Shortcut for Publicity: अच्छा या बुरा, शरीर तक ही क्यों सीमित है नारी विमर्श?
यह जो जनता के देखे जाने का स्वाद है, वह रिदम चानना जैसी लड़कियों को कपड़े उतारने के लिए प्रेरित करता है। कोई रिदम चानना एक दिन में नहीं बनती है। यह एक प्रक्रिया है, और समाज की सामूहिक विफलता भी।

Shortcut for Publicity: हाल में ही दिल्ली मेट्रो में सफर कर रही एक लड़की के अजीबो गरीब कपड़ों पर खूब चर्चा हुई। उसका एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें रिदम चनाना नाम की उस लड़की की बड़ी खोजबीन हुई। लेकिन जल्द ही उस लड़की का एक और रूप सामने आ गया। पुरुषों के समान अधिकारों के लिए कार्य करने वाली एक्टिविस्ट बरखा त्रेहान ने एक वीडियो जारी किया जिसमें रिदम द्वारा पैसा मांगा जाना दिखाया गया था। ऐसा ही कई और लोगों ने लिखा कि रिदम चनाना हर वीडियो के लिए पैसे ले रही है। उसके इन्स्टाग्राम फॉलोअर्स बढ़ गए हैं। लोग उसके विषय में बातें कर रहे हैं। आखिरकार उसे खोज निकाला गया।
परन्तु प्रश्न यह है कि उसे खोजा क्यों गया? प्रश्न यह भी है कि लोग उसके विषय में बात क्यों कर रहे हैं? इन सवालों के जवाब किसी चानना के पास नहीं हैं। इन सवालों के जवाब पाने के लिए बाजार बनते जा रहे उस आधुनिक समाज में झांकना पड़ेगा जिसके लिए स्त्री देह तक सीमित हो गयी है।
2011 में एक फिल्म आई थी "द डर्टी पिक्चर"। इस फिल्म की नायिका अपने संघर्ष के बल पर छोटी अदाकारा से एक ख्यातनाम हिरोइन बन जाती है। कहते हैं इसे दक्षिण की एक अभिनेत्री के जीवन पर बनाया गया था। उस फिल्म में अभिनय के लिए विद्या बालन को राष्ट्रीय पुरस्कार भी दे दिया गया। जबकि यह भी वास्तविकता है कि कई ऐसी महिलाओं पर बनी फिल्मों पर ध्यान भी नहीं जाता, जिनमें उन महिलाओं के संघर्ष को दिखाया जाता है, जिन्होनें सकारात्मक संघर्ष किया है।
'द डर्टी पिक्चर' की सिल्क स्मिता ने संघर्ष नहीं किया, ऐसा नहीं है, परन्तु उस संघर्ष और सफलता से समाज ने सकारात्मक क्या ग्रहण किया, यह महत्वपूर्ण है। सिल्क स्मिता पर बनी फिल्म के अभिनय के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिलना भी कहीं न कहीं रिदम चानना जैसी लड़कियों को ऐसे कदम उठाने के लिए प्रेरणा देता है।
दरअसल रिदम जैसी लड़कियां, जो प्रसिद्ध होना चाहती हैं, उनके सामने दो रास्ते होते हैं। एक रास्ता लंबा और श्रमसाध्य होता है, जिस पर चलकर कई वर्षों के बाद आदर एवं नाम तथा कुछ हद तक पैसा मिल सकता है। परन्तु एक और रास्ता होता है जो बहुत छोटा होता है। उस पर पहले ही कदम पर तत्काल लाभ होता है। नाम होता है, पहचान भी मिलती है और उस फेमिनिस्ट वर्ग की सहानुभूति भी, जो इस कथित पितृसत्तात्मक समाज को बदलकर रख देना चाहती हैं।
रिदम चानना का जो मामला है, वह पूरी तरह से उसी कथित फेमिनिज्म द्वारा पोषित तो है ही, परन्तु साथ ही उसे यह भी पता है कि भारत में वायरल होने के लिए क्या आवश्यक है। उसके दिमाग में यह भली भांति बैठा हुआ है कि जो जनता सिल्क स्मिता पर बनी फिल्म को सुपरहिट करा सकती है, गंगूबाई फिल्म को सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म बना सकती है, उसका स्वाद कैसा है।
यद्यपि मैरी कॉम, दंगल जैसी भी फ़िल्में सुपरहिट रही हैं, परन्तु उनके सुपरहिट होने में भी वही कारण मुख्य रहा है, जिसके चलते रिदम चानना जैसी लड़कियां यह कदम उठाती हैं अर्थात ग्लैमर और एजेंडा। जब 'मैरी कॉम' फिल्म में प्रियंका चोपड़ा को लिया गया था, तभी यह प्रश्न उठे थे कि आखिर प्रियंका चोपड़ा जैसी अभिनेत्री क्यों? क्या ऐसी कोई अभिनेत्री नहीं ली जा सकती थी जो मैरी कॉम को वास्तविकता में दिखा सके? इतनी बड़ी खिलाड़ी के लिए प्रियंका चोपड़ा जैसी अभिनेत्री का ग्लैमर जोड़ा गया ताकि फिल्म चल जाए। ऐसे ही 'चक दे इंडिया' फिल्म, जो महिला हॉकी पर बनी थी, उसमें जबरन मुस्लिम विक्टिमहुड का एजेंडा डाला गया। आमिर खान की 'दंगल' में भी वेज-नॉनवेज वाला एजेंडा जबरन डाला गया।
इतना ही नहीं जिन बबिता फोगाट पर दंगल मूवी बनी थी, उन्होंने किसी मुद्दे पर अपने विचार रखे तो उसे भी विचारधारा के चौखट में घेरकर देखा गया। उनको ताना मारा गया कि वो ये न भूलें कि यदि आमिर खान उन पर फिल्म न बनाते तो उन्हें जानता ही कौन था?
यह किसी भी देश के लिए सबसे अधिक लज्जाजनक तथ्य है कि उसकी खिलाड़ियों को, देश का नाम रोशन करने वाली वैज्ञानिकों को आम जनता तभी पहचाने जब उन पर कोई फिल्म बनाए या फिर कोई प्रियंका चोपड़ा उसका किरदार निभाएं। यही वह सोच है जो रिदम जैसी लड़कियों को यह सोचने के लिए बाध्य करती हैं कि उन्हें वास्तविक संघर्ष के बाद उपलब्धि प्राप्त करने के स्थान पर कुछ ऐसा करना है, जो जनता का स्वाद है।
यह जो जनता के देखे जाने का स्वाद है, वह रिदम चानना जैसी लड़कियों को प्रेरित करता है। उसे पता है कि वह देह के आधार पर वायरल हो सकती है। अब वह नकारात्मक हो सकती है या सकारात्मक, इससे उसे कोई अंतर नहीं पड़ता। उसे अंतर इससे पड़ता है कि जब वह साधारण हुआ करती थी, तब उसे कोई "नोटिस" नहीं करता था, मगर जबसे उसने अपने देह को माध्यम बनाया, तब से लोग उसे नोटिस करने लगे हैं।
क्या रिदम जैसी लड़कियों के इस रूपांतरण में समाज की उसी सोच का हाथ नहीं है जो 'द डर्टी पिक्चर' एवं 'गंगूबाई काठियावाड़ी' फिल्म को सुपरहिट करा देती है। संजय लीला भंसाली को हीरामंडी बनाने को प्रेरित करती है एवं उस पेशे को मुख्यधारा में लाती है, जिसका आधार केवल और केवल देह है। गणितज्ञ बनी शकुन्तला के जीवन पर भी फिल्म में निजी जीवन के विवाद को ही मुख्य आधार बनाया जाता है और लोग चटखारे लेकर उस पर बात करते हैं। मुख्य उपलब्धि कहीं खो जाती है। स्वाति मालीवाल हों, खुशबू सुन्दर हों या उर्फी जावेद। उनकी उन्हीं बातों को नोटिस किया गया जो देह से जुड़ी थीं। मीडिया ने नोटिस किया, लोगों ने नोटिस किया और लोक विमर्श में भी नोटिस किया गया।
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दिल्ली मेट्रो में छोटे छोटे कपड़े ही नहीं बल्कि नाम मात्र के चीथड़े चिपकाने वाली रिदम चनाना का निर्माण एक दिन में नहीं हुआ है। उसे इस "नोटिस" करने की बीमारी ने ग्रस लिया है। वह नोटिस होना चाहती थी, मगर उसे नोटिस नहीं किया गया। तो उसने एक गहन अध्ययन किया होगा कि अंतत: नोटिस होने के लिए करना क्या है? आखिर वह क्या चीज है, जिससे लोग उसके विषय में बातें करें, उसे पैसा मिले, वह चर्चा में आए। फिर उसने वही किया जिसे हमारा समाज बार-बार स्थापित करता आ रहा है, अर्थात देह की मर्यादाओं को उघाड़कर सामने आ जाना। यही वह आजादी है जो पितृसत्तात्मत व्यवस्था के खिलाफ उसका विरोध भी है और नोटिस किये जाने का कारण भी।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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