Comment on Savarkar: सावरकर पर गांधी नेहरू के विचार और राहुल गांधी का स्तरहीन प्रचार
Comment on Savarkar: महाराष्ट्र के वाशिम जिले में राहुल गांधी ने वीर सावरकर पर सवाल उठा दिया। वे और उनका प्रचारतंत्र अरसे से सावरकर को माफीवीर बताता रहा है। राहुल गांधी ने उसी को एक बार फिर दोहराया है। जिस पर विवाद होना स्वाभाविक है।

महाराष्ट्र में हाल तक महागठबंधन अघाड़ी के साये तले जिस शिवसेना नेता उद्धव ठाकरे की अगुआई में राहुल गांधी की कांग्रेस सरकार चला रही थी, वह उद्धव ठाकरे भी राहुल के इस बयान से ना सिर्फ किनारा कर चुके हैं, बल्कि इस पर एतराज जता चुके हैं। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि भारत जोड़ने की तमन्ना लेकर 150 दिनों की पदयात्रा पर निकले राहुल अपना लक्ष्य भूल गए हैं या फिर जानबूझकर वे वितंडा फैलाने की कोशिश कर रहे हैं?
इसमें दो राय नहीं कि राहुल गांधी सावरकर का मसला उठाकर एक बार फिर गांधी और पटेल की धरती पर राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैं। उस धरती पर, जो पिछले करीब 21 सालों से नरेंद्र मोदी और 27 सालों से उस भारतीय जनता पार्टी की माटी बनी हुई है, जिसके विरोध में राहुल गांधी सावरकर और हिंदुत्व के बहाने नैरेटिव की लड़ाई लड़ रहे हैं।
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जब से राहुल कांग्रेसी राजनीति के केंद्र में आए हैं, उनके समर्थक और सलाहकार लगातार नैरेटिव के हथियार से भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर निशाना बना रहे हैं। लेकिन सोशल मीडिया नैरेटिव की इस लड़ाई में कांग्रेस और राहुल लगातार पीछे छूट रहे हैं। नैरेटिव के तमाम गोले दागने के बावजूद अगर कांग्रेस चुनावी राजनीति में लगातार पिछड़ रही है तो अव्वल तो कांग्रेस को सोचना चाहिए कि राहुल के सलाहकार कितने क्षमतावान हैं।
बेशक कांग्रेस को बुजुर्ग मल्लिकार्जुन खड़गे के रूप में करीब साढ़े तीन साल के इंतजार के बाद पूर्णकालिक नया अध्यक्ष मिल गया है, लेकिन कांग्रेस की जो सांगठनिक संरचना और उसका गुणसूत्र है, उसमें असली अध्यक्ष नेहरू-गांधी परिवार ही है। जिसके तीन महत्वपूर्ण सदस्य हैं, सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा। इसके अलावा कांग्रेस में सब रस्सी है। खराब स्वास्थ्य के कारण सोनिया अब बहुत ज्यादा सक्रिय नहीं हैं, इसलिए कांग्रेस में सर्वाधिक सक्रिय प्रियंका और राहुल ही हैं।
गौर किया जाना चाहिए कि इन दोनों के सलाहकारों की टीम में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में पढ़े अतिवादी वामपंथी वैचारिक धारा वाले संगठन ऑल इंडिया स्टूडेंट ऑर्गनाइजेशन यानी आइसा या फिर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के छात्र संगठन स्टूंडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया के ही लोग हैं। अपने कुछ पूर्वज वैचारिक राजनेताओं की तरह इन युवाओं ने अपना राजनीतिक बपतिस्मा कराकर कांग्रेस की सलाहकारी हथिया ली है।
बेशक वे कांग्रेस के कथित खेवनहारों के सलाहकार हैं, लेकिन उनकी वैचारिकता पर कांग्रेस की मध्यमार्गी वैचारिक धारा की बजाय इनकी मार्क्सवादी धारा हावी है। इसलिए वे लगातार नैरेटिव का ही भाला फेंकते-फिंकवाते रहते हैं और कांग्रेस की ऐसी-तैसी कराते रहे हैं। राहुल गांधी का सावरकर पर दिया बयान इसी का उदाहरण है।
राजनेता जब प्रमुख होता है, तब वह किसी विरासत का उत्तराधिकारी भी होता है, ऐसे में उसे अपने अतीत और पूर्वजों का भी ध्यान रखना चाहिए। लेकिन लगता है कि राहुल गांधी का ऐसा राजनीतिक प्रशिक्षण नहीं हुआ है। राहुल गांधी को कभी-कभी पढ़ लेना चाहिए कि उनके पूर्वज ही सावरकर के बारे में क्या कह गए हैं या फिर कैसी राय रखते थे।
साल 1957 में प्रथम स्वाधीनता संग्राम की सौंवी सालगिरह मई में मनाई जानी थी। तब देश के प्रधानमंत्री, राहुल की दादी के पिता पंडित नेहरू थे। भारत के स्वाधीनता आंदोलन की गौरव गाथा की स्मृति वाले उस कार्यक्रम के लिए प्रधानमंत्री को भी बुलावा मिला। उसमें सावरकर को भी शामिल होना था।
नेहरू ने तब आयोजन समिति को जो पत्र लिखा था, उसे राहुल गांधी और उनके सलाहकारों को पढ़ना चाहिए। नेहरू ने लिखा था, "सावरकर वीर पुरुष हैं, एक नायक, एक महापुरुष। इंग्लैण्ड में जब मैं विद्यार्थी था, हम 1857 पर उनकी पुस्तक से प्रेरित थे। यह महान पुस्तक है, जिसने अनेक भारतीयों को प्रेरित किया है परन्तु वह इतिहास नहीं है। हम अनेक मुद्दों पर भिन्न मत रखते हैं और उन्हें संकोच होगा यदि मैं भिन्न स्वर में बोला। सावरकर के लिए मेरे मन में अपार श्रद्धा है और मैं उनसे जरूर मिलना चाहता। परन्तु एक मंच पर हम दोनों का बोलना गलत होगा।" गौर कीजिए, इस पत्र में पंडित नेहरू सावरकर से असहमति जताते हैं। लेकिन उनकी निष्ठा और भारत प्रेम पर सवाल नहीं उठाते। वे उनके विचार का सम्मान करते हैं।
कांग्रेस पर जिस आपातकाल का दाग है, उसे राहुल गांधी की दादी इंदिरा गांधी ने देश पर थोपा था। लेकिन वे भी सावरकर के प्रति वैसा भाव नहीं रखती थीं,जैसा राहुल गांधी बोल रहे हैं। इंदिरा गांधी ने सावरकर की जन्मशताब्दी पर 30 मई 1980 को स्वातंत्र्यवीर सावरकर स्मारक के सचिव को पत्र लिखकर सावरकर की वीरता को याद किया था। इस पत्र में इंदिरा गांधी ने लिखा था कि "सावरकर द्वारा ब्रिटिश सरकार की आज्ञा का उल्लंघन करने की हिम्मत करना हमारी आजादी की लड़ाई में अपना अलग ही स्थान रखता है।"
और तो और इंदिरा गांधी ने साल 1970 में वीर सावरकर के सम्मान में ना सिर्फ एक डाक टिकट जारी किया था, बल्कि सावरकर ट्रस्ट में अपने निजी खाते से 11,000 रुपए दान किए थे। इसके बाद 1983 में उन्होंने फिल्म डिवीजन को आदेश दिया था कि वह 'महान क्रांतिकारी' के जीवन पर एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाए।
सावरकर पर हमले का बहाना राहुल गांधी ने उनके कथित माफीनामे को बनाया है। राहुल सावरकर को माफीवीर बताकर एक तरह से उनका अपमान करते हैं। यहां याद किया जाना चाहिए कि भारत के लेनिन माने जाने वाले पुणे निवासी कम्युनिस्ट नेता श्रीपाद अमृत डांगे ने मेरठ षड्यंत्र काण्ड में तत्कालीन वायसराय को माफीनामा भेज दिया था। राष्ट्रीय संग्रहालय में वह दस्तावेज सुरक्षित है।
बहुत कम लोग जानते हैं कि 1962 में हुए कम्युनिस्ट पार्टी के बंटवारे की एक बड़ी वजह यह मसला भी रहा। दिलचस्प यह है कि राहुल जब भी सावरकर का मामला उछालते हैं, तब सबसे ज्यादा वामपंथी ही इसे पब्लिक में मुद्दा बनाती है। यहां दोहराना नहीं है कि इसी वैचारिकी वाले लोग राहुल के सलाहकार हैं।
इस पूरे मसले पर चर्चा के आखिर में हमें गांधी के विचारों को भी याद कर लेना चाहिए, जो उन्होंने कालापानी की सजा भुगत रहे सावरकर के सम्मान में प्रकट किए थे। 8 मई 1921 के यंग इंडियन के अंक में महात्मा गांधी ने लिखा था, 'अगर भारत इसी तरह सोया पड़ा रहा, तो मुझे डर है कि उसके ये दो निष्ठावान पुत्र (वीर सावरकर और उनके बड़े भाई जो कैद में थे) सदा के लिए हाथ से चले जाएंगे। एक सावरकर भाई (विनायक दामोदर सावरकर) को मैं बहुत अच्छी तरह जानता हूं। मुझे लंदन में उनसे भेंट का सौभाग्य मिला है। वे बहादुर हैं, चतुर हैं, देशभक्त हैं। वे क्रांतिकारी हैं और इसे छिपाते नहीं हैं। मौजूदा शासन-प्रणाली की बुराई का सबसे भीषण रूप उन्होंने बहुत पहले, मुझसे भी काफी पहले देख लिया था। आज भारत को, अपने देश को दिलोजान से प्यार करने के अपराध में वे कालापानी भोग रहे हैं।"
सावरकर को घृणा की राजनीति का केंद्र बनाने की कोशिश करते वक्त कांग्रेस, राहुल गांधी और उनके वामपंथी सलाहकारों को इन तथ्यों को भी देख-परख और समझ लेना चाहिए।
यह भी पढ़ें: Rahul and Savarkar: वीर सावरकर का कांग्रेस ने किया सम्मान तो राहुल गांधी क्यों कर रहे हैं अपमान?
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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