आर्थिक रूप से पिछड़ों को मिले संसद में आरक्षण?
Ameer Saansad: जाति धर्म से अलग हटकर मोदी सरकार ने पहली बार आर्थिक रूप से गरीब लोगों को सरकारी नौकरियों और शिक्षा में 10 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान किया है। ऐसे में सवाल उठता है कि जिस प्रकार से संसद में धनबल वालों का प्रभाव बढता जा रहा है, क्या उससे निपटने के लिए आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को संसद में आरक्षण दिया जाना चाहिए?
लोकतंत्र में देश के सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व उसे सार्थक बनाता है। लेकिन, जिस तरह से बीते कुछ सालों में संसद में अमीर सांसदों की संख्या बढ़ी है, वह इस बात को दर्शाती है कि यहॉं देश की बहुसंख्य गरीब आबादी का प्रतिनिधत्व लगातार सिकुड़ रहा है। बीते चार चरणों में कुल 5,879 प्रत्याशियों ने चुनाव लड़ा। एसोसिएयशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म और नेशनल इलेक्शन वॉच के आंकड़ों के अनुसार इनमें से 1708 प्रत्याशी करोड़पति या इससे अधिक सम्पन्न हैं। इन करोड़पतियों में प्रधानमंत्री मोदी भी शामिल हैं जिनके पास 4 करोड़ का बैंक बैलेन्स है।

करीब डेढ़ अरब आबादी वाले देश में, एक करोड़ या इससे अधिक आय जाहिर करने वाले करोड़पतियों की संख्या 2.16 लाख है। जबकि लोकसभा में करोड़पति सांसदों की संख्या 475 है। यानि सांसदों की कुल संख्या का 88%। वर्ष 2004 में निर्वाचित लोकसभा में कुल 28% अर्थात 156 सांसद ही करोड़पति थे।
यह स्थिति शायद इसलिए आई है कि आज राजनीति का पूर्ण पूंजीकरण हो चुका है। चुनावों में टिकट पाने से लेकर चुनाव प्रचार तक की पूरी प्रक्रिया बेहद खर्चीली हो गई है। दुनिया की सबसे बड़ी मीडिया निवेश एजेंसियों में से एक ग्रुप एम ने कुछ महीने पहले अनुमान व्यक्त किया था कि इन आम चुनावों में राजनीतिक दल डेढ़ से दो हजार करोड़ रु. खर्च कर सकते हैं। यह सिर्फ इलेक्शन कैंपेन का खर्च है। बैठकों, रैलियों, सभाओं, यात्राओं, लोगों को उपकृत करने आदि में होने वाले खर्च इसमें शामिल नहीं हैं।
पिछले लोकसभा चुनाव में कुल 8,040 प्रत्याशियों ने चुनाव लड़ा था। जाहिरा तौर पर, इसमें सभी उम्मीदवारों के सब मिलाकर लगभग साठ हजार करोड़ रुपए खर्च हुए। चुनाव आयोग द्वारा लोकसभा चुनावों के लिए तय खर्च सीमा तब प्रति उम्मीदवार 70 लाख थी। इस लिहाज से प्रति व्यक्ति कुल घोषित खर्च भी औसतन इस सीमा के आस-पास ही रहा होगा। माई नेता इन्फो वेबपोर्टल के अनुसार इनमें सिर्फ 29% प्रत्याशी ही ऐसे थे, जिन्होंने खुद को करोड़पति बताया था। बाकी 71% ऐसे उम्मीदवार थे, जो करोड़पति नहीं थे। यानी वे अपनी जीत के लिए 70 लाख खर्च कर पाने की स्थिति में नहीं थे। इस बार यह सीमा बढ़ाकर 95 लाख की जा चुकी है। लेकिन, वास्तविकता तो यही है कि एक करोड़ तो क्या, पॉंच करोड़ सम्पत्ति वाला प्रत्याशी भी, शायद ही अपने चुनाव के लिए इतनी रकम खर्च करने के लिए तैयार होगा।
इस पहलू को देखें तो इस बार चुनाव लड़ रहे प्रत्याशियों में से करीब तीन चौथाई, खर्च के मामले में बाकियों से पीछे छूट जाएंगे। इसका अर्थ है कि प्रत्याशी की आर्थिक सुदृढ़ता भी उसकी जीत में एक बहुत बड़ी भूमिका निभाती है। 2019 के लोकसभा चुनावों के नतीजों के अध्ययन बताते हैं कि एक करोड़ से कम सम्पत्ति वाले प्रत्याशियों के जीतने की संभावना महज एक फीसदी ही थी और करोड़पति उम्मीदवारों की 21 फीसदी। यह आकलन कितना सही था, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि लोकसभा चुनाव लड़ने वाले करीब 2400 करोड़पति उम्मीदवारों में से लगभग बीस फीसदी विजयी रहे और बाकी 5600 गैर-करोड़पति उम्मीदवारों में करीब सवा फीसदी।
इस बार चुनावों पर करीब एक लाख करोड़ रुपए का खर्च होने का अनुमान है, जो पिछले यानी 2019 के लोकसभा चुनावों की तुलना में दो गुना और 2014 के लोकसभा चुनाव खर्च का करीब पच्चीस गुना है। पहली लोकसभा के लिए हुए चुनावों में कुल 10.5 करोड़ रुपए खर्च हुए थे। इस हिसाब से हम इस बार करीब दस हजार गुना ज्यादा खर्च करने जा रहे हैं।
जितने खर्च में पहली लोकसभा के सारे चुनाव निपट गए थे, उसका करीब अस्सी फीसदी खर्च इस बार एक उम्मीदवार पर आ रहा है। इतनी बड़ी रकम हम इसलिए खर्च करते हैं कि देश की जनता को उनकी बात कहने के लिए उपयुक्त प्रतिनिधि मिल सकें। लेकिन, जब नतीजे आते हैं तो प्रतिनिधित्व का पूरा अनुपात एकदम विपरीत होता है। एक ऐसी लोकसभा में जहॉं 2.16 लाख करोड़पतियों का प्रतिनिधित्व करने के लिए 475 जनप्रतिनिधि हों और 1.4 अरब लोगों की आवाज उठाने के लिए सिर्फ 68, तो हम कैसे सुनिश्चित कर सकते हैं कि देश के सभी वर्गों का उनका समुचित प्रतिनिधित्व मिला है।
इतिहास साक्षी है कि हर वर्ग, अपने हित की बात सबसे पहले सोचता है। अगर यही स्थिति बरकरार रहती है तो फिर गरीबों के हित वाली नीतियों की बात कौन उठाएगा? यहॉं प्रश्न नीयत का भी है और सामर्थ्य का भी। भारत की आबादी का एक बड़ा हिस्सा आजादी के 75 साल बाद भी रोजगार न मिलने और मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने की चुनौतियों से जूझ रहा है।
सभी धनिक संवेदनहीन या स्वार्थी नहीं होते, लेकिन ऐसे जनप्रतिनिधि, जिन्होंने कभी जमीनी हकीकतों का सामना ही न किया हो, गरीबों और हाशिए पर मौजूद वर्गों के बारे में कितना सोच या बोल सकते हैं, इस बारे में भी विचार जरूरी है। सम्पन्न पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखने वाले जनप्रतिनिधियों के लिए गरीबों के जीवन को प्रभावित करने वाले आवास, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल, खाद्य सुरक्षा और सीमित अवसरों जैसे मुद्दों को समझना वाकई चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
हम अक्सर अमीरी और गरीबी के बीच की बढ़ती हुई खाई को लेकर चिंताएं व्यक्त करते हैं, लेकिन जब यही स्थिति सबसे बड़े लोकतंत्र के सबसे बड़े संस्थान में भी दिखाई देने लगे तो चिंताएं और गहरा जाती हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि अमीरों को चुनाव लड़ने से रोका जाना चाहिए। हमारा संविधान उन्हें भी चुनाव लड़ने का उतना ही अधिकार प्रदान करता है, जितना किसी अन्य व्यक्ति को। लेकिन, दिक्कत यह है कि ऐसे में जबकि राजनीतिक दलों को विविध सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि के उम्मीदवारों को प्रोत्साहित और समर्थन करना चाहिए, जीत की एक प्रतिशत और इक्कीस प्रतिशत संभावनाओं में से उनके लिए भी मजबूरी हो जाती है कि वे सम्पन्न उम्मीदवारों को ही तरजीह दें।
संसद में धनबल के बढ़ते दबदबे के बीच ऐसे उपाय खोजे जाने चाहिए जो सभी वर्गों का प्रभावी प्रतिनिधित्व सुनिश्चित कर सकें। इसके लिए एक पहल यह हो सकती है कि जिस तरह से समाज के दूसरे कई वर्गों के लिए लोकसभा या विधानसभा चुनावों में सीटें आरक्षित की गई हैं, उसी तरह से आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए भी सीटें आरक्षित करने पर भी गंभीरता से विचार किया जाए। हो सकता है कि इसमें कुछ साल लग जाएं, लेकिन महिला आरक्षण की तरह इसे भी एक हकीकत का रूप दिया जाना असंभव नहीं है।
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