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Collegium System: दो और जजों ने माना कोलेजियम पर उनका फैसला गलत था

Collegium System: संसद से सर्वसम्मति से पास क़ानून को सुप्रीम कोर्ट असंवैधानिक ठहरा दे, जिस पर न्यायपालिका और सरकार आमने सामने खड़ी हो जाएं| सारे देश में बवंडर पैदा करने के बाद, केंद्र सरकार और न्यायपालिका को आमने सामने खड़ा कर देने के बाद, अगर कोई जज यह कहे कि उसका फैसला ही गलत था, तो क्या लगता नहीं कि उस समय उसका फैसला न्यायपालिका को संसद से सर्वोच्च दिखाने के उद्देश्य से किया गया था| अपनी इतनी बड़ी गलती का एहसास उसे रिटायर हो जाने के बाद हुआ हो, तो उस जज के लिया क्या कहा जाना चाहिए| सुप्रीमकोर्ट के जजों का यह हाल है, तो आप अंदाज लगा सकते हैं कि भारत की न्याय व्यवस्था कितनी सड़ गल चुकी है| आम तौर पर लोग राजनेताओं के गिरते स्तर का रोना रोते हैं, जबकि जजों की स्थिति भी कहीं से संतोषजनक नहीं कही जा सकती।

जिन पांच जजों ने न्यायिक नियुक्ति आयोग को असंवैधानिक ठहराया था, उनमें से एक जज जस्टिस चेलमेश्वर तो पहले ही फैसले के खिलाफ थे। जस्टिस जोसफ ने बाद में कह दिया कि उनसे गलती हो गई। यहां तक कह दिया कि उन्हें अपने फैसले पर पछतावा है| अभी उन्होंने इंडिया टुडे के एक कार्यक्रम में कहा कि उनसे गलती हुई, कोलिजियम सिस्टम में कोई पारदर्शिता नहीं है, चीफ जस्टिस डिक्टेटर बन गए है| उन्होंने यह भी कहा कि जब उन्होंने कोलेजियम सिस्टम के पक्ष में फैसला दिया था, तो कुछ शर्तों के साथ समर्थन किया था| जिसमें कोलेजियम को मदद करने के लिए रिसर्च टीम बनाया जाना भी शामिल था, ताकि जिन जजों को पदोन्नत किया जाना है, या जिन्हें नियुक्त किया जाना है, उनका पूरा बैकग्राऊंड मालूम हो| उन शर्तों को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया है, कोलेजियम में चीफ जस्टिस की मनमानी चलती है|

Collegium System

संविधान संशोधन के जरिए बनाए बनाए गए आयोग में सात सदस्य होते| आयोग का अध्यक्ष चीफ जस्टिस ही होता, दो अन्य वरिष्ठ जज भी आयोग के सदस्य होते| दो मंत्रियों के अलावा दो गणमान्य व्यक्ति आयोग के सदस्य होते। इन दो व्यक्तियों का चयन प्रधानमंत्री, चीफ जस्टिस और विपक्ष के नेता मिलकर करते| जिन दो सदस्यों को चुना जाता, उनमें से एक एससी, एसटी, ओबीसी, अल्पसंख्यक या महिला होती| क्या यह लोकतांत्रिक व्यवस्था नहीं होती? लेकिन सुप्रीमकोर्ट के पांच जजों की बेंच ने इस व्यवस्था को संविधान में मूल ढाँचे में फेरबदल कह कर असंवैधानिक कह दिया|

जजों की नियुक्तियों और ट्रांसफर व्यवस्था के लिए जिस कोलेजियम सिस्टम को उन्होंने लागू किया वह संविधान के मूल ढाँचे में है ही नहीं| बल्कि संविधान में मूल ढाँचे में जजों की नियुक्तियों का जो अधिकार राष्ट्रपति को दिया गया था, उसे सुप्रीमकोर्ट ने छीन लिया| अब फैसला सुनाने वाले चार जजों में से एक जस्टिस जोसेफ कह रहे हैं कि उनसे गलती हुई, कोलेजियम सिस्टम तो तानाशाहीपूर्ण है। इससे तो राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग लाख दर्जे अच्छा होता, उसमें पारदर्शिता तो होती|

Collegium System

वैसे यह बात उन्होंने फैसले के बाद ही 2019 में ही कह दी थी, जब वह दिल्ली में एक किताब का विमोचन कर रहे थे, लेकिन अब उनका एहसास कुछ ज्यादा है| उन्होंने यहां तक कह दिया है कि लोगों का न्यायपालिका पर से विश्वास उठ गया है| न्यायिक नियुक्ति आयोग के क़ानून को रद्द करने वाले बाकी बचे तीन जज थे जस्टिस केहर, जस्टिस मदन लोकुर और जस्टिस आदर्श कुमार गोयल| सच यह है कि जस्टिस जोसफ की तरह जस्टिस मदन लोकुर को भी बाद में अपनी गलती का एहसास हुआ था, जब उन्होंने जस्टिस चेलमेश्वर, जस्टिस गोगोई और जस्टिस जोसेफ के साथ 2018 में प्रेस कांफ्रेंस करके उस समय के चीफ जस्टिस पर तानाशाही के आरोप लगाए थे|

इस तरह पांच में से तीन जजों को फैसले के दो साल बाद ही एहसास हो गया था कि उन्होंने गलती की है, क्योंकि कोलेजियम सिस्टम में चीफ जस्टिस सर्वेसर्वा बन गए हैं| वे अगली बार उनके रिश्तेदारों को जज बनवाने का आश्वासन देकर चुप करवा देते हैं| कोलेजियम से मनमाफिक फैसले करवाने की रणनीति के तहत ही मौजूदा चीफ जस्टिस अपने पूर्ववर्ती चीफ जस्टिस यू.यू. ललित की ओर से बुलाई गई कोलेजियम की अंतिम दो बैठकों में नहीं गए थे, और वह कोई फैसला नहीं ले सके|

लेकिन जस्टिस जोसेफ के अब पछताने का कोई फायदा नहीं|अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत| सर्वसम्मती से पारित न्यायिक नियुक्ति आयोग को असंवैधानिक ठहराने की ताकत सुप्रीमकोर्ट को 1973 के केशवानंद भारती केस के फैसले से मिली| इसी फैसले के बाद सुप्रीमकोर्ट ने राष्ट्रपति से जजों की नियुक्ति का अधिकार छीन लिया| संविधान में तो सुप्रीमकोर्ट के चीफ जस्टिस से सलाह का जिक्र था, लेकिन सुप्रीमकोर्ट ने अपने फैसले में चीफ जस्टिस की सलाह को बाध्यकारी बना दिया|

1973 के जिस केशवानंद भारती केस ने चुनी हुई संसद की सर्वोच्चता खत्म करके और चुने हुए राष्ट्रपति को पंगु बना कर न्यायपालिका को निरंकुश बना दिया, उसे भी दुबारा खोला जाना चाहिए| इंदिरा गांधी ने केशवानंद भारती केस के फैसले के पुनर्विचार की याचिका लगवाई थी, लेकिन उस समय के नए चीफ जस्टिस ए.एन. रे नई बैंच गठित नहीं कर सके| नरेंद्र मोदी को इंदिरा गांधी का अधूरा काम पूरा करके संसद की सर्वोच्चता बहाल करने की कोशिश करनी चाहिए, जैसे उन्होंने अगस्त 2014 में संविधान संशोधन के जरिए न्यायिक नियुक्ति आयोग बनाने की कोशिश की थी|

संविधान संशोधन से आयोग बनाने का वह ड्राफ्ट पूर्ववर्ती मनमोहन सरकार का ही बनाया हुआ था, मोदी सरकार ने उस समय मनमोहन सरकार का अधूरा काम पूरा करने की कोशिश की थी| न्यायपालिका की सारी बीमारियों की जड़ में केशवानंद भारती फैसला है, वह फैसला सिर्फ एक जज के बहुमत से हुआ था, छह जज संसद की सर्वोच्चता के पक्ष में थे, सात जजों ने संसद की सर्वोच्चता खत्म की| जैसे आजकल जजों को रिटायरमेंट के बाद अपनी गलती का एहसास होने लगा है, वैसे ही उन सात में से एक जज को भी गलती का एहसास हो जाता, तो आज न्यायपालिका और संसद के टकराव की नौबत आती ही नहीं|

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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