Tunnel Collapse: सिलक्यारा की सुरंग में फंस गया तेज गति का विकास?
Tunnel Collapse: सालभर के भीतर पहाड़ से दूसरी बुरी खबर आयी है जिसका कारण पहाड़ में चल रही विकास परियोजनाएं हैं। पहले जनवरी में जोशीमठ में हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट के कारण पहाड़ दरकने की खबर और अब उत्तरकाशी में निर्माणाधीन सुरंग के बैठ जाने की खबर। एक सप्ताह से 41 लोग एक अंधेरी बंद सुरंग में फंसे हुए हैं और जल्द से जल्द उन्हें बाहर निकालने का प्रयास किया जा रहा है। लेकिन दुर्भाग्य कुछ ऐसा है कि अब तक के सारे प्रयास असफल ही साबित हुए हैं।
हालांकि केन्द्र सरकार और सड़क परिवहन मंत्रालय की ओर से इन 41 मजदूरों को बाहर निकालने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ी जा रही है। एक मशीन फेल हो रही है तो दूसरी मंगाई जा रही है और हम सबको उम्मीद करनी चाहिए कि जल्द से जल्द सभी मजदूर सुरक्षित रूप से बाहर निकल आयेंगे। लेकिन उत्तराखंड के सिलक्यारा सुरंग में जो हादसा हुआ है वह उस चारधाम परियोजना पर सवाल खड़ा कर देता है। क्या इस चारधाम सड़क परियोजना के लिए पर्यावरणविदों द्वारा जो आशंका जताई गयी थी, वह सही साबित हुई है? क्या पहाड़ को तेज औद्योगिक विकास की अभी और कीमत चुकानी पड़ेगी?

उत्तरकाशी की सिलक्यारा सुरंग को जब 2018 में मंजूरी मिली थी तब सरकारी विभागों द्वारा दावा किया गया था कि यह इस चार धाम परियोजना की सबसे लंबी सुरंग होगी। इसकी लंबाई होगी साढे चार किलोमीटर और इसे बनाने पर कुल खर्च आयेगा लगभग 1400 करोड़ रूपया। ऐसी विषम परिस्थिति में बननेवाली परियोजनाओं को एक इंजीनियरिंग चुनौती के रूप में ही लिया जाता है और उसे पूरा करने के बाद वैज्ञानिक और तकनीकी उपलब्धियों का बखान भी किया जाता है। लेकिन सिलक्यारा सुरंग में 30 से 70 मीटर तक भरभराकर धंसे पहाड़ ने मानों सभी वैज्ञानिक उपलब्धियों को धता बता दिया है। सभी तकनीकी उपलब्धियां सुरंग में फंसे मजदूरों को बाहर निकालने में अभी तक बौनी साबित हुई हैं। वह अमेरिकन ऑगर मशीन भी 22 मीटर की एस्केप टनल बनाने के बाद फंस गयी जिसे बहुत उम्मीद से मंगाया गया था। अब दूसरी अमेरिकन ऑगर मशीन इंदौर से देहरादून पहुंचाई गयी है।
जब इस सिलक्यारा सुरंग का प्रस्ताव तैयार किया गया था तब कहा गया था कि इससे यमुनोत्री जाने का रास्ता एक घण्टा कम हो जाएगा और सालभर इसके जरिए यमुनोत्री तक पहुंचा जा सकता है। वैसे तो यमुनोत्री धाम भारी बर्फबारी के कारण साल के पांच महीने बंद रहता है लेकिन इन सड़कों का निर्माण अकेले तीर्थयात्रियों के लिए ही नहीं किया जा रहा है। भारत चीन सीमा पर सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाये रखने, सीमा पर स्थित चौकियों तक समय से सैन्य साजोसामान और अन्य रसद पहुंचाने के लिए जरूरी था कि उत्तराखंड में चीन सीमा तक सड़क मार्ग और रेलमार्ग दोनों को सुगम बनाया जाए।
मोदी सरकार ने इस दिशा में निर्णायक पहल करते हुए न केवल चार धाम यात्रा के रास्तों को बेहतर बनाने का कार्य शुरु करवाया बल्कि कर्णप्रयाण तक रेल लाइन पहुंचाने का काम भी इस समय तेज गति से चल रहा है। जब इन परियोजनाओं को मंजूरी दी गयी और इन पर काम शुरु हुआ उस समय कुछ पर्यावरणविदों ने 'कच्चे पहाड़' का हवाला देकर इसे रोकने की मांग की थी। 2018 में सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका भी दाखिल की गयी जिसमें दावा किया गया कि ये परियोजनाएं पहाड़ के लिए विनाशकारी साबित होंगी।
उस समय सुप्रीम कोर्ट भी उनकी बात से लगभग सहमत था लेकिन जब केन्द्र सरकार ने रक्षा जरूरतों का हवाला दिया तो सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार के तर्क को सही माना और दोनों परियोजनाओं को हरी झंडी दिखा दी। इसके बाद से लगभग 12,000 करोड़ की चारधाम सड़क परियोजना तेज गति से आगे बढ रही है। हालांकि इस बीच कुछ हादसे एवं दुर्घटनाएं भी होती रहीं लेकिन बड़ी परियोजनाओं में छिटपुट घटनाओं की आशंका तो हर जगह रहती ही है।
लेकिन इस परियोजना पर पर्यावरणविदों और भूगर्भशास्त्रियों की जो मुख्य आपत्ति थी वो सड़क की नहीं बल्कि सड़क की चौड़ाई को लेकर थी। सड़कें पहले भी थीं जो बारिश के दिनों में अक्सर पहाड़ का मलबा गिरने से बंद हो जाया करती थीं। ऐसे में सड़क परिवहन मंत्रालय ने जो योजना बनाई उसके मुताबिक 12 मीटर चौड़ी टू लेन सड़कों के जरिए चार धाम को जोड़ना था। इसके लिए बहुत व्यापक स्तर पर पहाड़ों को काटा गया है जिसके कारण न केवल बहुत बड़ी संख्या में मलबा निकला बल्कि 56 हजार से अधिक पेड़ों की कटाई भी की गयी।
इस परियोजना में जिन पेड़ों की कटाई की गयी उसमें औषधीय वृक्ष या फिर ऐसे पेड़ या झाड़ियां थीं जो पहाड़ को दरककर नीचे आने से रोकने में मदद करती थीं। इस बात की आशंका सड़क परिवहन मंत्रालय को भी थी इसलिए इस योजना में जहां जहां बारिश के दिनों में पहाड़ का मलबा गिरने से सड़क बंद हो जाती थी, वहां वहां पत्थर का रिटेनिंग वॉल बनायी गयी है। लेकिन इतने भर से हादसे रुक जाएंगे, इसे उत्तराखंड के पहाड़ों को करीब से समझनेवाला व्यक्ति कभी नहीं मानेगा।
उत्तराखंड के पहाड़ भुरभुरी मिट्टी और और चट्टानों का मिश्रण हैं। इसलिए आसान भाषा में इन्हें कच्चे पहाड़ कहा जाता है जो बारिश के दिनों में जगह जगह दरककर नीचे की ओर आ जाते हैं। उत्तराखंड के पहाड़ हिमालय रेन्ज में सबसे नये पहाड़ कहे जाते हैं जिनका अभी निर्माण और विकास जारी है। इसलिए यहां भारी मशीनरी का इस्तेमाल करके भारी भरकम परियोजनाओं को लेकर हमेशा से ही सवाल उठते रहे हैं। टिहरी बांध परियोजना आज बनकर तैयार है लेकिन जिन दिनों यह परियोजना बन रही थी इसके विरोध में आंदोलन कभी बंद ही नहीं हुए।
पूरे पहाड़ के गलियारों में नदियों का जाल बिछा हुआ है। थोड़ा ऊपर जाने पर ग्लेशियर और बर्फीली चोटियां हैं। इसलिए उत्तराखंड एक जटिल प्राकृतिक व्यवस्था वाला प्रदेश बन जाता है। पहाड़ के साथ जरा सी छेड़छाड़ कब बड़ी आपदा को निमंत्रण दे दे इसकी भविष्यवाणी कोई नहीं कर सकता। 2013 का केदारनाथ हादसा अभी भी लोग भूले नहीं होंगे जब हजारों लोग देखते ही देखते काल के गाल में समा गये। 6500 लोग तो आधिकारिक रूप से मृत घोषित किये गये लेकिन उस हादसे में जानें इससे ज्यादा ही गयी थीं। इसी तरह फरवरी 2021 में धौलीगंगा हाइड्रो प्रोजेक्ट में अचानक आयी आपदा से 300 लोग बह गये थे और करोड़ों रूपये का नुकसान हुआ था।
ऐसा इसलिए होता है क्योंकि बादल फटने की घटनाएं पहाड़ में आम होती हैं। एक बार बादल फटता है तो किस नदी में कितना पानी पहुंचा देता है इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। ऐसे में पहाड़ में बड़ी परियोजनाओं पर काम करना ही नहीं, वहां रहकर जीवन जीना भी किसी चुनौती से कम नहीं होता। जो वहां रहते हैं वो उत्तराखंड के पहाड़ों के इस स्वभाव को खूब अच्छे से समझते हैं। इसलिए उत्तराखंड में जितने स्थानीय देवी देवता हैं उतने शायद देश के किसी हिस्से में नहीं होंगे। इसका कारण सिर्फ इतना है कि जहां मनुष्य की अपनी क्षमताएं खत्म होने लगती है वहां वह पराभौतिक शक्तियों के भरोसे हो जाता है।
इसलिए आज जब सिलक्यारा सुरंग में 40 जिन्दगियां फंसी हुई हैं तो वहां के स्थानीय लोग कह रहे हैं कि ऐसा बौखनाथ देवता के नाराज होने के कारण हुआ है। जब सिलक्यारा सुरंग पर काम शुरु हो रहा था तब वहां के स्थानीय देवता बौखनाथ के मंदिर को तोड़कर उन्हें वहां से हटा दिया गया था। सरकारी प्रोजेक्ट को सर्वोपरि रखनेवाली व्यवस्था के लिए ऐसा करना बहुत सामान्य बात होती है लेकिन इस तरह के अतिक्रमण तब चर्चा का विषय बन जाते हैं जब कोई हादसा हो जाता है। जैसे इस समय सिलक्यारा में हो गया है।
सराकारी मशीनरी और आधुनिक विज्ञान के सहारे प्रकृति को चुनौती देती विकासवादी सोच को यह समझना होगा कि हर चुनौती पूरा करने के लिए नहीं होती। खासकर तब जब वो प्रकृति के रहस्यमय गर्भ से निकलती हो। जब सदियों से वहां रहनेवाले लोग पहाड़ को देवता मानकर उसकी शरण में रहते हैं तो फिर तकनीकी और विज्ञान को बेजा चुनौती देने की जरूरत क्या है? कम से कम प्राकृतिक रूप से संवेदनशील स्थानों पर इस बात का पूरा विचार करना ही चाहिए वरना सिलक्यारा जैसी घटनाएं आनेवाले समय में भी होती रहेंगी और तेज गति के विकास का पहिया पूरा जोर लगाकर भी आगे नहीं बढ़ पायेगा।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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