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आतंकवाद पर दोगली नीति रखने वाले देश व लोगों के लिए सबक है अफगान में बर्बर तालिबानी ताक़तों का पैर जमाना!

By दीपक कुमार त्यागी
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दुनिया के कुछ ताकतवर देशों व लोगों की बड़ी गलतियों की वजह से आज एकबार फिर अफगानिस्तान बर्बर आतंकी सगंठन तालिबान के कब्जे में चला गया है, वहां पर रोजाना सड़कों पर बेहद क्रूरता के साथ मानवता की हत्या हो रही है। इस हालात पर सबसे बड़ी अफसोस की बात यह है कि विश्व के चौधरी बनने वाले कुछ ताकतवर देश अब केवल तमाशबीन बनकर इंसान व इंसानियत के खिलाफ हो रहे जघन्य अपराध पर चुपचाप ताली पीटने में मस्त हैं। आज के हालात को समझने के लिए हमको अफगानिस्तान में तालिबान से जुड़े इतिहास पर एकबार फिर से नजर डालनी होगी। अफगान के इतिहास में वर्ष 1996 का बेहद महत्वपूर्ण स्थान है, क्योंकि तब तालिबान ने काबुल पर कब्‍जा करके वहां पर अपनी तथाकथित मजहबी सल्तनत की मजबूत नींव रखने का कार्य किया था। हालांकि उसके बाद भी तालिबान के कर्ताधर्ता शीर्ष नेतृत्व व लड़ाके सत्ता का आनंद लेने के लिए चुपचाप अपने घरों में नहीं बैठे थे, उन्होंने इस तथाकथित मजहबी उन्माद के नाम पर आयेदिन निर्दोष आम अफगानी जनता के खून से अफगानिस्तान की गलियों को रंगने का कार्य बेखौफ होकर जारी रखा हुआ था।

terrorism establishment after Taliban forces in Afghanistan

उनकी इस घातक युद्ध रणनीति के चलते और अफगानिस्तान के बहुत सारे कट्टरपंथी लोगों के भरपूर सहयोग के बलबूते आखिरकार वर्ष 1998 के आते-आते तालिबानी लड़ाकों ने लगभग पूरे अफगानिस्‍तान पर अपनी बर्बर क्रूर हुकूमत कायम कर ली थी। ठीक उसी तरह के हालात वर्ष 2021 में एकबार फिर से बन गये हैं, आज तो तालिबानियों ने काबुल के किले को बिना किसी लड़ाई के बेहद आसानी से फतह करने का कार्य किया है। हालांकि इस पूरे घटनाक्रम में सबसे शर्मनाक बात यह रही है कि जिस अफगानिस्तान की सेना को पिछले बीस वर्षों से अमेरिका ने लगभग 83 बिलियन डॉलर खर्च करके, उन्हें तन मन धन से पालपोस कर ट्रेनिंग व अत्याधुनिक हथियार देकर अपने पैरों पर खड़ा करने का प्रयास कर रहा था, वो साढ़े तीन लाख सैनिकों वाली अफगान फौज इतनी कायर व निकम्मी निकली की बिना किसी प्रतिरोध के उसने मात्र 80 हजार तालिबानी लड़ाकों के सामने अपने घुटने टेक दिये। अफगानिस्तान की सेना कि इस कायराना हरकत ने दुनिया के सामने यह साबित कर दिया है कि उनके लिए अफगान राष्ट्र का हित सर्वोपरि ना होकर के तालिबान के तथाकथित मजहबी सिद्धांत सर्वोपरि हैं। वैसे 21वीं सदी की आधुनिक दुनिया में अमनचैन शांति में विश्वास रखने वाले सम्पूर्ण विश्व समुदाय को अफगान में बनी मानवता के लिए इस बेहद घातक स्थिति पर निष्पक्ष रूप से आत्ममंथन अवश्य करना चाहिए।

वैसे तो अफगानिस्तान में वर्ष 1996 से इस्लामिक कानून के मुताबिक तालिबान बेखौफ होकर अपनी सत्ता चला रहा था, लेकिन अमेरिका पर 9/11 के आतंकी हमले के बाद मास्टरमाइंड ओसामा बिन लादेन और उसके आतंकी संगठन अल कायदा आंदोलन को अफगानिस्तान की तालिबान सरकार ने जब अपने यहां पनाह दी, तो उस स्थिति से बेहद नाराज होकर अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने 9/11 के हमलों के जवाब में अपना 'आतंकवाद के खिलाफ युद्ध' का एक बहुत बड़ा अभियान शुरू किया था, जिसके तहत अमेरिका ने 7 अक्टूबर 2001 को अफगानिस्तान में आतंकी ठिकानों पर जबरदस्त हवाई हमले किए थे, जिसमें करीब 3 हजार लोग मारे गए थे। हालांकि इस कार्यवाही के बाद चले निरंतर अमेरिकी हमलों की वजह से आयेदिन अफगान में बर्बरता की हद पार करने वाला आतंकी संगठन तालिबान जंग के मैदान में जल्द ही युद्ध हार गया था और 6 दिसंबर 2001 को अफगानिस्तान की राजधानी काबुल से भाग गया था। उस समय की धरातल की स्थिति को समझते हुए अमेरिका ने तुरंत अफगानिस्तान में हामिद करजई के नेतृत्व में अंतरिम सरकार का गठन किया था। उसके पश्चात उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) ने अपने अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा सहायता बल को हालात सामान्य करने के लिए अफगानिस्तान की रणभूमि में धीरे-धीरे तैनात करना शुरू कर दिया था।

इस स्थिति के बाद विश्व में सामूहिक रक्षा के सिद्धांत पर काम करने का दावा करने वाले नाटो ने वर्ष 2002 में अफगानिस्‍तान की सुरक्षा पूर्ण रूप से अपने हाथ में ले ली थी, उस समय सम्पूर्ण विश्व के शांतिप्रिय जन समुदाय को एक बड़ी उम्मीद थी कि अब अफगानिस्तान से बहुत जल्द ही सभी आतंकियों व तालिबानियों का सफाया हो जायेगा और वहां पर अमनचैन व शांति कायम हो जायेगी। लेकिन बीस वर्ष की बहुत लंबी लड़ाई के बाद भी धरातल पर स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है, वहां पर तालिबान के द्वारा निरंतर खूनखराबा करने का खेल जारी रहा है, क्योंकि वहां के कुछ लोगों के लिए अफगान राष्ट्र से पहले तालिबान के द्वारा पढ़ाये जाने वाला तथाकथित मजहबी उन्माद अधिक महत्वपूर्ण था, जिसके चलते कुछ लोग निरंतर आतंक व आतंकवादियों को पालने-पोसने का कार्य कर रहे थे। जिसकी वजह से आज एकबार फिर अफगानिस्तान मजहब के नाम पर अपनी आतंकवाद की दुकान चलाने वाले दुनिया के कट्टरपंथी लोगों के चंगुल में बुरी तरह से फंस गया है। हालांकि पूर्व की बात करें तो वहां पर नाटो व अमेरिका के बड़े पैमाने पर हस्तक्षेप के बाद अफगानिस्तान के हालात पर नियंत्रण करने के पश्चात जब वर्ष 2004 में देश को सुचारू रूप से चलाने के लिए अफगान का नया संविधान बना और देश के नये संविधान के अनुसार अफगानिस्तान का पहला चुनाव 9 अक्टूबर 2004 को हुआ था, जिसमें 70 प्रतिशत मतदान हुआ था और उस चुनाव में हामिद करजई 55 प्रतिशत वोट लेकर देश के राष्ट्रपति निर्वाचित हुए थे।

उस समय हामिद करजई के राष्‍ट्रपति चुने जाने के बाद एकबार फिर उम्मीद की किरण जगीं थी कि अब शायद बहुत जल्द ही अफगानिस्तान के हालात बेहतर होंगे, देश की चुनी हुई सरकार अफगानिस्तान की आम जनता के सहयोग के बलबूते अमनचैन व विकास की दुनिया को नजर आने वाली एक नयी विकास की गाथा लिखेंगे। लेकिन अफसोस कहीं ना कहीं अफगानी सरकारी तंत्र आयेदिन अमेरिका से आ रही मदद को भ्रष्टाचार के माध्यम से चट करने में लग गया और देश में लोगों के जीवन जीने के स्तर में कोई बदलाव होता हुआ आम जनता को नजर नहीं आया। इसी वक्त का फायदा उठाकर तालिबान दक्षिण और पूर्व में फिर से संगठित होना शुरू हो गया था, उसने इस क्षेत्र में जमकर हिंसक विद्रोह करना शुरू करके इलाकों पर अपना कब्जा पुनः जमाना शुरू कर दिया था। रही-सही कसर दुनिया में शांति के लिए काम करने का दम्भ भरने वाले कुछ देश रूस, चीन, ईरान, पाकिस्‍तान और सऊदी अरब आदि के द्वारा लगातार तालिबान आतंकियों की सैकड़ों-हजारों मिलियन डॉलर की मदद करने से पूरी हो गयी, इस बहुत बड़ी मदद के बलबूते तालिबान फिर से अफगानिस्तान में मजबूती के साथ वापस आकर खड़ा होता चला गया और फिर उसने कभी भी अफगानिस्तान की सरकार, नाटो व अमेरिका को पूरे देश पर काबिज नहीं होने दिया। तालिबान के दुर्दांत आतंकियों के द्वारा अफगानिस्तान में आयेदिन की जाने वाली आतंकी घटनाओं ने कभी भी अफगान सरकार व आम जनता को अमनचैन से नहीं रहने दिया और ना कभी नाटो व अमेरिका को अफगानिस्तान से बाहर निकलने के बारें में सोचने दिया।

आयेदिन तालिबान के हमलों के चलते देश में धीरे-धीरे सुरक्षा, अर्थव्यवस्था व अन्य तरह के हर मोर्चे पर हालात दिनप्रतिदिन बदतर होते चले गये, जनता के सामने अपना पेट भरने की चुनौती खड़ी होने लगी। अफगानिस्तान में जैसे-जैसे तालिबान के हमले बढ़ते चले गये, वैसे ही वर्ष 2008 व वर्ष 2009 मे अमेरिकी कमांड ने अफगान में और सैनिकों की मांग करनी शुरू कर दी थी, जिसके चलते अमेरिका ने पहले से ज्यादा फौज को अफगानिस्तान में तैनात करके आतंकवाद के खात्मे के लिए कार्य करना शुरू कर दिया। वर्ष 2009 में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अफगान में अमेरिकी सैनिकों की संख्या को दोगुना कर 68 हजार कर दिया था, उन्होंने अफगानिस्तान युद्ध को समाप्त करने के लिए तेजी से कार्य करके बड़ा अभियान चलाना शुरू किया, हालांकि राष्ट्रपति बराक ओबामा इस युद्ध समाप्त करने वाले अभियान को कभी पूरा नहीं कर पाए और वर्ष 2010 तक अफगानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों की संख्या धीरे-धीरे बढ़कर 1 लाख तक पहुंच गई। 20 अगस्त 2009 को हामिद करजई एकबार फिर से चुनाव जीतकर अफगानिस्तान के राष्ट्रपति चुने गए, हालांकि इन चुनावों में बहुत कम मतदान हुआ था और बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी करने का आरोप भी लगा था, वहीं इन चुनावों में तालिबान के लड़ाकों ने देश के विभिन्न हिस्सों में जमकर हिंसा फैलाने का कार्य भी किया था।

तालिबान ने अफगानिस्तान पर कब्जा जमाने के लिए लगातार निर्दोष लोगों का आयेदिन खूनखराबा करना जारी रखा हुआ था। पल-पल में धरातल पर तेजी से बदल रहे हालातों के चलते अमेरिका को भी अब अफगानिस्तान से अपनी सेना निकालने के लिए सोचने पर मजबूर होना पड़ने लगा था। जिसको अमलीजामा पहनाने के लिए अमेरिका ने रणनीति के तहत वर्ष 2014 से ही अफगानिस्तान में अपने सैनिकों की तैनाती की संख्‍या में लगातार कटौती करनी शुरू कर दिया। वर्ष 2014 के जून माह में चुनावों के द्वारा अशरफ गनी अफगानिस्तान के राष्ट्रपति चुने गए, लेकिन इस मतदान के दौरान हुई जबरदस्त हिंसा और तथाकथित धोखाधड़ी के दावों ने इन पूरे चुनाव को बेहद विवादास्पद बना दिया था। हालांकि चुनावी प्रक्रिया संपन्न करवाने के बाद वर्ष 2014 के दिसंबर माह में ही नाटो ने अफगानिस्तान में अपने लगभग दो दशक लंबे चले लड़ाकू मिशन को पूर्ण रूप से समाप्त करके सेना को तेजी से वापस बुलाना शुरू कर दिया था, लेकिन अफगानिस्तान में धरातल पर स्थिति की गंभीरता को देखते हुए नाटो ने अफगान सेना को प्रशिक्षित करने के उद्देश्य से अपने कुछ सैनिकों को वहां पर छोड़ दिया था।

लेकिन रणभूमि के धरातल पर अमेरिका व अफगानिस्तान सरकार की रणनीतिक चूक या मजहबी कट्टरपंथ की इंतहा के हाल देखिए कि किस तरह से अफगान सरकार की साढ़े तीन लाख सैनिकों वाली सेना व अन्य सभी सरकारी तंत्रों से जुड़े हुए लोग भी बेहद क्रूर बर्बर कट्टरपंथी सोच वाले तालिबान के मजहबी उन्माद व इस्‍लामिक कानून वाली बेहद क्रूर सजाओं के आतंक से भयभीत जनता के बीच में भी अपनी पकड़ बनाने में लंबे समय के बाद भी पूर्ण रूप से नाकाम रहे। जिसकी वजह से सैन्यकर्मियों के वापसी अभियान के चलते नाटो व अमेरिकी सैन्य बलों के हटने वाले क्षेत्रों पर पिछले लंबे समय से धीरे-धीरे करके अफगान सेना की जगह तालिबान के लड़ाके अपनी पकड़ एकबार फिर से मजबूत करते जा रहे थे। इस स्थिति का जबरदस्त ढंग से लाभ लेते हुए वर्ष 2020 में तालिबान ने एकबार फिर अफगानिस्तान में अपनी पकड़ बेहद मजबूत करनी शुरू कर दी थी। रही-सही कसर उस वक्त पूरी हो गयी जब 29 फरवरी वर्ष 2020 को अमेरिका ने तालिबान के साथ दोहा में एक शांति समझौता किया कि आगामी 14 महीनों के भीतर वह हर हाल में अफगानिस्तान को छोड़ देंगे। अमेरिका को मई 2021 तक अफगान से चले जाना था, लेकिन फिर यह तारीख 9 सितंबर 2021 हो गयी थी, इससे पहले अमेरिकी सैनिकों को अफगानिस्‍तान छोड़ना था। लेकिन सत्ता हथियाने के लिए उतावले तालिबानियों ने अमेरिका के साथ हुए इस समझोते के ठेंगा दिखाते हुए 15 अगस्त 2021 को ही अफगानिस्तान पर अपना कब्जा कर लिया और अमेरिका को 31 अगस्त तक अफगानिस्तान छोड़ने का अल्टीमेटम दे दिया है। लेकिन इस बार अफगानिस्तान की युद्धभूमि से सम्पूर्ण विश्व समुदाय को बेहद चिंतित करने वाली यह खबर आयी है कि तालिबान के हाथ अमेरिकी सेना का बेहद अत्याधुनिक हथियारों का बड़ा जखीरा लग गया है, यहां तक कि अमेरिका प्रशासन की रणनीतिक चूक व खूफिया विफलता के चलते अचानक ही आतंकी संगठन तालिबान ने अमेरिकी लड़ाकू विमानों को हासिल करके एकाएक हवाई हमले करने की क्षमता भी हासिल कर ली है।

इस स्थिति का निष्पक्ष आकलन करने पर यह स्पष्ट है कि यह अमेरिका की एक बहुत बड़ी रणनीतिक चूक है और अमेरिका के द्वारा पाकिस्तान में पल रहे आतंकवाद के प्रति ढुलमुल नीति का परिणाम है, क्योंकि आतंकवाद की पाठशाला चलाकर आतंकी तैयार करने वाले पाकिस्तान के प्रति अमेरिका का उदार रवैया जगजाहिर है, अमेरिका पाकिस्तान की धन व आधुनिक सैन्य उपकरणों से लगातार मदद करता है, जबकि पाकिस्तान तन मन धन व गन से अफगानिस्तान में आतंकवाद व तालिबान को खुलकर मदद करता है और हर कोई जानता है कि पूरे विश्व में पाकिस्तान आतंकवाद की जननी का सबसे बड़ा केंद्र है, अमेरिका के साथ दुनिया का हर देश जानता है पाक ही दुनिया में आतंकवाद फैलाने का कार्य करता है, लेकिन फिर भी पाकिस्तान को निरंतर अमेरिका, चीन व कुछ अन्य देशों से मदद मिलती है, जिसका वह आतंकवादी तैयार करके दुनिया में आतंकवाद फैलाने में उपयोग करता है। अमेरिका ने जिस तरह से लंबे समय से अफगानिस्तान में जमे हुए अपने सैनिकों की वापसी को चरणबद्ध सुनियोजित ढंग से ना करके एक जल्‍दबाजी दिखाई, उसकी वजह से दुनिया में मजहब की आड़ में आतंकवाद फैलाने का कार्य करने वाले बेहद बर्बर क्रूर तालिबान लड़ाकों को अफगानिस्तान के कट्टरपंथी लोगों के सहयोग से एकबार फिर से अफगानिस्तान को हथियाने का एक बहुत ही शानदार मौका मिल गया है।

हालांकि अब विश्व के इतिहास में यह एक कटु सत्य के रूप में दर्ज हो गया है कि अमेरिका की आतंकवाद के प्रति दोगली रणनीति व अफगानिस्तान के संदर्भ में एक एतिहासिक भूल के चलते 15 अगस्त 2021 को अफगानिस्तान को आतंकी संगठन तालिबान ने पुनः अपने कब्जे में ले लिया है। अमेरिका की गलती ने नाटो सेनाओं व अफगानिस्तान के नव निर्माण में लगे सभी देशों की बीस वर्ष लंबी मेहनत पर अपने ही हाथों से पानी फेर दिया है। दुनिया में एकबार फिर से कट्टरपंथ व मजहब के नाम पर आतंकवाद को फलने-फूलने का मौका उपलब्ध करवा दिया है। जबकि दुनिया का बच्चा-बच्चा यह जानता है कि अफगानिस्तान को पाषाणयुग में पहुँचाने के लिए आतंकी संगठन तालिबान व उसका आका पाकिस्तान जिम्मेदार है, तालिबान की बेहद क्रूर सोच इंसान व इंसानियत के लिए बेहद घातक है। लेकिन फिर भी अमेरिका के गैरजिम्मेदाराना रवैया और अफगान में मजहब के नाम पर उसकी आड़ में बहुत सारे अफगानी कट्टरपंथी लोगों की सोच ने अफगानिस्तान को एकबार फिर से तालिबान के हाथों में देकर वहां की जनता को असमय काल का ग्रास बनने के लिए छोड़ दिया हैं। इस स्थिति ने दुनिया के सभी शांतिप्रिय लोगों के सामने एक नये मजहबी उन्माद व आतंकवाद के खतरें को लाकर खड़ा कर दिया है। लेकिन कम से कम दुनियाभर के हुक्मरानों को अब तो यह सोचना होगा कि आज के समय में इंसान व इंसानियत की रक्षा के लिए आतंकवाद पर किसी भी प्रकार की ढुलमुल वाली दोगली नीति ठीक नहीं है, आतंकवाद के सफाये के लिए समय रहते सभी देशों को एकजुट होना ही होगा। बहुत कम समय में ही तालिबान अपने आपको इस्लामिक समूह का दुनिया में सबसे बड़ा ठेकेदार मानने लगा है, तालिबान के हुक्‍मरानों की सोच पूरी दुनिया में अपनी सोच वाले राज को कायम करते हुए शरिया कानून लागू करने की है, जिसके लिए तालिबान के लड़ाके हर वक्त खूनखराबा करने के लिए तैयार बैठे रहते हैं। धार्मिक कट्टरपंथियों वाले इस आतंकियों के बहुत बड़े गैंग के लिए इंसान व इंसानियत से भी ऊपर उसके अपने क्रूर नियम-कायदे-कानून हैं। हालांकि इस आतंकी संगठन से जुड़ें लोग नौटंकी करने के लिए मजहब के प्रति अपनी पूर्ण श्रद्धा विश्वास व समर्पण को हर वक्त प्रदर्शित करके भोलेभाले लोगों को आकर्षित करने का प्रयास करते हैं, लेकिन वास्तव में इनके आचरण में कहीं से भी मजहब की कोई सच्चाई नहीं होती है।

इन तालिबानी आतंकियों पर कहीं ना कहीं जंग के मैदान में मरने के बाद उन तमाम हूरों को हासिल करने का सपना पूरी तरह से हावी रहता है, जो इनको वहां के मदरसों में कुछ ब्रेनवॉश करने वाले कट्टरपंथी तथाकथित मौलाना मजहब की आड़ लेकर पढ़ाते हैं। वैसे तो 'तालिबान आंदोलन' जिसे दुनिया भर में तालिबान या तालेबान के नाम से भी जाना जाता है, यह एक सुन्नी इस्लामिक आधारवादी आन्दोलन है, इसकी शुरुआत उत्‍तरी पाकिस्‍तान में सुन्‍नी इस्‍लाम का कट्टरपंथी रूप सिखाने वाले एक मदरसे में हुई थी। अफगानिस्तान में इसकी शुरूआत वर्ष 1994 में दक्षिणी अफ़ग़ानिस्तान में हुई थी। वैसे तालिबान पश्तो भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ होता है ज्ञानार्थी (छात्र), ऐसे छात्र जो कि इस्लामिक विचारधारा पर यकीन करते हैं। लेकिन तालिबान का वास्तव में इस्लामिक विचारधारा के वास्तविक ज्ञान से दूर-दूर तक कोई मतलब नहीं है, अब तो तालिबान सत्ता हथियाने वाला एक कट्टपंथी राजनीतिक आंदोलन मात्र हैं, जिसका सबसे बड़ा उद्देश्य अफगान की सत्ता पर काबिज होना मात्र है।

वैसे तो इस तालेबान आन्दोलन को सिर्फ पाकिस्तान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने ही मान्यता दे रखी थी। लेकिन इसको चुपचाप आतंकवाद को पालने-पोसने वाले बहुत सारे देशों से निरंतर बहुत बड़ी मदद मिलती रहती है। पूरी दुनिया के लिए आज के समय में तालिबान इंसान व इंसानियत के लिए एक बहुत बड़ा खतरा बनकर उभरा है। 15 अगस्त 2021 के बाद से भारत में भी कुछ देशद्रोही लोग तालिबान के पक्ष में बेवजह की बयानबाजी करके देश का माहौल खराब करने का प्रयास कर रहे हैं, यह देशद्रोही लोग तालिबान को महिमामंडित करके खुद को मजहब विशेष का एक बहुत बड़ा ठेकेदार बनाने का प्रयास कर रहे हैं, हालांकि सरकार इन सभी देशद्रोही लोगों को कानून के अनुसार सख्त सबक सिखाने का कार्य कर रही है, लेकिन यह भी कटु सत्य है कि भारत के कुछ लोगों की हरकतों से यह अवश्य स्पष्ट हो गया हैं कि उनके लिए भी राष्ट्र प्रथम कभी नहीं रहा है, बल्कि उनके लिए अमनचैन को पसंद करने वाले देश में हमेशा मजहब के नाम पर दंगा फसाद उन्माद फैलाना प्रथम रहा है। आज इन लोगों को अफगान में बर्बर तालिबान के द्वारा किये जा रहे खूनखराबे से सबक लेना चाहिए कि आतंक व आतंकवादियों का कोई मजहब नहीं होता है, वह हमेशा केवल इंसान व इंसानियत के बहुत बड़े दुश्मन होते हैं, मजहब की आड़ में उनकी मदद करना इंसान व इंसानियत के प्रति एक बहुत बड़ा जघन्य अपराध है, जिसके लिए उनको कभी माफी नहीं मिलेगी।

English summary
terrorism establishment after Taliban forces in Afghanistan
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