Rahul and Savarkar: वीर सावरकर का कांग्रेस ने किया सम्मान तो राहुल गांधी क्यों कर रहे हैं अपमान?
Rahul and Savarkar: भारत जोड़ो यात्रा पर निकले कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी ने फिर से विवादित टिप्पणी की है। महाराष्ट्र के अकोला पहुंचने पर राहुल गांधी ने विनायक दामोदर सावरकर पर अंग्रेजों की मदद करने का आरोप लगाया है। राहुल गांधी ने एक चिट्ठी दिखाते हुए प्रेस कांफ्रेस में कहा है कि सावरकर ने कारागार में रहने के दौरान अंग्रेजों के डर से माफीनामे पर हस्ताक्षर करके महात्मा गांधी और अन्य समकालीन भारतीय नेताओं को धोखा दिया था।

यह पहली बार नहीं है कि राहुल गांधी ने सावरकर पर असमय, अनावश्यक और अमर्यादित बयान दिया है। महाराष्ट्र के पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान भी राहुल गांधी ने महाराष्ट्र मे प्रचार करते समय सावरकर को कायर कहकर महाराष्ट्र में तूफान खड़ा कर दिया था।
उस समय शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने राहुल गांधी को जूते से मारने की बात कही थी। लेकिन बाद में राहुल गांधी की कांग्रेस के समर्थन से सरकार चला चुके उद्धव ठाकरे ने आज सिर्फ राहुल के बयान से असहमति जताकर अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश की है।
राहुल गांधी जब से भारतीय राजनीति में प्रकट हुए है, तब से लगातार समय समय पर कुछ अतंराल के बाद सावरकर पर अनर्गल आरोप लगाते रहते हैं। राहुल गांधी भूल जाते है कि उनकी दादी इंदिरा गांधी ने सावरकर पर डाक टिकट जारी किया था और सावरकर की स्मृति में स्थापित न्यास को निजी तौर पर 11 हजार रूपये दिए थे।
मुम्बई के कांग्रेसी महापौर ने दादर में 100 करोड की जमीन सावरकर स्मृति के लिए दी थी, जिसका भूमिपूजन कांग्रेस के नेता जगजीवनराम ने किया था और शिलान्यास कांग्रेसी राज्यपाल डॉ शंकर दयाल शर्मा ने किया था। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता कांग्रेस के शरद पवार ने की थी।
राहुल गांधी यह कैसे भूल जाते है कि सावरकर पर बनी सरकारी फिल्म कांग्रेस के सूचना और प्रसारण मंत्री वसंत साठे और विट्ठल गाडगिल के सक्रिय सहयोग से बनी थी। वंसत साठे ने सावरकर को भारत रत्न देने की मांग भी की थी।
यह समझना जरूरी है कि अगर राहुल गांधी के पूर्वजों और कांग्रेस के पूर्व नेताओं ने सावरकर को सम्मान दिया तो राहुल गांधी सावरकर की तीखी आलोचना क्यों कर रहे हैं? सावरकर पर राहुल की आक्रामकता उनकी समझ और आज के समय से परे है।
राहुल गांधी इस बात को कैसे भूल जाते है कि महाराष्ट्र के रोम रोम में सावरकर बसे हैं जैसे इस देश के रोम रोम में महात्मा गांधी हैं। सावरकर के घर महाराष्ट्र में जाकर सावरकर कोे भला बुरा कहकर राहुल कौन सी राजनीतिक जमीन बचाना चाहते हैं यह किसी को नहीं मालूम।
महाराष्ट्र में सावरकर को नापंसद करने वाले लोग भी सावकर की सार्वजनिक आलोचना पंसद नहीं करते। राहुल गांधी भूल रहे हैं कि जनता राजनेताओं से और राजनीतिक दलों की राजनीति से ऊपर होती है।
जनता की अपनी एक स्मृति होती है जो अपने नायकों से अपना रिश्ता गढ़ती है। यह टैगोर थे जिन्होंने मोहनदास करमचंद गांधी को महात्मा कहा और पूरा देश गांधी को महात्मा मानने लगा। गांधी ताउम्र अपने आचरण से महात्मा होने की पात्रता बार बार अर्जित भी करते रहे।
विनायक दामोदर सावरकर को स्वातंत्र वीर सावरकर कहा गया और पूरे महाराष्ट्र ने वीर सावरकर को कंधे पर उठाया। महाराष्ट्र की जनता सावरकर को लेकर संवेदनशील है, इसलिए महाराष्ट्र के किसी भी राजनीतिक दल ने कभी भी सावरकर की वीरता को लेकर प्रश्न नहीं उठाया।
स्वंतत्रता आंदोलन में गरम दल और नरम दल दोनों की भूमिका रही। व्यक्तिगत और सामूहिक आंदोलन भी चले। सभी अपना अपना ऐतिहासिक रोल अदा करके चले गए। क्या हम सभी स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने वाले वीरों को उसी तरह याद करते हैं, जैसे किसी कृतज्ञ राष्ट्र को करना चाहिए? नहीं करतें।
स्वतंत्रता संग्राम के सभी सेनानी हमारे नेताओं के लिए श्रद्धा के पात्र होने चाहिए। लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारे नेता नायकों की बंदरबांट में लगे हैं। यह वही लोग कर रहे हैं, जिन्हे न तो तथ्यों की पृष्ठभूमि का पता है और न ही उनमें इतनी क्षमता है कि इतिहास की विवादास्पद घटनाओं का वे वस्तुनिष्ठ विश्लेषण कर सकें।
राहुल गांधी भी स्वतंत्रता आंदोलन में वीर सावरकर के योगदान को नकार नहीं सकते। सावरकर का योगदान अतुलनीय हैं। पचास साल की सजा पाने वाले सावरकर पहले और अकेले क्रांतिकारी थे। पूर्ण स्वराज की मांग सबसे पहले सावरकर ने ही की थी।
सावरकर ऐसे पहले भारतीय बैरिस्टर थे, जिनके उग्र विचारों के चलते ब्रिटेन ने डिग्री नहीं दी थी। सावरकर ऐसे पहले भारतीय लेखक थे जिनकी पुस्तकों के छपने से पहले ही दो देशों की सरकारों ने पांबदी लगा दी थी। वे ऐसे पहले कैदी थे जिनकी रिहाई का मुकदमा हेग के अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में चला।
सावरकर एकमात्र ऐसे क्रांतिकारी थे जिन्होंने उच्च कोटि के काव्य, नाटक, उपन्यास के अलावा इतिहास और राजनीति पर पाण्डित्यपूर्ण मौलिक ग्रंथों की रचना की। सावरकर ऐसे पहले भारतीय नेता थे जिन्होंने भारत की आजादी के सवाल को अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया था।
27 साल की उम्र में उन्हें 50 साल की सजा मिली थी। ब्रिटेन से भारत लाते वक्त उन्होने समुद्र से छंलाग क्या लगाई वे दुनिया के क्रांतिकारियों के हीरो बन गए। 27 साल तक अण्डमान निकोबार और रत्नागिरी की जेलों में अपना सर्वस्व होम करने वाले वीर सावरकर जैसा क्रांतिकारी भारत में कोई दूसरा नहीं हुआ। फिर ऐसा क्यों हुआ कि सावरकर वह सम्मान नहीं पा सके जिसके वह हकदार थे। इसका कारण यह माना जा सकता है कि उनको हिन्दू सांप्रदायिकता और हिंसा का जनक माना गया और उनसे दूरी बना ली गई।
सावरकर जैसे सशस्त्र क्रांतिकारी और भी हुए लेकिन उनकी अवहेलना वैसी नहीं हुई जैसी सावरकर की हुई। सावरकर की अवेहलना का मुख्य कारण यह रहा कि गांधी और नेहरू को सबसे बड़ी चुनौती सावकर ने ही दी थी। गांधी के असली वैचारिक विरोधी जिन्ना, सुभाषचंद्र बोस और अंबेडकर नहीं, सावरकर थे। इन तीनों नेताओे ने कभी ना कभी गांधी के साथ काम किया लेकिन सावरकर ने कभी भी गांधी के साथ काम नहीं किया।
सावरकर को कांग्रेस के साथ काम करने के लिए कांग्रेस के अनेक नेताओं ने कोशिश की लेकिन सावरकर ने इस्लामिक सिद्धांतों के सामने घुटने नहीं टेके इसलिए कांग्रेस में नहीं गए।
सावरकर हिन्दू महासभा के अध्यक्ष बने और गांधी के अहिंसावाद और सेक्युलरिज्म को चुनौती दी। सावरकर ने हिंदू महासभा के अध्यक्ष रहते साफ कहा कि कांग्रेस की नीति के कारण इस देश में हिंदू और मुसलमान दो अलग देश की तरह रह रहे हैं। अगर मुसलमानों को अलग देश मिलता है तो वह भारत के लिए स्थायी सिरदर्द होगा। भारत की अखंडता भंग होने को है और उसको बचाने की जिम्मेदारी हिन्दुओं पर है। इसलिए उन्होंने कहा था कि 'राजनीति का हिंदूकरण हो और हिन्दुओं का सैनिकीकरण हो'।
सावरकर स्वयं नास्तिक थे लेकिन वैचारिक तौर पर हिन्दुत्व के प्रवक्ता थे। उनका हिन्दुत्व परम्परा भंजक, हिंसक प्रतिकार का समर्थक था। सावरकर सांप्रदायिक नहीं, बुद्धिवादी थे और इसी कारण राष्ट्रवादी थे। राहुल गांधी बार बार उनकी महानता और देशभक्ति को माफी और पेंशन में तौलने की कोशिश न करें। यह कोशिश राहुल की अज्ञानता का परिचायक है और कुछ नहीं।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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