Vasundhara Raje: वसुधंरा राजे के भविष्य पर असमंजस में है भाजपा नेतृत्व

Vasundhara Raje: अब यह तय है कि राजस्थान में कांग्रेस सामूहिक नेतृत्व में चुनाव लड़ेगी, लेकिन वहीं सत्ता में वापसी की कोशिश करने के लिए अशोक गहलोत सरकार को हर मोर्चे पर घेर रही भाजपा में नेतृत्व का पेंच अभी भी उलझा हुआ है। भाजपा का शीर्ष नेतृत्व न तो यह खुलकर घोषणा कर रहा है कि चुनाव सामूहिक नेतृत्व में लड़ा जाएगा और न ही किसी एक नेता का नाम आगे कर चुनाव में जाने की बात कर रहा है।

प्रधानमंत्री मोदी ने राजस्थान में पिछले 10 महीने में सात रैलियां की हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने 30 सितंबर 2022 को पहली रैली सिरोही जिले के आबू रोड में की थी और आखिरी रैली 8 जुलाई 2023 को बीकानेर में की थी। मोदी की इन रैलियों की खास बात यह रही कि किसी भी रैली में मोदी ने यह प्रदर्शित नहीं होने दिया कि प्रदेश का भावी मुख्यमंत्री उनकी नजर में कौन है। मोदी ही नहीं, पूर्व अध्यक्ष अमित शाह और वर्तमान अध्यक्ष नड्डा ने भी राजस्थान में संगठन की बैठक के दौरान किसी एक नाम को आगे कर चुनाव लड़ने के संकेत नहीं दिए। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की इस रणनीति से एक ओर जहां राजस्थान भाजपा के नेता अपने लिए उम्मीद की किरण देख रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे शीर्ष नेतृत्व के इस व्यवहार से असहज महसूस कर रही हैं।

rajasthan elections 2023 BJP leadership is confused about the future of Vasundhara Raje

गौरतलब है कि 2019 में सतीश पूनिया के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद से वंसुधरा राजे बीजेपी के बैनर और होर्डिंग्स से लगभग बाहर हो गई थीं। इससे नाराज होकर वंसुधरा राजे ने भी पार्टी के कार्यक्रमों से दूरी बनाना शुरू कर दिया था। लेकिन मोदी की अजमेर रैली में वसुंधरा राजे न सिर्फ़ पोस्टरों, होर्डिंग और मंच पर दिखाई दीं बल्कि पीएम मोदी ने हाथ जोड़कर वसुंधरा राजे का अभिवादन स्वीकार किया। इसके बाद दोनों के बीच कुछ देर तक बातचीत भी हुई।

भाजपा वसुधंरा को सम्मान दे रही है लेकिन वह नहीं कह रही है जिसे वसुंधरा सुनना चाह रही है। साफ है इसी साल चुनाव में जाने वाले इस राज्य को आलाकमान ने अपने हाथ में ले लिया है। राजस्थान में केन्द्रीय हाईकमान ने सभी नियुक्तियां कर दी है और केवल चुनाव प्रचार अभियान समिति की कमान किसके हाथ में होगी यह निर्णय अभी तक लटका कर रखा है। क्या राजे चुनाव समिति की प्रमुख बनाई जाएगी, जो अकेला अहम खाली पद बचा है? प्रदेश में गहलोत को हटाने के लिए सारी रणनीति और नारे दिल्ली से दिए जा रहे है। तंज भरा प्रचार गीत 'गहलोत जी, कोनी मिले वोट जी' भी दिल्ली से बनाकर भेजा गया है।

इस बीच वसुंधरा राजे ने चुनाव पूर्व राज्यव्यापी यात्रा निकालने के लिए केन्द्रीय नेतृत्व से अनुमति मांगी है। वसुंधरा राजे ने 2018 में भी राज्यवापी यात्रा निकाली थी, लेकिन केन्द्रीय नेतृत्व ने इस बार अभी तक उन्हें हरी झंडी नहीं दी है। कारण साफ है प्रदेश के लगभग सभी बड़े नेता वसुंधरा राजे द्वारा राज्यव्यापी रैली निकालने के खिलाफ हैं। प्रदेश के नेता चाहते हैं कि अगर यात्रा निकले तो उसकी अगुआई नेताओं का समूह करे, अकेली वंसुधरा राजे नहीं। फिलहाल केन्द्रीय नेतृत्व ने इसको लेकर अभी कोई फैसला नहीं किया है।

प्रदेश में अपनी भूमिका और भविष्य को लेकर चिंतित वसुंधरा राजे ने 13 जुलाई को दिल्ली में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा से मुलाकात की थी। अध्यक्ष के साथ बैठक में वसुंधरा ने साफ कहा था कि प्रदेश में उनकी क्या भूमिका होगी, इसे पार्टी स्पष्ट करे। वसुंधरा ने राष्ट्रीय अध्यक्ष से कहा कि प्रदेश भर के कार्यकर्ता उनसे पूछते हैं और वह बताने की स्थिति में नहीं है। हालांकि नड्डा ने भी साफ कहा कि पार्टी की पूरी नजर राजस्थान पर है और जो भी फैसला होगा वह समय आने पर बता दिया जाएगा। फिलहाल प्रदेश के सभी नेताओं को आपसी मतभेद को भुलाकर साथ मिलकर काम करना है।

खबर है कि वसुंधरा ने संकेतो में राष्ट्रीय अध्यक्ष को बता दिया है कि वह प्रदेश नेतृत्व पर अपना दावा छोड़ने के मूड में नहीं है। पार्टी ने भी वसुंधरा को कह दिया है कि पार्टी गहलोत सरकार को हराने के लिए यह तय कर चुकी है कि प्रदेश का विधानसभा चुनाव सामूहिक नेतृत्व में और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे पर ही लड़ा जाएगा। हालांकि, इसके साथ ही यह भी संदेश दिया गया है कि वसुंधरा राजे सिंधिया के राजनीतिक कद और अनुभव को देखते हुए पार्टी उन्हें विधानसभा चुनाव के मद्देनजर कोई बड़ी भूमिका दे सकती है। वह भूमिका क्या होगी यह अभी तय नहीं है।

राजस्थान में तीन बार मुख्यमंत्री रही वसुंधरा राजे चाहती हैं कि पार्टी उन्हे मुख्यमंत्री का चेहरा बनाए या उनको यह भरोसा दिलाए कि सरकार आने पर वही मुख्यमंत्री होंगी। पार्टी का केन्द्रीय नेतृत्व इसके लिए तैयार नहीं है। केन्द्रीय नेतृत्व का संकेत साफ है कि पहले सामूहिक और एकजुटता के साथ लड़कर गहलोत को बाहर किया जाए, उसके बाद मुख्यमंत्री का फैसला किया जाएगा। वसुंधरा को लग रहा है कि ऐसी स्थिति में पार्टी किसी नए चेहरे को भी मुख्यमंत्री का पद दे सकती है। हांलाकि राजस्थान में राजे और बीजेपी एक दूसरे की मजबूरी हैं और दोनों एक दूसरे को अपने लिए इस्तेमाल करने की कोशिश में है।

वसुंधरा राजे की परेशानी यह भी है कि मोदी और शाह ने प्रदेश के कई नेताओं को बड़े पद देकर उनका कद बढ़ाने का प्रयास किया है, हालांकि जनाधार में वे सब कमजोर पड़ते हैं। मोदी ने अर्जुन राम मेघवाल को कानून मंत्री बना दिया है। ओम बिड़ला (वैश्य) को लोकसभा स्पीकर बना रखा है। जगदीप धनखड़ (जाट) को उपराष्ट्रपति बना दिया। कैलाश चौधरी (जाट), गजेंद्र सिंह शेखावत (राजपूत) केंद्र में मंत्री हैं। वहीं राजेंद्र राठौड़ (राजपूत) को नेता विपक्ष, सतीश पूनिया (जाट) को उपनेता सदन, सीपी जोशी (ब्राह्मण) को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है। पार्टी के दूसरी कतार के नेता, जो वसुंधरा राजे के हटने पर अपने लिए मुख्यमंत्री पद की संभावना देख रहे हैं, वे दावा कर रहे हैं कि वे वसुंधरा के बिना भी आराम से जीत जाएंगे।

एक तथ्य और महत्वपूर्ण है कि राजस्थान में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कुछ पदाधिकारी भी नहीं चाहते कि वसुंधरा राजे प्रदेश में पार्टी का मुख्यमंत्री चेहरा हों। हालांकि वसुंधरा ने पिछले कुछ समय से लगातार संघ के शीर्ष पदाधिकारियों से मिलकर जमी बर्फ को पिघलाने की कोशिश की है लेकिन संघ अभी भी वसुंधरा को लेकर मन नहीं बना पाया है। वसुंधरा राजे के साथ समस्या यह भी है कि उनके रिटायर होने का इंतजार करने वालों की लिस्ट लंबी है। ऐसे में केन्द्रीय नेतृत्व अपने पसंदीदा प्रदेश के नेताओं को भी खुश रखना चाहता है।

दरअसल, भाजपा का केन्द्रीय नेतृत्व खुद वसुंधरा को लेकर दुविधा में है। भाजपा का शीर्ष नेतृत्व वसुंधरा को ताकत भी नहीं देना चाहता और पूरी तरह से नजरअंदाज भी नहीं करना चाहता। ऐसे में भाजपा वसुंधरा राजे को आने वाले राजस्थान चुनाव में क्या जिम्मेदारी देती है, यह देखना बाकी है। मोदी और शाह को कोई उनकी आंखों में आंखे डालकर बात करे, पंसद नहीं। लेकिन राजस्थान का मिजाज स्वाभिमान और नारी के सम्मान का है। वसुंधरा राजे का अपमान नरेंद्र मोदी के लिए 2024 में होने वाले लोकसभा चुनावों में बड़ा मुद्दा बन कर संकट पैदा कर सकता है। फिर सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि राजस्थान भाजपा में वसुंधरा नहीं तो फिर कौन?

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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