Rahul in Ladakh: राहुल गांधी फिर से गलती दोहरा रहे हैं
Rahul in Ladakh: राहुल गांधी 17 अगस्त को दो दिन के दौरे पर लद्दाख गए थे, लेकिन वहां पहुंचते ही उन्होंने अपना दौरा बढ़ाकर नौ दिन का कर लिया| हालांकि उनके इस एडवेंचर दौरे के दौरान उनकी राजनीतिक गतिविधियां भी रहेंगी, लेकिन ज्यादातर समय विभिन्न क्षेत्रों का भ्रमण और कल्चरल प्रोग्रामों में हिस्सा लेने में बीतेगा|
बहुत कम आबादी और एक लोकसभा सीट वाले केंद्र शासित क्षेत्र में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार का नौ दिन रहना राहुल की विदेश यात्राओं की तरह चर्चा का विषय बन गया है| जब भी कभी उनकी राजनीतिक परिपक्वता की छवि बनने लगती है, वह कोई न कोई ऐसी घटना को अंजाम दे देते हैं, जिस पर दूसरे दल उन्हें संदेह की दृष्टि से देखने लगते हैं|

राहुल गांधी ने पिछले छह महीने में जितने भी भाषण दिए, उनमें अपनी भारत जोड़ो यात्रा का जिक्र जरुर किया| उनकी यह भारत जोड़ो यात्रा राजनीतिक अनुभव और एडवेंचर का मिलाजुला रूप थी| हालांकि उन्हें राजनीतिक तौर पर पिछले बीस साल में चार बार लांच किया गया, लेकिन उनकी सबसे मजबूत लांचिंग भारत जोड़ो यात्रा से हुई है| कांग्रेस ने राहुल गांधी की अंतिम लांचिंग के दौरान ही गांधी परिवार से बाहर एक दलित को पार्टी अध्यक्ष बनाकर यह संकेत भी दिया कि कांग्रेस गांधी परिवार से बाहर भी सोच सकती है|
कांग्रेस के गांधी परिवार से बाहर सोचने के नतीजे हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक में मिले| इसी बीच राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा और संसद से उनकी बर्खास्तगी, दो ऐसी घटनाएं हुई, जिन्होंने उनकी राजनीतिक छवि उभारने का काम किया| इसी के बाद विपक्षी एकता के प्रयास भी सफल हुए, क्योंकि क्षेत्रीय पार्टियों को एहसास हुआ कि कांग्रेस फिर से पटरी पर लौट रही है|

याद कीजिए इससे पहले ममता बनर्जी और केसीआर गैर कांग्रेस, गैर भाजपा दलों का गठबंधन बनाने की कोशिशें कर रहे थे| हालांकि ममता बनर्जी की रणनीति क्षेत्रीय दलों को एकजुट करने के बाद उस गठबंधन का कांग्रेस से गठबंधन करने की थी| जबकि विपक्षी एकता की कोशिशों में बाद में जुड़े नीतीश कुमार और स्टालिन कांग्रेस की अगुआई में ही विपक्षी एकता के पक्षधर थे|
जैसे ही कर्नाटक के चुनाव नतीजे आए ममता बनर्जी ने अपनी कोशिशें बंद करके कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दलों का मिलाजुला गठबंधन बनाने पर सहमति दे दी| अखिलेश यादव को साथ लाने में अहम भूमिका लालू यादव की रही, जबकि केजरीवाल को साथ जोड़ने में दिल्ली सेवा अध्यादेश की अहम भूमिका रही| ममता बनर्जी और नीतीश कुमार दोनों केजरीवाल पर डोरे डाल रहे थे, लेकिन उन्हें सफलता तब मिली, जब केजरीवाल को दिल्ली सेवा बिल पर विपक्ष के समर्थन की जरूरत महसूस हुई|
इंडिया नाम का जो गठबंधन बना है, उसमें भले ही थोड़ी बहुत, लेकिन राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा की भी भूमिका रही है| राहुल गांधी के कन्विक्शन पर सुप्रीमकोर्ट का स्टे लगने और मानसून सत्र में उनके लोकसभा में दिए गए भाषण ने उन्हें फिर से हमलावर नेता के तौर पर प्रतिस्थापित किया है|
भारतीय जनता पार्टी ने राहुल गांधी की लोकसभा में वापसी के बाद उनकी छवि पर चीनी ठप्पा लगाने की कोशिशें तेज कर दी हैं| लोकसभा में निशीकांत दूबे, स्मृति ईरानी, राज्यवर्धन सिंह राठौड़ और कई अन्य भाजपा सांसदों ने गांधी परिवार और खासकर राहुल गांधी के चीन के साथ संबंधों पर सवाल उठाए थे| अविश्वास प्रस्ताव पर बहस के दौरान कांग्रेस की तरफ से किसी भी वक्ता ने उन सवालों का जवाब देने की जहमत नहीं उठाई|
राहुल गांधी संसद के भीतर और संसद से बाहर भी भारतीय भूभाग पर चीनी कब्जे और सीमान्त इलाकों में चीनी कम्युनिस्ट सेना के भारतीय सेना पर हावी होने के मुद्दे उठाते रहे हैं| वह फीडबैक उन्हें कुछ पत्रकारों से मिलता रहा है। चीन के लिए काम करने के आरोप में इस समय भी तीन पत्रकार भारतीय जेलों में हैं, जिनमें से एक तो दिल्ली में मुख्य धारा का पत्रकार था|
अभी हाल ही में न्यूजक्लिक नामक भारतीय वेबसाईट के बारे में खुलासा हुआ है कि वह चीन के समर्थन में लेख लिखवाने के लिए चीन से भारी भरकम पैसा हासिल कर रही थी| भारतीय भूभाग पर चीनी कब्जे को लेकर भारतीय मीडिया में पिछले तीन दशक से खबरें चलती रही हैं| इसी साल जनवरी में हिन्दू अखबार की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि भारतीय सेना पूर्वी लद्दाख में जिन 65 प्वाइंट्स पर पेट्रोलिंग किया करती थी, उनमें से 26 प्वाइंट्स पर चीन ने कब्जा कर लिया है| अखबार का दावा था कि दिल्ली में हुई वार्षिक पुलिस कांफ्रेंस में रखे गए एक पेपर मे यह बात कही गई है|
इस खबर में यह भी कहा गया था कि हाल ही में पीपी 15 और पीपी 16 पर हुए समझौतों के परिणामस्वरूप भारत को गोग्रा पहाड़ियों, पेंगोग त्सो के उत्तरी तट और काक्जंग क्षेत्रों में चारागाह भूमि का नुक्सान हुआ है| इस तरह की खबरें यूपीए शासनकाल में भी आती रही हैं| भारत में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों तरफ से एक दूसरे को कटघरे में खड़ा करने के लिए इन खबरों का राजनीतिक इस्तेमाल होता रहा है| इन राजनीतिक आरोपों-प्रत्यारोपों का चीन सरकार चीनी मीडिया में अपनी जनता का मनोबल बढ़ाने के लिए खूब इस्तेमाल करती हैं|
राहुल गांधी ने 20 अगस्त को अपने पिता राजीव गांधी का जन्मदिन पूर्वी लद्दाख की उसी 134 किलोमीटर लंबी पेंगोंग त्सो लेक पर श्रद्धांजलि देकर मनाने का फैसला किया है, जिसका 45 किलोमीटर हिस्सा भारत के नियन्त्रण में है, जबकि बाकी दो तिहाई हिस्सा चीन के नियन्त्रण में है| भारत तिब्बत सीमा पुलिस ने 15 अगस्त को वहां झंडा फहरा कर भारत माता की जय के नारे लगाए और राष्ट्रीय ध्वज के साथ परेड भी की थी|
पेंगोंग त्सो लेक और गलवान घाटी वह इलाका है, जहां शुरू से भारत और चीनी सैनिकों के बीच झडप होती रही है| 15 जून 2020 को गलवान घाटी के पीपी 14 पर भारतीय और चीन की कमुनिस्ट सेना में मुठभेड़ हुई थी। इस मुठभेड़ के बाद चीन और भारत दोनों ने पेंगोग लेक में पेट्रोलिग बोट्स की संख्या बढ़ा दी थी|
जून 2020 की मुठभेड़ के बाद भारत ने इस पूरे इलाके में अपनी सैन्य ताकत बढ़ा रखी है। भारत ने 68 हजार सैनिकों को तैनात किया है और बड़े पैमाने पर इन्फ्रास्टक्चर का निर्माण किया है| पेंगोग लेक पर आठ फिंगर प्वाइंट हैं। भारत का दावा है कि सभी फिंगर प्वाइंट इसके इलाके में आते हैं, लेकिन चीन फिंगर 5 से 8 पर दावा करता है| फींगर 4 पर भारतीय सेना की पोस्ट है|
राहुल गांधी का लद्दाख जाना कतई विवाद का मुद्दा नहीं हो सकता, क्योंकि यह भारत के हर नागरिक का हक है। एक राजनीतिक नेता के नाते वह राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लेने कहीं भी जा सकते हैं| अगले महीने कारगिल हिल कौंसिल का चुनाव भी है| लेकिन अपना दौरा बढ़ा लेना और भारत चीन में टकराव का कारण बनी पेंगोग लेक पर जाना निश्चित ही राजनीतिक विवादों को जन्म देगा, जिससे राहुल गांधी को बचना चाहिए था| भाजपा इसे भुनाने का कोई मौक़ा नहीं चूकेगी और उनकी यह गलती इंडिया गठबंधन को महंगी पड़ सकती है|
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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