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Tripura Election: भाजपा ने सिंधिया परिवार से मदद क्यों नहीं ली?

भारतीय जनता पार्टी को पूरा एहसास है कि त्रिपुरा की राह इस बार आसान नहीं। मोदी सरकार नया राज्य बनाने का वायदा भी नहीं कर सकती। लेकिन अगर देबबर्मा से सिंधिया परिवार के माध्यम से संपर्क साधा जाता तो गठबंधन संभव हो सकता था।

Tripura Election

हम हिन्दी भाषी उत्तर भारतीय आम तौर पर पूर्वोतर के राज्यों की राजनीति में ज्यादा दिलचस्पी नहीं लेते। वहां की क्षेत्रीय पार्टियों के बारे में ज्यादा जानते भी नहीं, लेकिन जब से भारतीय राजनीति में मोदी युग का उदय हुआ है, पूर्वोत्तर में भी भाजपा ने राज्यों असम, अरुणाचल, मणिपुर और त्रिपुरा में शुद्ध अपनी सरकार बना ली। बाकी राज्यों में भी भाजपा क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन में सत्ता में भागीदार हो गई। इस घटनाक्रम के बाद से उत्तर भारतीयों की भी पूर्वोतर में दिलचस्पी बढ़ी है।

भाजपा ने असम में कांग्रेस को उखाड़ फेंका और त्रिपुरा में लेफ्ट सरकार को उखाड़ फेंका। असम, अरुणाचल और मणिपुर में तो भाजपा दूसरी बार भी चुनाव जीत चुकी है, लेकिन त्रिपुरा में अपनी सरकार बचाने के लिए उसे नाकों चने चबाने पड़ेंगे। त्रिपुरा, मेघालय और नगालैंड के चुनाव इसी महीने हो रहे हैं। तीनों ही राज्यों की विधानसभाओं की 60-60 सीटें हैं। माकपा का 25 साल का शासन उखाड़ फैंकने वाली भाजपा की स्थिति इस बार त्रिपुरा में काफी नाजुक बताई जा रही है।

त्रिपुरा में इस समय भाजपा और इंडिजिनस पीपुल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (आईपीएफ़टी) की गठबंधन सरकार है। दोनों ने पिछली बार मिल कर चुनाव लड़ा था। भाजपा को 36 और सहयोगी आईपीएफ़टी को आठ सीटें मिलीं थीं। भाजपा को मिली 36 सीटों में से 10 सीटें आदिवासियों के लिए आरक्षित सीटें थीं, जो आदिवासी पार्टी इंडिजिनस पीपुल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा के साथ गठबंधन के कारण मिलीं थी। आईपीएफ़टी ने भी 8 सीटें जीतीं थीं। भाजपा और आईपीएफटी इस बार भी साथ मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं।

भाजपा 55 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, जबकि आईपीएफ़टी गठबंधन में सिर्फ 5 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। एक सीट पर वह भाजपा के सामने भी लड़ेगी, क्योंकि उस एक सीट पर दोनों दलों ने अपना दावा नहीं छोड़ा। जहां तक कांग्रेस का सवाल है तो पिछली बार त्रिपुरा में कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली थी, लेकिन 25 साल तक त्रिपुरा में सत्ता में रही माकपा को 16 सीटें मिलीं थी। अब दोनों मिल कर चुनाव लड़ रहे हैं। माकपा को 42 फीसद वोट मिले थे तो भाजपा को 44 प्रतिशत।

वोट शेयर के हिसाब से देखे तो माकपा ने भाजपा को कड़ी टक्कर दी थी। सिर्फ 2 फीसदी का अंतर था। इस बार माकपा और कांग्रेस नया गठबंधन बनाकर भाजपा के सामने चुनौती पेश कर रही है। नये गठबंधन के तहत माकपा 46 सीटों पर और कांग्रेस 13 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। वामपंथियों और कांग्रेस का खेल ख़राब करने के लिए तृणमूल कांग्रेस भी मैदान में है, जिसकी नजर वामपंथियों और कांग्रेस के वोटबैंक पर है।

भाजपा गठबंधन को इस बार सब से बड़ी चुनौती नई पार्टी "टिपरा मोथा" से मिल रही है। शाही वंशज प्रद्योत माणिक्य देबबर्मा के नेतृत्व में आदिवासियों की यह नई पार्टी बनी है, जिसने आईपीएफ़टी की जगह ले ली है। आईपीएफ़टी ने आदिवासियों से वायदा किया था कि वह ग्रेटर "ग्रेटर टिपरालैंड" नाम से अलग राज्य बनवाएगी। लेकिन मोदी सरकार इसके लिए सहमत नहीं हुई। आईपीएफ़टी टिपरालैण्ड राज्य की अपनी मूल मांग को पूरा करने में विफल रही, जिस कारण आदिवासियों में उस की लोकप्रियता में जबर्दस्त गिरावट आई है। उस की जगह शाही वंशज प्रद्योत माणिक्य देबबर्मा के नेतृत्व में बनी आदिवासियों की नई पार्टी "टिपरा मोथा" ने ले ली है।

माणिक्य देबबर्मा 2019 तक कांग्रेस में थे, जब उन्होंने कांग्रेस से इस्तीफा देकर दो साल राजनीति से विश्राम लिया। फिर 2021 में उन्होंने टिपरा मोथा पार्टी बना ली। टिपरा मोथा पार्टी ने 2021 में त्रिपुरा जनजातीय क्षेत्र स्वायत्त जिला परिषद के चुनावों में शानदार प्रदर्शन कर किया। उसने निकाय की 30 में से 18 सीट हासिल की थी। भाजपा ने मोथा से गठबंधन की कोशिश की, लेकिन वह विफल रही क्योंकि देबबर्मा ने दो टूक कह दिया कि उनकी पार्टी "ग्रेटर टिपरालैंड" गठन के लिखित आश्वासन के बिना किसी से हाथ नहीं मिलाएगी। उनकी मांग है कि त्रिपुरा जनजातीय क्षेत्र स्वायत्त जिला परिषद में आने वाले क्षेत्र और 36 गांवों को मिलाकर अलग राज्य बनाया जाए।

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भारतीय जनता पार्टी को पूरा एहसास है कि त्रिपुरा की राह इस बार आसान नहीं। मोदी सरकार नया राज्य बनाने का वायदा भी नहीं कर सकती। लेकिन अगर देबबर्मा से सही माध्यम से संपर्क साधा जाता तो गठबंधन मुश्किल भी नहीं होता। भाजपा के भीतर ही माणिक्य देबबर्मा के संपर्क सूत्र बैठे हुए थे। एक नहीं बल्कि तीन सशक्त संपर्क सूत्र थे, जिनके माध्यम से बात हो सकती थी। माणिक्य देबबर्मा रिश्ते में राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और मध्यप्रदेश की मंत्री यशोधरा राजे के भांजे हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया के रिश्ते में भाई है।

वसुंधरा राजे की बड़ी बहन और ज्योतिरादित्य की बड़ी बुआ पद्मावती राजे माणिक्य देबबर्मा के पिता किरीट बिक्रम किशोर देव बर्मन की पहली पत्नी थीं। उनकी दो बेटियाँ हुई, लेकिन 1965 में उन का देहांत हो गया था। बाद में बिक्रम किशोर देव बर्मन ने राजा लव शाह की बेटी विभु कुमारी देवी से दूसरी शादी की। सिंधिया परिवार से माणिक्य देबबर्मा परिवार के रिश्ते बने हुए हैं। ये दोनों परिवार अभी भी मिलते रहते हैं। राज घराने से संपर्क राज घरानों के माध्यम से ही साधना चाहिए। भाजपा का शीर्ष नेतृत्व अगर सिंधिया परिवार का सहयोग लेता, तो बात बन सकती थी।

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    अगर हम जिला परिषद चुनाव नतीजों को सामने रखें, तो साफ़ दिखाई देता है कि मुकाबला त्रिकोणीय हो गया है। एक तरफ भाजपा गठबंधन है, दूसरी तरफ कांग्रेस माकपा गठबंधन है, और तीसरा आदिवासी 20 सीटों पर मजबूत दावेदारी के साथ "टिपरा मोथा पार्टी" है। भाजपा का आकलन है कि त्रिकोणीय मुकाबले की स्थिति में भाजपा के पास टिपरा मोथा और कांग्रेस वाम मोर्चा गठबंधन के मुकाबले में बढ़त होगी, क्योकि भाजपा विरोधी वोट उनके बीच विभाजित हो जांएगे।

    लेकिन त्रिकोणीय मुकाबले में किंग के किंगमेकर के रूप में उभरने की पूरी संभावना है। यानी जिस भाजपा ने 2018 में अपने सहयोगी के साथ 60 में से 44 सीटें जीत लीं थी, वह अब तीस सीटें जीतने की स्थिति में भी नहीं है। वैसे इस की वजह सिर्फ आदिवासी आरक्षित सीटें ही नहीं है, जहां उसकी हालत पतली लग रही है, बल्कि भाजपा में ही पनपा असंतोष भी इसकी एक अन्य वजह है। इस असंतोष को थामने के लिए दस महीने पहले भाजपा ने विप्लव देव को हटा कर माणिक साहा को मुख्यमंत्री बना दिया था। इसके बावजूद अब तक भाजपा के आठ विधायक पार्टी छोड़ चुके हैं।

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