरुदत्त के प्रेम के बड़े चर्चे थे और उस कारण गुरुदत्त का अपनी पत्नी गीता दत्त से भी रिश्ता प्रभावित होने लगा। दोनों शराब के नशे में अपना गम दूर करने लगे। इमोशनल गुरुदत्त अंदर से टूट गए और आत्महत्या कर ली। लेकिन गुरुदत्त के प्रति वहीदा के मन में हमेशा सम्मान रहा। उनको वहीदा अपने संरक्षक की तरह मानती थीं।
पचास साल बाद भी वहीदा रहमान ने कभी गुरुदत्त की क्लासिक फिल्मों का रत्ती भर भी श्रेय नहीं लिया, चाहे वो 'प्यासा' हो या फिर 'कागज के फूल', 'चौदहवीं का चांद' हो या फिर 'साहिब बीवी और गुलाम'। आज भी यही कहती हैं कि वो सब गुरुदत्त की फिल्में थीं, मैं तो बस किसी भी तरह उनका हिस्सा बन गई। 'प्यासा' में उन्हें एक सीन में हीरो विजय की मौत की खबर अखबार में पढ़कर चीखने का रोल करना था, लेकिन उन्हें ये काफी मुश्किल लगा, तो गुरुदत्त ने मजाक में कहा, अरे.. लड़कियां तो किसी भी बात पर चीखने लगती थीं, तुम्हें क्या दिक्कत है? लेकिन फिर सीन को आसान किया और कहा कि तुम बस अखबार को दुख से मसल दो और फिर कैमरा झुका देंगे। तब सीन शूट हुआ।
उन दिनों वहीदा रहमान की आदत थी कि हर समय अपना कैमरा लेकर चलती थीं, और अपने साथी कलाकारों और सेट की तस्वीरें लेती रहती थीं। उनका ये शौक शादी के बाद भी चलता रहा और आज भी है। कभी भी अपने दोस्तों के साथ दुनिया के किसी भी दुर्गम कोने में वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफी करने निकल जाती हैं। डांस उनका जुनून था और पेंटिंग में भी हाथ आजमा लेती हैं। 87 साल की इस उम्र मे भी उन्होंने पेंटिंग की क्लास ज्वॉइन की।
1964 में फिल्म शगुन के सौट पर वह अपने राजकुमार से मिलीं, नाम था शशि रेखी यानी कमलजीत। महबूब खान उनको लेकर 'सन ऑफ इंडिया' नाम की एक फिल्म भी बना रहे थे, लेकिन वो डब्बा बंद हो गई। उनका दिल टूट गया और वो भारत छोड़कर कनाडा में बस गए, और वहां बुटीक का बिजनेस शुरू कर दिया। दोनों एक दूसरे को पसंद करने लगे थे, लेकिन कभी कह नहीं पाए थे, तब दूत की भूमिका में उनके दोस्त आए यश जौहर। दोनों के दिल की बातें एक दूसरे को बताईं, तब जाकर शादी हुई।
वहीदा और कमलजीत ने एक फिल्म साथ में की थी, जिसका नाम था "शगुन"। इस फिल्म का एक गीत "पर्बतों के पेड़ों पर शाम का बसेरा है" बेहद लोकप्रिय हुआ। शादी के बाद वहीदा बंगलौर बस गईं, कभी कभी बॉम्बे आतीं तो बस अमिताभ बच्चन की अदालत या नमक हलाल जैसी फिल्में करने या फिर यश चोपड़ा की मशाल और लम्हे जैसी फिल्में करने। वर्ष 2000 में पति की मौत के बाद उन्होंने फिर से मुंबई की फिल्में करना शुरू कर दिया, रंग दे बसंती, दिल्ली 6 और ओम जय जगदीश आदि।
इस तरह उन्होंने अपने 87 साल की उम्र में लगभग 72 साल अभिनय करते हुए गुजारे हैं। मात्र 15 साल की उम्र में तेलुगु फिल्म से पर्दे पर आनेवाली वहीदा रहमान 2021 तक अभिनय करती रहीं। ऐसे में दादा साहेब फाल्के अवार्ड के लिए उनसे बेहतर नाम भला और कौन हो सकता है।












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