Live-in Relationships: लिव-इन रिश्तों का अनिवार्य पंजीकरण, संरक्षण या शोषण?
Live-in Relationships: इसी बुधवार को उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता विधेयक पारित होने के बाद, यह देश का पहला ऐसा राज्य बन गया है, जिसमें यह लागू होने जा रहा है। लिव-इन रिलेशनशिप के अनिवार्य पंजीकरण से संबंधित निर्णय, इसी यूसीसी बिल का एक ही एक हिस्सा है।
हालांकि अभी इस बिल को राज्यपाल, और फिर राष्ट्रपति की मंजूरी मिलना बाकी है, लेकिन इसे लेकर सराहना से ज्यादा चिंता और विरोध के स्वर सुनाई देने लगे हैं। यही मिश्रित रुझान, बिल के लिव-इन रिलेशनशिप संबंधी प्रावधानों के मामले में भी देखा जा सकता है।

इस छोटे से पहाड़ी राज्य का यह एक ऐसा बड़ा कदम है, जो राज्य के निवासियों को ही नहीं, बल्कि भौगोलिक दृष्टि से राज्य के बाहर के ऐसे लिव-इन जोड़ों को भी अपने दायरे में लाता है, जिनका पहले से, वर्तमान में या भविष्य में कोई भी संबंध राज्य से हो सकता है।
लिव-इन रिलेशनशिप का पंजीकरण और रिश्ते की समाप्ति की घोषणा अनिवार्य करने वाले इन प्रावधानों में कहा गया है कि ऐसा न करने की स्थिति में संबंधित पक्षों को तीन से छह माह की जेल अथवा दस हजार से पच्चीस हजार रुपए तक का जुर्माना, या दोनों हो सकता है।
यह अनिवार्यता उत्तराखंड में रहने वाले, मूल रूप से उत्तराखंडी लेकिन किसी और राज्य में रह रहे लिव-इन जोड़ों पर ही नहीं, बल्कि दूसरे राज्यों के ऐसे लिव-इन कपल्स पर भी लागू होगी जो उत्तराखंड में रहेंगे। यहॉं तक कि लिव-इन रिलेशनशिप वाले ऐसे जोड़ों को भी इसके दायरे में रखा गया है, जो पर्यटक के रूप में राज्य में मौजूद होंगे। इसके अलावा अगर जोड़े में किसी की भी आयु 21 वर्ष से कम है तो रिलेशनशिप में रहने से पहले उसके माता-पिता की सहमति अनिवार्य होगी।
जैसा कि राज्य सरकार साबित करने का प्रयास कर रही है, इन प्रावधानों के उद्देश्य बेशक बहुत नेक हो सकते हैं। लेकिन इनकी भाषा को देखकर लगता है कि इन्हें लागू करने की जल्दबाजी में शायद बहुत सारी बातों पर विचार किया जाना छूट गया है।
ये प्रावधान जो सवाल उठाते हैं, उनमें पहला तो यही है कि इनमें आवश्यकता और अनिवार्यता के फर्क को मिटा दिया गया है। सच बात तो यह है कि सहजीवन शादी नहीं है। जो जोड़े सहजीवन का विकल्प चुनते हैं, उनके सामने ऐसे रिश्तों का सबसे बड़ा आकर्षण यही होता है कि इनमें शादी की तरह पेचीदगियॉं और बाध्यताएं नहीं होतीं। वे इन रिश्तों में जाते ही इसलिए हैं ताकि सामाजिक और कानूनी दबाव के बिना वे पारिवारिक जिम्मेदारियों से मुक्त रहते हुए एक-दूसरे के साथ रह सकें।
महिला पक्ष की आर्थिक और भावनात्मक सुरक्षा एक अहम मसला हो सकता है, सहजीवी रिश्तों का पंजीकरण कुछ हद तक इस मसले का समाधान प्रस्तुत करता है। लेकिन पंजीकरण को अनिवार्य और न कराने को दंडनीय घोषित करना एक अतिरेकपूर्ण कदम है। अगर विवाह का पंजीकरण न कराने पर कोई दंड नहीं है तो लिव-इन को लेकर इतनी सख्ती क्यों बरती जा रही है? क्या यह उसमें शामिल पक्ष पर नहीं छोड़ देना चाहिए कि वह अपनी सुरक्षा के लिए अपने साथी को प्रेरित करे कि पहले पंजीकरण होगा, तभी वह उसके साथ रहना शुरू करेगा।
अधिकतर लिव-इन रिलेशन में शामिल दोनों पक्ष स्वतंत्र व आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होते हैं। इसीलिए वे विवाह की बजाए, सहजीवन का विकल्प चुनते हैं कि ताकि जब भी यह जटिल होने लगे, उनके सामने इससे बाहर निकलने का विकल्प खुला रहे। प्रावधान, इस विकल्प को बंद करते हैं और सहजीवन की अवधारणा के मूल उद्देश्य का ही निषेध करते हैं।
इससे संबंधित दूसरा विचारणीय प्रावधान इन रिश्तों में माता-पिता की अनुमति को अनिवार्य करना है, भले ही 21 वर्ष से कम के लिए क्यों न हो। आखिर कौन से माता-पिता होंगे, जो अपने बच्चों को इसकी अनुमति देंगे कि वे किसी लड़की या लड़की के साथ बिना विवाह के एक-साथ रह सकें। भले ही दुनिया काफी आगे बढ़ गई हो, लेकिन लिव-इन को आज भी समाज में अच्छी नजरों से नहीं देखा जाता है। कितने माता-पिता ऑन रिकॉर्ड ऐसे रिश्तों को सहमति देकर सामाजिक प्रवंचना के भागीदार बनना पसंद करेंगे?
ऐसे समाज में, जहां अभी भी अभिभावकों द्वारा प्रेम विवाह तक को आसानी से स्वीकार नहीं किया जाता, लिव-इन को लेकर उनकी क्या प्रतिक्रिया रहने वाली है, अंदाजा लगाना कोई मुश्किल काम नहीं है। तीसरा पहलू हैं, यह सिर्फ विषमलिंगी जोड़ों के सहजीवन के पंजीकरण की ही बात कहता है। अगर यह लिव-इन कपल्स को संरक्षण प्रदान करने के मकसद से है तो समलैंगिक जोड़ों को भी इसके दायरे में लाना इससे ज्यादा जरूरी है।
इसे लेकर, जिस चीज पर ज्यादा चिंता देखने को मिल रही है, वह निजता और जीवन जीने के अधिकार से जुड़ी है। देश का सर्वोच्च न्यायालय, छह साल पहले कह चुका है कि दो वयस्क व्यक्तियों को बिना विवाह के एक साथ रहने का अधिकार है, उनके निजी क्षेत्र में राज्य या व्यवस्था को तब तक अतिक्रमण नहीं करना चाहिए, जब तक यह चेष्टा सार्वजनिक हित में आवश्यक न हो। इसी से मिलती-जुलती बात 2009 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी कही थी कि निजता का क्षेत्र, व्यक्तियों को बाहरी हस्तक्षेप के बिना मानवीय संबंध विकसित करने की अनुमति देता है।
इसके अलावा वैयक्तिक स्वायत्ता का प्रयोग उन्हें अपनी पसंद के रिश्ते बनाने में सक्षम बनाता है। इसके विपरीत यूसीसी बिल के लिव-इन प्रावधान पुलिस को यह अधिकार प्रदान करते हैं कि वे किसी के भी बेडरूम का दरवाजा खटखटाकर उससे पूछ सकें कि वे किस अधिकार से एक साथ रह रहे हैं। ऐसे में सह-जीवन में रह रहे युगलों को ही नहीं, बल्कि उन विवाहित दम्पत्तियों को भी काफी असुविधा और अपमान का सामना करना पड़ सकता है, जो किसी वजह से विवाह का पंजीकरण कराने से चूक गए हैं।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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