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SCO Meeting: अवसर और आतंकवाद के बीच फंसा शंघाई सहयोग संगठन

SCO Meeting: शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के दिल्ली घोषणा पत्र से चीन और पाकिस्तान दोनों को मायूसी हुई है, क्योंकि भारत के नेतृत्व में 4 जुलाई को हुए वर्चुअल शिखर-सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी ने दोनों देशों के एजेंडे पर हस्ताक्षर करने से इंकार कर दिया। चीन और पाकिस्तान दोनों चाहते थे कि भारत बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) का समर्थन कर दे। पर भारत इसको अपनी संप्रभुता का उल्लंघन मानता है। क्योंकि चीन- पाकिस्तान इकोनॉमिक कोरिडोर जहां से गुजरता है, उसे भारत अपना क्षेत्र मानता है।

इसके अलावा भारत ने आतंकवाद पर पाकिस्तान की दोहरी नीति और अफगानिस्तान के प्रति अपने नजरिए से भी एससीओ के सदस्य देशों को अवगत करा दिया। एससीओ के दिल्ली घोषणा पत्र में भारत यह दर्ज कराने में सफल रहा है कि आतंकवाद के प्रचार प्रसार और उसके लिए वित्त मुहैया कराने वाले सभी प्रकार के सहयोग तंत्र (स्लीपर सेल) से लड़ने के लिए सभी सदस्य देश प्रतिबद्ध हों।

SCO Meeting trapped between opportunity and terrorism

मंगलवार 4 जुलाई को एससीओ के सभी राष्ट्र प्रमुख वर्जुअल कांफ्रेंस के जरिए एक दूसरे से जुड़े हुए थे। एससीओ मूल रूप से चीन और रूस द्वारा खड़ा किया गया संगठन है। भारत और पाकिस्तान 2017 में इसके सदस्य बने। चीन और रूस इस समय घोषित रूप से अमेरिका के विरोधी हैं और भारत इस समय अमेरिका का रणनीतिक साझीदार। फिर भी एससीओ के राष्ट्रप्रमुखों की यह बैठक भारत की अध्यक्षता में हुई और भारत के नजरिए को सभी ने स्वीकार भी किया।

यह भारत के लिए बड़ी उपलब्धि है कि वह एक तरफ क्वाड जैसे संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है, जिसके एजेंडे पर चीन को सबसे ज्यादा ऐतराज है। दूसरी तरफ चीन, रूस, पाकिस्तान और ईरान जैसे सदस्य देशों वाले एससीओ की अध्यक्षता भी कर रहा है। ये सभी देश अमेरिका के खिलाफ खड़े हैं जिसमें चीन अपना दबदबा बनाए रखना चाहता है। कूटनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार भारत का एसएसीओ में बने रहना और अपनी उपस्थिति मजबूत बनाए रखना इस समय बहुत जरूरी है, क्योंकि एससीओ से अलग रहकर एशिया में भारत किसी मजबूत ब्लॉक को अपने लिए खड़ा नहीं होने दे सकता। इस समय रूस, चीन, ईरान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, तुर्की जैसे देशों के हित आपस में जुड़े हुए हैं। भारत को इस क्षेत्र में अपने हितों की रक्षा हर हाल में करनी है। इसलिए एससीओ के जरिए यहां हमारी निरंतर उपस्थिति बनी रहेगी।

एससीओ को लेकर चीन का अपना अलग एजेंडा है। वह इस संगठन के माध्यम से अपने अनुकूल एक बड़ा आर्थिक एवं सुरक्षा का तंत्र खड़ा करना चाहता है। जिसमें उसके लिए व्यापार के बड़े अवसर हो, एससीओ सदस्यों के बीच सांस्कृतिक संबंधों का विस्तार हो। पर्यटन के खूब सारे अवसर हो। आर्थिक विस्तार के लिए उसकी अपनी मुद्रा का चलन हो। अन्य अंतराष्ट्रीय वित्तीय एजेंसियों की तरह एससीओ का अपना बैंक या वित्तीय संस्थान हो, जिसका वह सर्वाधिक दोहन कर सके। चीन यह भी चाहता है कि पाकिस्तान और ईरान के जरिए मध्य एशिया तक उसकी आसानी से पहुंच बने और अफगानिस्तान में उसकी अपनी नीतियों के तहत विकास या उस पर पकड़ हो।

ऐसे में भारत के लिए एससीओ में मौजूद रहकर चीन के एजेंडे को अपने खिलाफ होने से रोकने का बड़ा अवसर है। भारत भी चाहता है कि जहां तक संभव हो रुपये में व्यापार शुरू हो, पाकिस्तान के भारत विरोधी एजेंडे पर लगाम लगे और अफगानिस्तान में भारत की मजबूत उपस्थिति स्थापित एवं बरकरार हो। एससीओ की बैठक में चीन ने अपने एजेंडे के समर्थन में तर्क दिए तो भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने नजरिए से उसे दुरूस्त और अपने अनुकूल करने की कोशिश की।

एससीओ का भविष्य क्या होगा यह तो आने वाले समय में पता चलेगा, लेकिन इतना तो तय है कि इस समय एससीओ को भी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। आर्थिक एवं सुरक्षा सहयोग के लिए बने एससीओ पर बाहरी मुद्दे हावी हो रहे हैं। खासकर यूक्रेन संकट के कारण इसकी प्रासंगिकता और प्रभाव पर सवाल खड़ा होने लगा है। इसलिए बैठक में प्रधानमंत्री मोदी अपनी ओर से बिल्कुल स्पष्ट थे, उन्होंने चीन का नाम तो नहीं लिया लेकिन उनके इस वाक्य में संदेश बीजिंग के लिए ही था कि "आतंक रीजनल और ग्लोबल पीस के लिए खतरा है। कुछ देश क्रास बॉर्डर टेररिज्म को अपनी नीतियों की तरह इस्तेमाल करते हैं और आतंकवादियों को पनाह देते हैं। एससीओ को ऐसे देशों की निंदा करने में संकोच नहीं करना चाहिए। आतंकवाद पर कोई डबल स्टैंडर्ड नहीं होना चाहिए।"

दुनिया जानती है कि किस तरह चीन हर बार भारत के खिलाफ सक्रिय आतंकवादियों को बचाने के लिए सामने आ जाता है। अफगानिस्तान के बारे में भी पीएम मोदी ने पाकिस्तान की नीतियों का हवाला दिए बिना यह स्पष्ट कहा कि किसी और देश को अफगानिस्तान की भूमि का इस्तेमाल आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए करने की इजाजत नहीं देनी चाहिए।

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ ने बिना नाम लिए प्रधानमंत्री मोदी को यह जवाब दिया कि "कूटनीतिक मुद्दे उठाने के लिए आतंकवाद को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल से बचना चाहिए।" लेकिन चीन के राष्ट्रपति जरूर यह कहते नजर आए कि आतंकवाद और युद्ध से बचने के लिए आपस में शांति व सहयोग जरूरी है। पर चीन का सारा जोर एससीओ को एक व्यापारिक मंच बनाने में था। शी जिनपिंग ने स्थानीय मुद्रा निपटान की नीति को बढ़ाने पर सबसे ज्यादा जोर दिया और एससीओ विकास बैंक की स्थापना का भी प्रस्ताव रखा। चीन का मानना है कि स्थानीय मुद्रा में आपसी व्यापार उभरती अर्थव्यवस्थाओं को एक साथ साझा मंच पर लाने में सहायक होगा। जिनपिंग ने कहा कि एससीओ विकास बैंक को सदस्य देशों के बीच निवेश को बढ़ावा देने और पारस्परिक रूप से लाभकारी आर्थिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देने के लिए महत्वपूर्ण तंत्र होगा।

यह सच भी है कि यदि एससीओ एक बड़े मंच के रूप में स्थापित होने के बाद सदस्य देशों के बीच तटस्थता के साथ काम करता है तो इस क्षेत्र के लिए एक बड़ा गेम चेंजर भी साबित हो सकता है। क्योंकि एससीओ सदस्य देशों की संख्या वैश्विक आबादी का 40 प्रतिशत से अधिक है। एससीओ सदस्य देश कुल भूमि क्षेत्र के लगभग एक चौथाई हिस्से पर फैले हुए हैं। इनकी संयुक्त जीडीपी 23 ट्रिलियन डॉलर से अधिक की है। लेकिन यह भी सच है कि एससीओ सदस्य देशों के बीच भी कुछ जटिलताएं हैं। कुछ विवादास्पद मुद्दें हैं। सार्क के विघटन के जो कारण थे वे एससीओ के साथ भी बने हुए हैं। चीन-पाकिस्तान और भारत के बीच अनसुलझे सीमा विवाद लंबे समय से चले आ रहे हैं। आतंकवाद और सीमा पार से घुसपैठ की समस्या लगातार बनी हुई है। चीन के साथ व्यापारिक संबंधों में भी उतार चढ़ाव बना रहता है।

एससीओ 22 वर्षों की विकास यात्रा पूरा कर चुका है। इस समय इसके नौ सदस्य हैं। ईरान को इसकी पूर्ण सदस्यता दे दी गई है। कई और देशों ने भी एससीओ में रुचि दिखाई है, जो यह दर्शाता है कि कुछ असहमतियों से बावजूद एक मजबूत क्षेत्रीय संगठन के रूप में एससीओ आगे बढ़ रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एससीओ को एक बड़ा परिवार बताया है। यदि सदस्य देशों के बीच के द्विपक्षीय मुद्दों को इस पर हावी नहीं होने दिया गया तो यह वैश्विक तंत्र के रूप में विकसित हो सकता है। खासकर विकासशील देशों के लिए एससीओ विकल्प और आशा प्रदान करने वाला संगठन साबित हो सकता है, बशर्ते आतंकवाद जैसे मुद्दे पर उसका रवैया किसी को बचाने वाला न रहे।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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