समय है देश विरोधियों के चहरे से नकाब उतारने का

नई दिल्ली। पुलवामा की आतंकवादी घटना के बाद से जिस प्रकार के कदम हमारी सरकार राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठा रही है उससे ना सिर्फ देश में एक सकारात्मक माहौल उत्पन्न हुआ है बल्कि इन ठोस कदमों ने हमारे सुरक्षा बलों के मनोबल को भी ऊंचा किया है, लेकिन यह खेद का विषय है कि सरकार के जिन प्रयासों का स्वागत पूरा देश कर रहा है उनका विरोध देश की सबसे पुरानी राजनैतिक पार्टी कांग्रेस समेत जम्मू कश्मीर के स्थानीय विपक्षी दल कर रहे हैं। काश कि ये समझ पाते कि इनका गैर जिम्मेदाराना और सरकार विरोधी आचरण देश विरोध की सीमा तक जा पहुंचा है, क्योंकि अपने राजनैतिक हितों के चलते इन लोगों ने कश्मीर समस्या को और उलझाने का ही काम किया है।

समय है देश विरोधियों के चहरे से नकाब उतारने का

पाक परस्ती के चलते जो लोग यह कहते हैं कि युद्ध किसी समस्या का विकल्प नहीं होता उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि युद्ध किसी समस्या का पहला विकल्प नहीं होता लेकिन अंतिम उपाय और एकमात्र समाधान अवश्य होता है। श्री कृष्ण ने भी कुरुक्षेत्र की भूमि पर गीता का ज्ञान देकर महाभारत के युद्ध को धर्म सम्मत बताया था। और जो लोग यह कहते हैं कि 1947 से लेकर आजतक कश्मीर के कारण भारत और पाकिस्तान में कई युद्ध हो चुके हैं तो क्या हुआ? तो उनके लिए यह जानना आवश्यक है कि हर युद्ध में हमारी सैन्य विजय हुई लेकिन राजनैतिक हार। हर युद्ध में हम अपनी सैन्य क्षमता के बल पर किसी न किसी नतीजे पर पहुंचने के करीब होते थे लेकिन हमारे राजनैतिक नेतृत्व हमें किसी नतीजे पर पहुंचा नहीं पाए। यह वाकई में शर्म की बात है कि हर बार हमारी सेनाओं द्वारा पाकिस्तान को कड़ी शिकस्त देने के बावजूद हमारी सरकारें कश्मीर समस्या का हल नहीं निकाल पाईं। हर बार दुश्मन से सैन्य मोर्चे पर विजय प्राप्त कर लेने के बाद भी हम राजनैतिक और कूटनीतिक मोर्चे पर विफल रहे, 1948 में जब हमारी सेनाएँ पाक फौज को लगातार पीछे खदेड़ने में कामयाब होती जा रही थीं तो कश्मीर मामले को संयुक्तराष्ट्र क्यों ले जाया गया? क्यों 1965 में हमें भारतीय सेना द्वारा पाक का जीता हुआ भू भाग वापस करना पड़ा। 1971 में जब पाक ने अपनी पराजय स्वीकार करी थी और भारतीय सेना के समक्ष 90000 हज़ार पाक सैनिकों ने आत्मसमर्पण किया था तब संपूर्ण कश्मीर लेकर उसका स्थाई समाधान ना करके शिमला समझौता क्यों किया गया?

इसे राजनैतिक इच्छा शक्ति का अभाव कहा जाए या मजबूरी? कारण जो भी रहा हो लेकिन कहना गलत नहीं होगा कि हमारे द्वारा इतिहास में की गईं कुछ गलतियों की सज़ा पूरा देश आजतक भुगत रहा है खासतौर पर हमारी सेनाएँ और उनके परिवार। पहले जो पाकिस्तान आमने सामने से युद्ध करता था, अब आतंकवादियों के सहारे छिप कर वार करता है। लेकिन इस बार भारत का नेतृत्व इस मुद्दे पर आरपार की निर्णायक लड़ाई के लिए अपनी इच्छा शक्ति जता चुका है जिसका स्वागत पूरे देश ने किया। लेकिन इसे क्या कहा जाए कि आज जब देश की हर जुबाँ पर पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब देने की बात है तो महबूबा पाकिस्तान से बातचीत की वकालत करती हैं। जब घाटी में अलगाववाद को बढ़ावा देने वाले अलगाववादी नेताओं को गिरफ्तार किया जाता है तो वो विरोध करती हैं। 35A और 370 की बात आती है तो विरोध करती हैं। दरसअल इस प्रकार के नेता और उनके राजनैतिक स्वार्थ ही कश्मीर की समस्या के मूल में हैं। जब हमारे सैनिक इनकी रक्षा में शहीद होते हैं तब ये लोग आतंकवादियों से हथियार छोड़ कर बात करने के लिए क्यों नहीं कहते इसके विपरीत जब हमारी सेना कार्यवाही करने लगती है तो ये बातचीत से मुद्दे का हल निकालने की बात करते हैं। जब हमारी सेनाओं पर पत्थरबाजी होती है तो इन्हें पत्थरबाज भटके हुए बच्चे लगते हैं लेकिन जब अपने बचाव में इन पत्थरबाज़ों पर सेना कोई भी कार्यवाही करती है तो वो इन्हें सेना का अत्याचार दिखाई देता है।

आखिर क्यों हमारे निहत्ते सैनिकों पर हमला करने वाले अब्दुल डार में इन्हें एक आतंकवादी नहीं एक भटका हुआ कश्मीरी दिखाई देता है। भले ही घाटी से पंडितों को खदेड़ दिया गया हो और विरोध में इन्होंने एक शब्द ना बोला हो क्योंकि कश्मीर पर सिर्फ कुछ विशेष कौमों का अधिकार है लेकिन इनका पूरे देश पर अधिकार है। इनका अधिकार है कि भारत सरकार इनकी सुरक्षा करे लेकिन ये भारत की सुरक्षा में कोई योगदान नहीं देंगे। इनका अधिकार है कि जब कोई प्राकृतिक आपदा आए तो भारत सरकार इनकी मदद करे लेकिन जब भारत पर आपदा आए तो इनका कोई दायित्व नहीं। यह इनका अधिकार है कि भारत सरकार जम्मू कश्मीर के पृथक संविधान और ध्वज का सम्मान करें लेकिन भारत के संविधान और ध्वज का अपमान कश्मीर में हो सकता है। यह इनका अधिकार है कि भारत सरकार कश्मीर की संप्रभुता की रक्षा करे लेकिन भारत की संप्रभुता से इन्हें कोई लेना देना नहीं। यह इनका अधिकार है कि एक कश्मीरी भारत में कही भी रह सकता है भारत सरकार उसकी सुरक्षा करे लेकिन पूरे देश की सुरक्षा करने वाले सैनिक खुद भी कश्मीर में सुरक्षित नहीं हैं। क्योंकि इनका मानना है कि इनकी सुरक्षा में सुरक्षा बलों का शहीद हो जाना उनका फ़र्ज़ है और भारत सरकार से अपने लिए सहायता और सुरक्षा लेना इनका अधिकार है। लेकिन जिस सरकार से ये अपने लिए अधिकार मांगते हैं क्या उसके प्रति इनका कोई दायित्व नहीं है? जिस सेना से ये बलिदान मांगते हैं क्या उनके प्रति इनके कोई फ़र्ज़ नहीं है?

इसलिए जरूरत है समय की नजाकत को समझा जाए। देशविरोधियों के चेहरों पर से नकाब हटाए जाएं। अगर 370 और 35A संविधान से हटाना नामुमकिन है तो संविधान में संशोधन करके एक और धारा जोड़ना तो मुमकिन है? तो एक नई धारा जोड़ी जाए कि हर भारतीय की तरह कश्मीर के लिए भी भारत के संविधान ध्वज सेना और संप्रभुता का सम्मान और रक्षा सर्वोपरि होगी और भारत की अखंडता के खिलाफ किसी प्रकार की गतिविधि दंडनीय अपराध होगी। चूंकि कश्मीर भारत का ही अंग है इसलिए कश्मीर का ध्वज अकेले नहीं हमेशा भारत के ध्वज के साथ ही फहराया जाएगा।

(ये लेखिका के निजी विचार हैं।)

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