Rahul Gandhi Yatra: माइनॉरिटी पॉलिटिक्स को ताकत देने के लिए है राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा
अपने आप को नफरत के बाजार में प्यार का दुकानदार कहने वाले राहुल गांधी ने लालकिले पर यह कहकर चौंका दिया कि उन्हें देश में कहीं नफरत नहीं दिखी।

Rahul Gandhi Yatra: राहुल गांधी अभी तक यही कहते आ रहे थे कि देश में नफरत का माहौल है लेकिन दिल्ली पहुंचकर उन्होंने स्वीकार किया कि देश में नफरत का माहौल नहीं है। जो नफरत का माहौल है वह दिल्ली के टीवी चैनलों द्वारा फैलाया जा रहा है जो किसी के इशारे पर जानबूझकर हिन्दू मुसलमान की बहस चला रहे हैं।
स्वाभाविक है उनका इशारा प्रधानमंत्री मोदी की ओर है जिनको लालकिले से उन्होंने जेबकतरा तक कह दिया। राहुल गांधी ने मोदी की तुलना जेबकतरे से करते हुए कहा कि जैसे जेबकतरा आपकी जेब काटने से पहले आपका ध्यान भटकाता है वैसे ही टीवी पर हिन्दू मुसलमान की बहस चलाकर आपका ध्यान भटका रहा है। आपका ध्यान भटकाकर वह आपकी जेब काट रहा है।
कन्याकुमारी से कश्मीर तक 3700 किलोमीटर की पदयात्रा पर राहुल गांधी जब शनिवार को दिल्ली पहुंचे तो उन्होंने 108 दिनों में लगभग 2800 किलोमीटर की दूरी पूरी कर ली। इन 108 दिनों में कोई दो से तीन सौ पदयात्री हैं जो लगातार उनके साथ चल रहे हैं जबकि बाकी पदयात्री अपनी अपनी सुविधानुसार जुड़ते और अलग होते रहते हैं।
दिल्ली में उनकी यात्रा देखकर कोई भी सहज ही अंदाज लगा सकता था कि राहुल गांधी ने भारत की भले ही 2800 किलोमीटर पदयात्रा कर ली हो लेकिन उनके आसपास का घेरा या फिर यात्रा में आने जाने वाले लोग उनकी पार्टी से जुड़े इकोसिस्टम वाले लोग ही हैं। इसमें भी दिल्ली में मुस्लिम समुदाय ने बढ चढकर हिस्सा लिया।
राहुल गांधी की यह भारत जोड़ो यात्रा करीब से देखने पर मॉइनॉरिटी जोड़ो यात्रा ज्यादा नजर आती है। कांग्रेस के सीमित नेताओं और कार्यकर्ताओं के इतर जो लोग इस पदयात्रा में दिखे उसमें वाम विचारधारा से जुड़े लोग, एनजीओ बिरादरी तथा मुस्लिम मॉइनॉरिटी ही प्रमुख थी। वो जहां जहां से गुजरे आसपास के लोगों में राहुल गांधी को देखने की उत्सुकता जरूर दिखी लेकिन सामान्य लोग इस पदयात्रा के यात्री बनने को उत्सुक नहीं दिखे। यह भी एक विरोधाभाष ही है कि अगर राहुल गांधी की बातें इतनी ही सही हैं तो फिर वो जहां से गुजर रहे हैं, वहां के स्थानीय लोग उनकी यात्रा में शामिल होने की उत्सुकता क्यों नहीं दिखा रहे?
क्या इसका कारण राहुल गांधी की पदयात्रा में एनजीओ बिरादरी का प्रभुत्व है या फिर मुस्लिमों की बढचढकर भागीदारी बाकी लोगों को उसमें शामिल होने से रोक रही है? बीते एक दशक में भारत की राजनीतिक सच्चाई तो यह हो गयी है कि राजनीतिक रैलियों या सम्मेलनों में दाढी टोपी वाले लोगों को बढ़ा चढ़ाकर शामिल करने से राजनीतिक दल ही बचने लगे हैं। भारत की मुस्लिम तुष्टीकरण वाली राजनीति का प्रभाव कमजोर हुआ है। उन्हें भी उसी तरह एक सामान्य वोटर समझा जा रहा है जैसे बाकी वोटर हैं। तो क्या राहुल गांधी की नफरत छोड़ो, भारत जोड़ो का नारा मुस्लिम राजनीति को फिर से उसी तरह स्थापित करने की पहल है, जैसा 2014 से पहले हुआ करती थी?
पदयात्रा के बीच राहुल गांधी बार बार जो बोल रहे हैं उससे संदेश तो यही जा रहा है कि वो राजनीति में रिलीजियस मॉइनॉरिटी की सर्वोच्चता को स्थापित करने के लिए मेहनत कर रहे हैं। उनके बयान, उनके नारे ये संदेश दे रहे हैं कि 2014 के बाद भारत के धार्मिक अल्पसंख्यक हाशिये पर चले गये हैं। इस हाशिये को ही उन्होंने संभवत: नफरत से परिभाषित किया है और उनको राजनीति की मुख्यधारा में स्थापित करने को ही 'प्यार' का नाम दिया गया है, जिसका दुकानदार स्वयं राहुल गांधी अपने आप को घोषित कर ही चुके हैं।
इसे समझने के लिए अतीत में हुई राजनीतिक गतिविधियों को देखना पड़ेगा। नब्बे के दशक में जब राम मंदिर आंदोलन के कारण मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति ध्वस्त होनी शुरु हो गयी तो सेकुलर खेमे में बहुत हलचल हुई थी। उस समय सेकुलर राजनीति के सारे कर्मकांड कम्युनिस्ट पार्टियां तय करती थीं। भाजपा की बढ़त से बेचैनी इतनी बढ़ी कि पहले भाजपा को लंबे समय तक कम्युनल या सांप्रदायिक दल कहा गया लेकिन जब लगा कि इतने से बात नहीं बनेगी तो कम्युनिस्ट पार्टियों ने दूसरी चाल चली।
सेकुलर पार्टियों की पटना में हुई एक रैली में सीपीआई के महासचिव एबी वर्धन ने हिन्दू वोटरों से अपील करते हुए भगवान राम का वास्ता देकर भाजपा को वोट न करने की अपील ही कर दी थी। आप कह सकते हैं कि यह कम्युनिस्ट पार्टियों का प्लान बी था। जिस राम को काल्पनिक चरित्र बताकर कम्युनिस्ट पार्टियां उनका अपमान करती थीं, अचानक से उन्हें वो ऐसे आदर्श पुरुष नजर आने लगे जिनके अनुयायी कभी भी भाजपा जैसी कम्युनल पार्टी को वोट दे ही नहीं सकते।
अपनी भारत जोड़ो यात्रा में राहुल गांधी ने जब जब राम का जिक्र किया तब तब एबी वर्धन वाली सोच ही सामने रखी कि राम महान थे लेकिन उनके अनुयायी आरएसएस और भाजपा जैसे नफरत फैलाने वाले लोगों का साथ कैसे दे सकते हैं?
भले ही भारत में कम्युनिस्ट पार्टियों का पतन हो गया है लेकिन कम्युनिस्ट विचारधारा वाले लोग आज भी एक प्रेशर ग्रुप के रूप में बहुत प्रभावशाली हैं। एनजीओ, पत्रकारिता, न्यायापालिका, फिल्म और साहित्य में आज भी कम्युनिस्ट एक ताकतवर लॉबी के रूप में मौजूद हैं। कम्युनिस्ट विचारधारा से जुड़े कन्हैया कुमार हों या फिर संदीप सिंह। राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के अगुवा यही लोग हैं। वही लोग राहुल गांधी के आंख कान हैं। वो जैसा भारत राहुल गांधी को दिखाते हैं, राहुल गांधी वैसा ही भारत देखते हुए दिल्ली पहुंच जाते हैं।
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बहरहाल, ये सब राजनीतिक गुणा गणित और जोड़ तोड़ एक तरफ और राहुल गांधी एक तरफ। लालकिले पर बोलने की शुरुआत करते हुए जिस तरह से उन्होंने अपनी यात्रा में कुत्ता, गाय और सुअर के आने का उल्लेख किया, उससे कम से कम वहां मौजूद बड़ी संख्या में मुस्लिम समर्थकों के माथे पर बल जरूर पड़ गये। खासकर तब जब उन्होंने सुअर का जिक्र किया। लेकिन राहुल गांधी तो बाल गोपाल जैसे हैं। बिल्कुल सहज सरल। वो कहां रुकने वाले। उन्होंने अपनी यात्रा में आये सूअर का जिक्र किया और कम्युनिस्ट विचारकों के सब किये कराये पर पानी फेर दिया।
यह भी पढ़ें: Rahul Gandhi on China: क्यों देते हैं राहुल गांधी देश की सेना और जनता का मनोबल तोड़ने वाले बयान?
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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