Rupee Depreciation: डॉलर के बाजार में क्यों गिर रहा है रूपया?
Rupee Depreciation: अंतर बैंक विदेशी मुद्रा विनिमय बाजार में बीते चौथे कारोबारी सत्र में रुपया तेरह पैसे टूट कर प्रति डॉलर 83.29 रुपए (अस्थायी) के सर्वकालिक निचले स्तर पर आ गया। लंबे समय से लगभग स्थिर चल रहे रुपए में अचानक गिरावट को लेकर बाजार के कान खड़े हो गए हैं। यह सही है कि डॉलर के मुकाबले रुपए का अवमूल्यन हुआ है, लेकिन हमें यह भी देखना होगा कि दुनिया की 6 प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले डॉलर का सूचकांक भी 0.11% गिरकर 105.20 रह गया है। यानि गिरावट का यह ट्रेंड सिर्फ रुपए के साथ नहीं बल्कि अन्य देशों की मुद्राओं के साथ भी जुड़ा हुआ है।
मालूम हो कि रुपए और डॉलर की विनिमय दर 6 दिसंबर 2021 को 75.30 प्रति डॉलर थी जो 25 अप्रैल 2022 को 76.74 और 12 जून 2022 को 78.20 प्रति डॉलर तक पहुंच गई थी। 20 सितंबर को अंतर बैंक विदेशी मुद्रा विनिमय बाजार में रुपया 83.09 के भाव पर खुला। कारोबार के दौरान यह 83.09 से बढ़ते हुए 83.30 प्रति डॉलर तक पहुंचा और अंत में 13 पैसे की गिरावट के साथ 83.29 प्रति डॉलर पर बंद हुआ।

लंबे समय से भारत में रुपए की अन्य करेंसियों के साथ विनिमय दर बाजार द्वारा निर्धारित होती रही है। सैद्धांतिक तौर पर सोचा जाए तो डॉलर और अन्य महत्वपूर्ण करेंसियों की मांग और आपूर्ति के आधार पर रुपए की विनिमय दर तय होती है। पिछले कुछ समय से हमारे आयात अभूतपूर्व तौर पर बढ़े हैं। हालांकि इस दौरान हमारे निर्यात भी रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच चुके हैं, लेकिन आयात में तेजी से वृद्धि होने के कारण हमारा व्यापार घाटा काफी बढ़ चुका है। अपने देश में पोर्टफोलियो निवेश भी बड़ी मात्रा में आता रहा है, लेकिन पिछले काफी समय से पोर्टफोलियो निवेशक देश से भारी मात्रा में निवेश वापस ले गए हैं, इसका असर हमारे शेयर बाजार पर तो पड़ा ही है, डॉलर की आपूर्ति भी उससे प्रभावित हुई है।
कुछ समय से दुनिया भर में महंगाई बढ़ती जा रही है। इस साल के जून महीने में अमेरिका, इंग्लैंड और यूरोपीय संघ में महंगाई की दर क्रमशः 8.3 प्रतिशत, 7.0 प्रतिशत और 7.5 प्रतिशत रही। इस क्रम में भारत ने अपनी महंगाई दर को कमोबेश बांध कर रखने में सफलता अर्जित की है। लेकिन आशंका व्यक्त की जा रही है कि रुपए में आ रही गिरावट खुदरा महंगाई की समस्या को और बढ़ा सकती है। भारतीय रिजर्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार रुपए में एक प्रतिशत की गिरावट हमारी महंगाई को शून्य दशमलव 15% तक बढ़ा देती है। इतिहास साक्षी है कि तेज महंगाई आर्थिक विकास पर भी प्रतिकूल असर डालती है। इसीलिए रिजर्व बैंक को सरकार द्वारा निर्देश प्राप्त है कि किसी भी हालत में मुद्रा स्फीति की दर 6% से अधिक नहीं बढ़ने देना है।
उल्लेखनीय है कि हमारे देश में जब भी रुपए की गिरावट शुरू होती है तो सट्टेबाज पैसा बनाने की तरकीब शुरू कर देते हैं और अपनी गतिविधियों से बाजार में डॉलर्स की कृत्रिम कमी कर देते हैं। रिजर्व बैंक भारत के विदेशी मुद्रा भंडारों का संरक्षक तो है ही, साथ ही साथ उसके पास रुपए की विनिमय दर को स्थिर रखने का भी दायित्व होता है।
ऐसे में जब बाजार में सट्टेबाज और बाजारी शक्तियां रुपए को कमजोर करने की कोशिश करती हैं तो रिजर्व बैंक महंगाई को थामने, मौद्रिक स्थिरता और ग्रोथ के लिए आवश्यक वातावरण बनाने के अपने दायित्व के मद्देनजर विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप करता है और आवश्यकता पड़ने पर अपने विदेशी मुद्रा भंडारों से डॉलर बेचते हुए डॉलर की आपूर्ति बढ़ा देता है और बाजार में सट्टेबाजों द्वारा उत्पन्न डालर की कृत्रिम कमी का समाधान कर देता है।
रुपए के बारे में हमेशा दो तरह की राय सामने आती है। एक प्रकार के विशेषज्ञों का मानना है कि रुपए में अवमूल्यन अवश्यभावी है इसलिए रिजर्व बैंक को रुपए के मूल्य को थामने हेतु अपनी बहुमूल्य विदेशी मुद्रा को दांव पर लगाने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि इससे विदेशी मुद्रा भंडार घट जाएगा और रुपए में सुधार भी नहीं होगा। इस कोटि के विशेषज्ञों का मानना है कि रुपए को अपने हाल पर छोड़ देना चाहिए। ऐसे विशेषज्ञों का मानना यह है कि भारत में आयात के बढ़ने की दर निर्यात के बढ़ने की दर से हमेशा ज्यादा रहती है, इसलिए डॉलर की अतिरिक्त मांग डॉलर की कीमत को लगातार बढ़ाती रहती है। इनका मानना है कि जब-जब कच्चे तेल की कीमत बढ़ेगी तब तब रुपए में गिरावट जरूर होगी।
वहीं दूसरे प्रकार के विशेषज्ञों का मानना है कि डॉलर की अतिरिक्त मांग यदा कदा ही उत्पन्न होती है और फिर से स्थिति स्वत: सामान्य हो जाती है। ऐसे में बाजार की ताकतें रुपए में दीर्घकालिक गिरावट न लाने पाए इसलिए रिजर्व बैंक का विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप महत्वपूर्ण है। पूर्व में भी रिजर्व बैंक द्वारा अपने भंडार में से डॉलर की बिक्री से रुपए को थामने में मदद मिली है। स्थिति सामान्य होने पर रिजर्व बैंक फिर से डॉलर की खरीद कर अपने विदेशी मुद्रा भंडारों की भरपाई कर सकता है। इसलिए रुपए के स्थिरीकरण हेतु ऐसे प्रयास से विदेशी मुद्रा भंडार का दीर्घकाल में कोई नुकसान नहीं होता।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या धीरे-धीरे रुपए का अवमूल्यन अवश्यंभावी है अथवा रुपए को मजबूत करने की रणनीति बनाना असंभव है? देश में उदारीकरण के बाद से ही सरकारों द्वारा मुक्त व्यापार की नीति अपनाई गई और यह प्रयास हुआ कि आयात पर कम से कम शुल्क लगाया जाए। चीन समेत कई देशों द्वारा देश में आयात की डंपिंग के चलते हमारे उद्योगों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा और आयात पर हमारी निर्भरता धीरे-धीरे बढ़ती गई। देश में जैसे-जैसे आयात बढ़ा वैसे-वैसे हमारा व्यापार घाटा भी अभूतपूर्व तरीके से बढ़ता गया। व्यापार घाटे की वृद्धि का सीधा असर डॉलर की मांग पर पड़ा और रुपए का अवमूल्यन होता रहा।
वर्ष 2014 में केंद्र में राजग की सरकार आने के बाद इस मोर्चे पर गंभीरता से कार्य शुरू हुआ। खास तौर पर पिछले दो वर्षों से सरकार के ऐसे कई प्रयास देखने को मिल रहे हैं जिससे आयात पर हमारी निर्भरता आने वाले समय में और कम हो सकती है। आत्मनिर्भर भारत योजना के परिणाम अब सामने आने लगे हैं। विशेष रूप से दवा उद्योग के लिए कच्चा माल, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रिक वाहन, टेलीकॉम उत्पादों सहित कई प्रकार के अन्य उत्पाद अब भारत में बनने लगे हैं। आयात में होने वाली कमी से डॉलर की मांग घट सकती है। इस बीच भारत द्वारा रूस से कच्चा तेल खरीदने और उसका भुगतान रूपए में करने के कारण डॉलर की मांग में और कमी हो सकती है। वर्तमान में वैश्विक तेल मानक ब्रेंट क्रूड वायदा 0.42 प्रतिशत की बढ़त के साथ 94.32 डॉलर प्रति बैरल के भाव पर पहुंच चुका है।
रुपए की कमजोरी का एक मुख्य कारण अंतरराष्ट्रीय निवेशकों द्वारा भारत से विदेशी मुद्रा बाहर ले जाना भी रहा है। लेकिन हाल के दिनों में शेयर बाजार में बढ़ी चहल-पहल इस बात का सुखद संकेत दे रही है कि निवेश जल्दी ही पटरी पर आ जाएगा।
कुल मिलाकर दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले भारत की अर्थव्यवस्था न सिर्फ मजबूत है बल्कि एक निश्चित गति के साथ आगे बढ़ रही है। वैश्विक बाजार में तेल के दाम घटने और भारत में निवेश की तादाद बढ़ाने का परिणाम रुपए की बढ़त के रूप में देखा जा सकेगा।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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