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नेहरू, महारानी एलिजाबेथ और भारत की राष्ट्रमंडल सदस्यता

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यूनाइटेड किंगडम की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय का निधन हो गया है। आज से लगभग सत्तर साल पहले, 2 जून 1953 को उनका राज्याभिषेक हुआ और इस दिन भारत की राजधानी नई दिल्ली स्थित केंद्रीय सचिवालय की सरकारी इमारत पर भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के साथ-साथ यूनियन जैक फहराया गया था।

Elizabeth II

इस मामले पर हंगामा मचा और 9 सितम्बर 1953 को राज्यसभा के कुछ सदस्यों ने नेहरू सरकार को घेर लिया। सबसे पहले शोइला बाला दास ने केंद्रीय गृह मंत्री से प्रश्न पूछा कि "क्या वे बताएँगे कि इंग्लैंड की महारानी एलिजाबेथ के राज्याभिषेक पर तिरंगे ध्वज के साथ यूनियन जैक फहराने के लिए क्या नियम अपनाए गए थे?"

जवाब केंद्रीय गृह मंत्री के स्थान पर गृह राज्यमंत्री ने दिया। उन्होंने बताया कि भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के साथ यूनियन जैक को केंद्रीय सचिवालय की इमारत पर एलिजाबेथ द्वितीय के राज्याभिषेक के दौरान फहराया गया था। मित्र देश के साथ शिष्टाचार दिखाने और राष्ट्रमंडल देशों की भी अध्यक्ष होने के नाते ऐसा किया गया था।

यह भारत की संप्रभुता और संविधान दोनों का उल्लंघन था। दरअसल, नियमों के अनुसार किसी देश के राष्ट्राध्यक्ष की भारत यात्रा पर उसके सम्मान में उस देश के ध्वज को भारतीय ध्वज के साथ फहराया जा सकता है। मगर किसी देश के महाराजा अथवा महारानी के राज्याभिषेक पर ऐसा करने का कोई प्रावधान न तो पहले कभी था और न आज है।

एलिजाबेथ के राज्याभिषेक से पहले 6 फरवरी 1952 को उनके पिता जॉर्ज VI का निधन हुआ तो भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इसी दिन भारत की संसद में एक वक्तव्य दिया और घोषणा कर बताया कि किंग (राजा) के निधन के चलते संसद की कार्यवाही कल यानि 7 फरवरी को नहीं होगी।

फिर 12 फरवरी को वी. के. कृष्णा मेनन ने राजा के निधन और राष्ट्रमंडल देशों के सन्दर्भ में एक टेलीग्राम लिखा जिसकी एक प्रति प्रधानमंत्री नेहरू को भी भेजी। इस टेलीग्राम में उन्होंने लिखा, "beseeching God, by whom Kings and Queens do reign, to bless the Royal Princess Elizabeth the Second with long and happy years to reign over us." यानि "ईश्वर जिसके माध्यम से राजा और रानी शासन करते हैं, हमारी उनसे प्रार्थना है कि वे शाही राजकुमारी एलिजाबेथ द्वितीय को हम पर कई वर्षों तक एवं खुशहाली से शासन करने का आशीर्वाद दें। "हालाँकि, प्रधानमंत्री अपने मित्र के इस टेलीग्राम से संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने उसका जवाब यह कहते हुए दिया कि "इससे भारत में न सिर्फ झगडे होंगे बल्कि हमारी आलोचना भी होगी।" मगर कृष्णा मेनन के उस टेलीग्राम से एक प्रश्न जरुर खड़ा होता है कि भारत राष्ट्रमंडल देशों का सदस्य बना, जिसके अध्यक्ष यूनाइटेड किंगडम के महाराजा अथवा महारानी होते हैं, तो उसका स्वतंत्र भारत पर शासन से क्या लेना देना था, जिसकी वकालत मेनन वर्ष 1952 में कर रहे थे।

इस सवाल का जवाब ढूढने के लिए 1949 के उस दौर में जाना होगा जब भारत के इंग्लैंड में उच्चायुक्त वी. के. कृष्णा मेनन हुआ करते थे। उन पर भारतीय उच्चायोग में फालतू एवं अनावश्यक खर्चों की शिकायतों के कई आरोप लगे हुए थे और सबिमल दत्त नाम के एक अधिकारी को जाँच के लिए भारत से लंदन भेजा गया था। इन्ही मेनन की मध्यस्थता में भारत को राष्ट्रमंडल देशों का सदस्य बनाया गया था।

अब समझने की जरुरत है कि आखिर इस राष्ट्रमंडल का स्वरुप क्या था और क्या भारत को इसका सदस्य बनने के लिए किसी प्रकार की कोई अनिवार्यता थी? इसका जवाब है कि राष्ट्रमंडल पूर्णतः औपनिवेशिक अथवा ब्रिटिश गुलामी का एक नया तरीका था और भारत को इसका सदस्य बनने की कोई अनिवार्य शर्त नहीं थी लेकिन मेनन की जिद्द ने भारत को इसका सदस्य बनवाया।

19 मार्च 1949 को भारत के विदेश मंत्रालय की स्टैंडिंग कमेटी ने एक बैठक बुलाई जिसकी फाइल संख्या 46-70/49-BC1(B) है और इसकी प्रति भारत के राष्ट्रीय अभिलेखागार में उपलब्ध है। इस बैठक में भारत के राष्ट्रमंडल सदस्य बनने पर चर्चा की गयी थी। इसके अनुसार, "भारत जल्दी ही एक गणतंत्र देश बन जायेगा लेकिन अन्य राष्ट्रमंडल देशों को लगता है कि जिस आधार पर भारत राष्ट्रमंडल का सदस्य बनेगा तो वह अपना गणतांत्रिक दर्जा कैसे रखेगा। राष्ट्रमंडल में यूनाइटेड किंगडम के किंग को प्रथम नागरिक का दर्जा दिया जाता है। सवाल यही उठता है कि किंग को कैसे भारत का प्रथम नागरिक माना जाये जबकि सामान्य तौर पर यह हक गणतंत्र के राष्ट्रपति के पास होगा।"
यूनाइटेड किंगडम के प्रधानमंत्री एटली ने भी 20 मार्च 1949 को एक पत्र लिखकर नेहरू को स्पष्ट कर दिया था कि भारतीय संविधान में यूके के महाराजा को पदासीन करना चाहिए। इसलिए 21 अप्रैल 1949 को राष्ट्रमंडल के सन्दर्भ में एक बैठक लन्दन में रखी गयी जिसमें प्रधानमंत्री नेहरू को भी आमंत्रित किया गया। वे हमेशा की तरह वहां जाने के लिए हद्द से ज्यादा उत्सुक भी थे।
प्रधानमंत्री नेहरू इस बात से अंजान नहीं थे कि उनकी लन्दन यात्रा में उन पर यूनाइटेड किंगडम के महाराजा को भारतीय संविधान में शामिल करने का दवाब बनाया जायेगा। उन्हें इस बात का पूरा आभास था कि भारत की जनता इस प्रस्ताव को सिरे से ख़ारिज कर देगी और उसे किसी भी स्थिति में पारित नहीं होने देगी। अतः उन्होंने 26 मार्च 1949 को सरदार पटेल को एक पत्र लिखकर कहा, "अगर यूनाइटेड किंगडम के प्रधानमंत्री का यही दृष्टिकोण बना रहा तो मुझे नहीं पता कि लन्दन में क्या बातचीत होगी।"
एक प्रकार से यह पूरा मसला भारत को एक गणतांत्रिक देश बनने से रोकने के लिए था। यूनाइटेड किंगडम को लगता था कि वे प्रधानमंत्री नेहरू को इस सन्दर्भ में मना लेंगे इसलिए उन्होंने गॉर्डोन वॉकर नाम का एक विशेष प्रतिनिधि भारत भेजा हुआ था। इन दोनों की कई बार बातचीत हुई लेकिन सौभाग्य से प्रधानमंत्री नेहरू जनता की नाराजगी के डर से इस षड्यंत्र का शिकार नहीं बने। उन्होंने हिम्मत जुटाई और 1 अप्रैल 1949 को प्रधानमंत्री एटली को पत्र लिखकर बताया कि "मैं मानता हूँ कि वंशानुगत राजत्व संविधान को एक निश्चित स्थिरता प्रदान करता है। लेकिन आपको यह बात भी समझनी होगी कि जिस रहस्य का आप उल्लेख कर रहे हैं वह वर्तमान स्थिति में भारत पर शायद ही लागू होगा।"

प्रधानमंत्री नेहरू अगर चाहते तो यहाँ अपनी प्रस्तावित लन्दन यात्रा को स्थगित कर सकते थे क्योंकि इसकी अभी कोई जरुरत नहीं थी। भारत उस दौरान पहले से कई तरह की समस्याओं जैसे सांप्रदायिक विभाजन, विस्थापितों के पुनर्वास, और कश्मीर में जंग के साथ-साथ संवैधानिक समस्याओं से गुजर रहा था। मगर नेहरू का अधिकतर समय राष्ट्रमंडल जैसे मुद्दों पर व्यतीत हो रहा था। इसके अलावा वे भारत की स्थिति से यूनाइटेड किंगडम को अवगत करा चुके थे।

इसी बीच नेहरू को एडविना का एक पत्र मिला जिसमें लिखा था कि वो और डिक्की (लुई माउंटबेटन) भी 20 अप्रैल को लन्दन पहुँच रहे है। गौर करने वाली बात यह है कि नेहरू भी इसी दिन लन्दन पहुँच रहे थे। इस प्रकार नेहरू को लन्दन जाने का एक ठोस कारण भी मिल गया।

उधर भारतीय समाचारपत्रों में भी इस बात को लेकर चर्चाएँ चल रही थी कि भारत एक गणतंत्र होते हुए कैसे राष्ट्रमंडल का हिस्सा बनेगा। 24 अप्रैल 1949 को शंकर्स वीकली में एक कार्टून प्रकाशित हुआ जिसमें नेहरू और एटली दोनों ब्रिटिश क्राउन के पीछे लुकाछिपी करते दिखाई दे रहे थे। यह कार्टून उस दौर के जनमानस की भावना को दर्शाता है कि कैसे नेहरू के दिमाग से ब्रिटिश क्राउन के आसपास बने रहने का आकर्षण जाने का नाम नहीं ले रहा था।

खैर, नेहरू अपने तय कार्यक्रम के अनुसार लन्दन पहुंचे। कुछ दिनों तक चली बैठकों के बाद, 28 अप्रैल 1949 को 'लन्दन घोषणा' की गयी जिसके अंतर्गत भारत एक गणराज्य होते हुए भी राष्ट्रमंडल का सदस्य बना। साथ ही इसका नाम ब्रिटिश राष्ट्रमंडल का नाम बदलकर राष्ट्रों का राष्ट्रमंडल किया गया। इसी के साथ यह बैठक भी समाप्त हो गयी लेकिन प्रधानमंत्री नेहरू 6 मई तक वहीं रुके रहे। इतने दिनों तक बिना किसी अधिकारिक कार्य के वहां रुकने का औचित्य समझ से बाहर है।
16 मई को प्रधानमंत्री नेहरू ने संविधान सभा के समक्ष राष्ट्रमंडल की सदस्यता सम्बन्धी निर्णय के अनुसमर्थन के बारे में एक प्रस्ताव पेश किया। वैसे तो संविधान सभा का इससे कोई लेना देना नहीं था फिर भी इस प्रस्ताव पर संविधान सभा ने दो दिनों तक चर्चा की। नेहरू कई सदस्यों को यह समझाने में विफल रहे कि भारत ने राष्ट्रमंडल की सदस्यता क्यों ली। शिब्बनलाल सक्सेना ने तो यहाँ तक कहा कि प्रधानमंत्री पहली बार किसी मुद्दे पर सदस्यों से राय ले रहे है जबकि वे अधिकतर मसलों पर किसी से मशविरा नहीं करते है। विरोध करने वालों में दामोदर स्वरुप सेठ और लक्ष्मीनारायण साहू भी थे। आखिर में ध्वनि मत से इस प्रस्ताव को स्वीकार किया गया।

मौलाना हसरत मोहनी ने सविधान सभा के अध्यक्ष से प्रश्न किया कि इस प्रस्ताव के पक्ष और विपक्ष में कौन लोग है इसके लिए मत विभाजन करना चाहिए। उनके बार-बार आग्रह के बावजूद भी सभापति ने मत विभाजन की अनुमति नहीं दी।
जब 1952 में जॉर्ज की मृत्यु हुई और एलिजाबेथ को गद्दी मिली तो फिर एक बार भारत में राष्ट्रमंडल की सदस्यता को लेकर प्रश्न खड़े होने शुरू हो गए। यह प्रश्न इसलिए भी खड़े हुए क्योंकि भारत में उस दौरान केंद्र सरकार के इशारे पर यूनियन जैक फहराया गया और एलिजाबेथ को 'भारत की शासक' कहकर संबोधित किया जा रहा था। ढाई साल के इस अंतराल में नेहरू को फिर से 18 फरवरी 1952 को देश के सभी मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखकर राष्ट्रमंडल की सदस्यता सम्बन्धी अपने निर्णय को उचित बताने की जरुरत पड़ गयी।

फिर 26 फरवरी 1960 को एक बार फिर लोकसभा में बहस छिड़ी कि भारत को राष्ट्रमंडल से बाहर निकल जाना चाहिए। फिरोजाबाद से निर्वाचित हुए समाजवादी नेता ब्रजराज सिंह ने इस प्रस्ताव को सदन के पटल पर रखा। उन्होंने तर्क दिया, "न सिर्फ दिल्ली में संसद भवन के आसपास बल्कि देश के और भागों में अभी भी ब्रिटिश साम्राज्यवादियों की मूर्तियाँ लगी हुई है और उनको हम हटा नहीं पाए है। जब भी इस सम्बन्ध में बात कही जाती है तो कहा जाता है कि हम राष्ट्रमंडल में है, इससे उनको बुरा लग सकता है। अगर बुरा लग सकता है तो लगे, लेकिन हम अपने राष्ट्रीय सम्मान के खिलाफ कोई बात न करें।"

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नेहरू के विरोध के कारण ब्रजराज सिंह का प्रस्ताव पारित न हो सका लेकिन एक बात जरुर समझने वाली है कि भारत को राष्ट्रमंडल देशों का हिस्सा होते हुए भी कभी अपने सम्मान के साथ समझौते नहीं करने चाहिए थे। यह ठीक है कि प्रधानमंत्री नेहरू ने भारतीय आकांक्षाओं को ध्यान में रखा और राष्ट्रमंडल में शामिल होने के लिए भारतीय संविधान में यूनाइटेड किंगडम के महाराजा अथवा महारानी को शामिल नहीं किया। मगर उन्होंने राष्ट्रमंडल अध्यक्ष के रूप में एक राजा/रानी को अपनी स्वीकृति दी जबकि वे इसका विरोध कर सकते थे। इसके अलवा, एलिजाबेथ कही नाराज न हो जाये इसलिए गुलामी और औपनिवेशिकता के प्रतीक चिह्नों एवं मानसिकता को समाप्त करने में भी वे एकदम विफल रहे।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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English summary
pt nehru queen elizabeth and india in commonwealth
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