Harishankar Tiwari: माफिया, बाहुबली या नेता, आखिर कौन थे हरिशंकर तिवारी?
एक दौर में राजनीति में बाहुबल का इस्तेमाल करके पूरे प्रदेश में तहलका मचाने वाले हरिशंकर तिवारी का निधन हो गया है। आखिर कौन थे हरिशंकर तिवारी जिन्हें राजनीति में माफियागिरी का सिरमौर कहा जाता था?

Harishankar Tiwari: गोरखपुर में हाता वाले हरिशंकर तिवारी 16 मई को 90 साल की उम्र में जब संसार से विदा हुए तब उनका नाम और काम दोनों उनके घर की चारदीवारी तक सीमित हो चुके थे। माफिया नेता या बाहुबली विधायक जैसे उपनाम यूपी के दूसरे नेताओं के साथ जुड़ चुका है। ठाकुर बाभन की जातीय प्रतिद्वंदिता की जगह सांप्रदायिक ध्रुवीकरण ने ले ली है। जिस गोरखनाथ मठ की मठाधीशी के खिलाफ कभी प्रशासन ने ही मदद करके 'पंडित हरिशंकर तिवारी' का हाता बनवाया था, उस गोरखनाथ मठ के महंत प्रदेश के मुख्यमंत्री बन चुके हैं।
आखिरी बार हरिशंकर तिवारी और उनका हाता तब चर्चा में आया था जब सीबीआई ने 2020 में उनके आवास पर छापेमारी की थी। यह छापेमारी भी बेटे बहू की आर्थिक धोखाधड़ी के कारण की गयी थी। यही कारण है कि जब उनका निधन हुआ तो उन्हें अंतिम विदाई देने कोई भारी भीड़ नहीं उमड़ी। देश प्रदेश में उनके मौत की चर्चा तो हुई, खबर भी बनी लेकिन उनके वर्तमान के कारण नहीं, बल्कि उनके इतिहास के ही कारण।
हरिशंकर तिवारी को राजनीतिक और अपराध जगत में भी पंडित जी कहा जाता था। हालांकि प्रत्यक्ष तौर पर वो जीवनभर राजनीति ही करते रहे लेकिन उनके नाम की चर्चा हुई तो उनके बाहुबल की चर्चा जरूर हुई। यूपी के पूर्वांचल में एक दौर में जब टीवी और इंटरनेट की पहुंच नहीं थी, तब गांव गांव उनसे जुड़ी कहानियां किसी अदृश्य देवदूत की तरह सुनाई जाती थी। ऐसे किस्सों में उनकी राजनीतिक उपलब्धियों की चर्चा कम, उनके बाहुबल की कहानियां अधिक होती थी। अस्सी नब्बे के दशक में गोरखपुर का दूसरा मतलब हरिशंकर तिवारी होता था।
इसी दौर में पहली बार 1985 में वो जेल से ही चिल्लूपार के विधायक बने। इस तरह जेल में रहकर देश का पहला विधायक बनने का रिकॉर्ड उनके नाम दर्ज हो गया। इसके बाद 1989, 91, 93 , 96 और 2002 तक वह लगातार विधायक बनते रहे। लेकिन जेल में रहकर चुनाव जीतने से उनकी जो बाहुबली विधायक की छवि बनी तो फिर कभी खत्म नहीं हुई।
प्रदेश में कोई ऐसा दल नहीं था जिसके साथ वो न गये हों। कांग्रेस, भाजपा, सपा और बसपा समय समय पर अपनी जरूरत के अनुसार सबके साथ गये लेकिन अपना स्वतंत्र अस्तित्व भी बनाकर रखा। कांग्रेस में उनकी गहरी पैठ थी और एआईसीसी के सदस्य भी रहे। लेकिन कांग्रेस के पतन के साथ तिवारी भी पहले भाजपा फिर बाकी दलों का साथ लेते, छोड़ते रहे। 1997 में राजीव शुक्ला, श्याम सुंदर शर्मा और बच्चा पाठक के साथ उत्तर प्रदेश में अखिल भारतीय लोकतांत्रिक कांग्रेस के संस्थापक सदस्य भी रहे। वर्ष 1998 के बाद प्रदेश में चाहे जिसकी भी सरकार बनी हो, उसमें हरिशंकर तिवारी का कैबिनेट मंत्री बनना एक तरह से पहले से ही तय हो जाता था। हरिशंकर तिवारी 4 मुख्यमंत्रियों कल्याण सिंह, राजनाथ सिंह, मायावती और मुलायम सिंह के मंत्रिमंडल में कैबिनेट मंत्री रहे।
कहा जाता है कि जब कभी राजनीति के अपराधीकरण की चर्चा होती है तो हरिशंकर तिवारी का नाम सबसे पहले आता है। एक दौर में मोस्ट वांटेड रहे हरिशंकर तिवारी ने ही माफिया गिरोहों के सरगनाओं को सत्ता की राह दिखाई और राजनीति में रहते हुए कानून से कबड्डी कैसे खेली जा सकती है इसका हुनर भी सिखाया।
हरिशंकर तिवारी की कद काठी छोटी और सामान्य थी लेकिन ख्वाब बड़े थे। हार मानने के लिए वे अंत तक तैयार नहीं हुए। ब्राह्मण सुलभ विनम्रता उन्हें विरासत में मिली थी लेकिन मुस्कुराते हुए किसी को निपटा देने का क्रूर फैसला करने में उन्हें न कोई हिचक थी, ना ही कोई देरी। हरिशंकर तिवारी का उभार 70 के दशक से शुरू होता है। तब गोरखपुर में रविंद्र सिंह तेजतर्रार छात्र नेता हुआ करते थे। रविंद्र सिंह की गोल में मनबढ़ वीरेंद्र प्रताप शाही भी शामिल थे। गोरखपुर में मठ का अघोषित शासन था। गोरखपुर विश्वविद्यालय में रविंदर सिंह के छात्रसंघ अध्यक्ष चुने जाने के बाद ठाकुर बिरादरी का वर्चस्व शहर के अन्य क्षेत्रों में भी बढ़ता गया। हरिशंकर तिवारी और उनके साथ के लोगों को यह वर्चस्व स्वीकार नहीं था। वह चुनौती देने का हर अवसर तलाश रहे थे। बताते हैं कि गोरखपुर में तैनात तत्कालीन ब्राह्मण जिलाधिकारी मठ के दखल से खुद को असहज पा रहे थे और वह खुद इसकी काट तलाश रहे थे। हरिशंकर तिवारी ने एक तरह से मठ के समानांतर हाता स्थापित किया तथा उच्च अधिकारियों का साथ पाकर ठेका पट्टा के जरिए आर्थिक स्थिति मजबूत करने का अभियान चलाया।
देखते ही देखते स्थानीय जायदाद के झगड़े, टेंडर ठेके पट्टे आदि के फैसले 'हाता' में होने लगे। ठाकुर बनाम ब्राह्मण की लड़ाई अब गोरखपुर से बाहर निकल कर आजमगढ़, गाजीपुर, देवरिया, बलिया, मऊ के कालेजों तक पहुंच गई। हर जगह दो धड़े बन गए। एक गुट को हरिशंकर तिवारी का वरदहस्त था तो दूसरे गुट को वीरेंद्र प्रताप शाही की शह मिली। वीरेंद्र प्रताप शाही अक्खड़ स्वभाव थे। बात बे बात भी लड़ जाते थे, लेकिन शातिर दिमाग हरिशंकर तिवारी उन्हें हर बार पटखनी दे देते थे।
हरिशंकर तिवारी ने अपना लक्ष्य पहले ही तय कर लिया था। सन 1972-73 के दौरान ही उन्होंने एमएलसी के चुनाव में शामिल होकर अपनी महत्वाकांक्षा जाहिर कर दी थी। हालांकि वह चुनाव हार गए थे। सन 1984 में महाराजगंज की सीट से लोकसभा का चुनाव दोनों धुर विरोधी हरिशंकर तिवारी और वीरेंद्र प्रताप शाही निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में लड़े थे। दोनों की हार हुई थी। इस चुनाव के बाद कांग्रेस नेता वीर बहादुर सिंह की स्थिति मजबूत होती गई। वीर बहादुर सिंह ने तिवारी पर नकेल डालने की भरसक कोशिश की। तिवारी को रासुका में गिरफ्तार कर लिया गया। जेल में रहते हुए भी तिवारी ने अपने लोगों को आगे कर अपना कारोबार बढ़ाया। 1985 में विधानसभा के चुनाव की घोषणा हुई। तब चिल्लूपार से तीन बार के विधायक रहे भृगु नाथ चतुर्वेदी ने कांग्रेस पार्टी को अलविदा कह कर हरिशंकर तिवारी की खुलकर मदद की। जेल में रहते हुए हरिशंकर तिवारी चुनाव लड़े और भारी मतों से चुनाव जीत गए। एक बार विधायक बनने के बाद हरिशंकर तिवारी ने फिर कभी मुड़ कर नहीं देखा।
1986 में हरिशंकर तिवारी ने बड़हलगंज के नेशनल डिग्री कॉलेज में एक कार्यक्रम का आयोजन किया था। इस कार्यक्रम में कांग्रेस के बड़े नेता कमलापति त्रिपाठी मुख्य अतिथि थे। अगल-बगल के जनपदों से भी भारी संख्या में लोग कार्यक्रम में शामिल हुए थे। वीर बहादुर सिंह को यह जमावड़ा फूटी आंख भी अच्छा नहीं लगा था। आयोजन समाप्त होने के बाद कमलापति को छोड़ने के लिए तिवारी दोहरीघाट तक गए थे। वहां से लौटते समय पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। चारों तरफ यह बात फैल गई कि पुलिस हरिशंकर तिवारी का एनकाउंटर करना चाहती है। इस कार्यक्रम में शामिल हुए कांग्रेस के विधायक और विमान अपहरण कर्ता के नाते चर्चित भोला पांडे को जब इसकी सूचना मिली तो वे भागे भागे विधानसभा पहुंचे। उस समय विधानसभा चल रही थी। उन्होंने विधानसभा के सभापति से हरिशंकर तिवारी जोकि सदन के माननीय सदस्य हैं, के गायब होने तथा पुलिस द्वारा एनकाउंटर किए जाने की बात उठाई तथा इस बारे में सरकार से स्पष्टीकरण की मांग की।
भोला पांडे बातचीत में आज भी कबूल करते हैं कि अगर विधानसभा नहीं चल रही होती तो शायद उनका एनकाउंटर हो जाता। इस बीच भारी संख्या में लोगों ने थाने का घेराव किया तथा हरिशंकर तिवारी को शीघ्र छोड़े जाने की मांग की। इस घटना के बाद हरिशंकर तिवारी ब्राह्मणों के नेता बन गए।
इसके बाद शुरु हुआ राजनीति में अपराधियों का नेता बनने का सिलसिला। अगल-बगल के जनपदों के तमाम अपराधी राजनीति करने के लिए सक्रिय हो गए। साधु सिंह, मकनू सिंह, चटर्जी दा जैसे पक्के निशानची हरिशंकर तिवारी के शार्प शूटर थे। हरिशंकर तिवारी अब सफेदपोश बन चुके थे। अपराधिक गतिविधियां उनके इशारे पर बदस्तूर चल रही थी। 80 के दशक में हरिशंकर तिवारी पर 26 मुकदमे दर्ज किए गए थे लेकिन कोई आरोप अदालती कार्रवाई में कभी साबित नहीं हो पाया। हरिशंकर तिवारी के बारे में कहा जाता था कि तिवारी ने खुद कभी कोई जुर्म नहीं किया लेकिन हर जुर्म में वह शामिल रहे।
रेलवे में ठेके के वर्चस्व को लेकर गोरखपुर में इतनी लड़ाइयां बढ़ गई थी कि रेलवे बोर्ड पर भी असर पड़ने लगा। रेलवे भर्ती बोर्ड गोरखपुर के तत्कालीन चेयरमैन ने रेल मंत्री भारत सरकार को पत्र लिखकर रेलवे भर्ती बोर्ड गोरखपुर को कहीं अन्यत्र स्थानांतरित करने की गुहार लगाई। इसी के बाद गोरखपुर रेलवे भर्ती बोर्ड का कार्यालय गोरखपुर से लखनऊ स्थानांतरित हो गया जो अब तक लखनऊ में ही बरकरार है। इस बीच तमाम सरकारें बनी लेकिन रेलवे भर्ती बोर्ड गोरखपुर का कार्यालय लखनऊ से वापस नहीं आ सका।
बाद में गाजीपुर के मुख्तार अंसारी हरिशंकर तिवारी के शागिर्द बने। मुख्तार भी आगे चलकर विधायक बनते रहे। मुख्तार के विरोधी बृजेश सिंह भी एमएलसी बन गए। उनके भाई चुलबुल से एमएलसी हो गए। हाता से ही अपराध का हुनर सीख कर निकले अमरमणि त्रिपाठी ने तो हरिशंकर तिवारी के धुर विरोधी वीरेंद्र प्रताप शाही को लक्ष्मीपुर में हरा दिया। विजय मिश्रा, अतीक अहमद ऐसे अनगिनत अपराधियों के नाम आए जिन लोगों ने दूसरे के लिए काम करने की बजाए खुद को नेता के रूप में स्थापित किया।
लेकिन ऐसा नहीं है कि हरिशंकर तिवारी के जीवन में चुनौती नहीं मिली। उनको सबसे बड़ी चुनौती श्रीप्रकाश शुक्ला की ओर से मिली। सबसे बड़ा डॉन बनने के ख्वाब में श्रीप्रकाश शुक्ला ने लखनऊ में वीरेंद्र प्रताप शाही की हत्या कर दी तथा अगले टारगेट के रूप में हरिशंकर तिवारी की तलाश में जुट गया था। हरिशंकर तिवारी श्रीप्रकाश से इतना भयभीत थे कि जब कहीं आना जाना होता था तो वह श्रीप्रकाश के पिताजी अथवा उसके मामा या भोला पांडे को साथ लेकर निकलते थे।
कुल मिलाकर हरिशंकर तिवारी एक ऐसे अलबेले बाहुबली थे जिन्होंने बड़े करीने से माफियागीरी का राजनीतिकरण किया। एक ओर जातीय संघर्ष में जहां उन्होंने अपने आप को ब्राह्मण नेता के रूप में प्रस्तुत किया वहीं दूसरी ओर ठेका पट्टा से लेकर बिजनेस व्यापार तक अपने साम्राज्य का विस्तार किया। उन्होंने राजनीति में माफियाओं के लिए जो रास्ता तैयार किया, उस पर चलकर कई माफिया नेता बन गये।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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