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Agenda for Opposition: मोदी गए विदेश, चर्चा के लिए अपना एजेंडा छोड़ गए

कुछ दिन पहले जनता की निगाहें राहुल गांधी के अमेरिका दौरे पर लगी हुई थी। अब कुछ दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अमेरिका दौरे पर देश की निगाह लगी होगी।

जब राहुल गांधी अमेरिका दौरे पर थे, तो उनकी हर गतिविधि में से भारत को अपमानित करने वाली टिप्पणी ढूंढ कर भारतीय जनता पार्टी कांग्रेस पर हमले कर रही थी। उनकी दो तीन टिप्पणियाँ तो ऐसी हो गई थीं कि केन्द्रीय मंत्रियों ने भी हमलावर रूख अपनाया। उनकी मीटिगों में पाकिस्तान परस्तों और खालिस्तान समर्थकों की मौजूदगी ने कांग्रेस को असहज किया।

pm Modi went abroad, left his agenda for discussion

राहुल गांधी का दौरा खत्म होने के बाद उनकी अमेरिकी अधिकारियों और खासकर व्हाईट हाउस में हुई तथाकथित मुलाक़ात की खबर ने सब को चौंकाया था। कांग्रेस या राहुल गांधी की तरफ से इन मुलाकातों का न तो खंडन किया गया है, न पुष्टि। अब जब नरेंद्र मोदी अमेरिका के दौरे पर हैं, तो विपक्ष की भी उनकी हर गतिविधि पर निगाह होगी। कुल मिलाकर देश की राजनीति को प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेताओं के विदेशी दौरे भी काफी प्रभावित करने लगे हैं।

कांग्रेस को यह बात भी पच नहीं रही कि जवाहर लाल नेहरू को 17 साल प्रधानमंत्री रहने, इंदिरा गांधी को 15 साल प्रधानमंत्री रहने और मनमोहन सिंह को दस साल प्रधानमंत्री रहने पर पर भी जो सम्मान नहीं मिला, मोदी को वह सम्मान उनके नौंवे साल में ही मिल गया। भारत के लिए यह गौरवशाली घटना है उसके प्रधानमंत्री को दूसरी बार अमेरिकन कांग्रेस को संबोधित करने का मौक़ा मिल रहा है।

pm Modi went abroad, left his agenda for discussion

22 जून की सुबह व्हाइट हाउस के साउथ लॉन में 21 तोपों की सलामी के साथ भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आधिकारिक स्वागत किया जाएगा। इसे देखने के लिए 7,000 से ज्यादा भारतीय अमेरिकी नागरिकों ने आमंत्रण हासिल किया है। 22 जून की दोपहर को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अमेरिकी कांग्रेस के संयुक्त सत्र को संबोधित करेंगे, जिसमें अमेरिका के हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव (भारत के मुताबिक लोकसभा) और सीनेट (जैसे भारत में राज्यसभा) के सदस्य शामिल होंगे।

इस घटना ने उन्हें भारत में अनपढ़ कहने वाले उनके राजनीतिक विरोधियों को भी जवाब दे दिया है। वैसे तो प्रधानमंत्री बनने के बाद उनकी यह आठवीं अमेरिका यात्रा है, लेकिन यह पहली राजकीय यात्रा है। अमेरिका किसी देश के प्रधानमंत्री को बहुत कम ही राजकीय यात्रा पर बुलाता है। जबसे मोदी प्रधानमंत्री बने हैं, वह अपनी हर विदेश यात्रा में वहां रह रहे भारतीयों के साथ एक सार्वजनिक कार्यक्रम जरुर करते हैं, जिसकी भारत में भी चर्चा होती है। इससे पहले जितने भी प्रधानमंत्री हुए, उनके विदेश दौरों की खबरें सिर्फ विदेश नीति से संबंधित मुद्दों पर ही बनती थीं। लेकिन नरेंद्र मोदी ने अपने विदेश दौरों से भी भारतीय वोटरों को संबोधित करना शुरू कर दिया है।

प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस को लगता है कि मोदी अपने विदेश दौरों से भारतीय जनता को ज्यादा प्रभावित करते हैं, इसलिए राहुल गांधी ने भी साल में दो-तीन विदेश दौरे करने शुरू किए, जिनमें वह विभिन्न गोष्ठियों में भारत के लोकतंत्र और मोदी सरकार की नीतियों पर हमलावर रूख अपना कर न्यूट्रल वोटरों को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं। मोदी के अमेरिका दौरे से ठीक पहले राहुल गांधी ने वहां का दौरा करके उनकी छवि खराब करने की कोशिश की।

अब नरेंद्र मोदी भी अमेरिका रवाना होने से पहले विपक्ष को उनका एजेंडा थमा गए हैं, ताकि वे उनके 25 जून को लौटने तक उसी में उलझे रहे और इस बीच देश की जनता उनके अमेरिका और मिस्र दौरे की गतिविधियों को देखती रहे। 25 जून वह तारीख है जब इंदिरा गांधी ने देश पर आपातकाल लागू करके लोकतंत्र को बंधक बना दिया था। मोदी जब तक लौटेंगे, उससे पहले 23 जून को विपक्षी दलों की बैठक हो चुकी होगी, इसलिए वह बैठक के लिए भी विपक्षी दलों को एक मुद्दा सौंप गए हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिका रवाना होने से पहले तीन बड़े काम किए हैं, जो उनके कोर हिन्दू वोटबैंक को प्रभावित करने वाले वाले हैं। हालांकि मिस्र में वह 11वीं सदी की मशहूर अल-हाकिम मस्जिद भी जाएंगे, जिसका 1980 में पुनर्निर्माण किया गया था। लेकिन यह मस्जिद दाउदी बोहरा मुसलमानों की है,जिनकी राजस्थान, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात में काफी आबादी है। यानि राजस्थान, मध्यप्रदेश विधानसभा चुनावों से पहले मोदी इन दोनों राज्यों के बोहरा मुसलमानों को मिस्र की धरती से संबोधित करेंगे।

मोदी की यही बातें, विपक्ष को परेशानी में डाल देती हैं। भारत से रवाना होते हुए वह जो तीन मुद्दे चर्चा के लिए छोड़ गए, वे तीनों भी अपने वोट बैंक को प्रभावित करने वाले मुद्दे हैं। हवाई जहाज पर बैठने से ठीक पहले उन्होंने जगन्नाथ रथ यात्रा के अपने शुभकामना संदेश के साथ ट्विटर पर एक वीडियो शेयर किया है, जिसमें वह खुद भगवान जगन्नाथ के रथ को खींच रहे हैं। भगवान जगन्नाथ का रथ खींचते हुए मोदी का यह वीडियो हिन्दू वोट बैंक को और पक्का करेगा, जिससे स्वाभाविक है कि मोदी विरोधियों को परेशानी होगी। राहुल गांधी के पास अपनी भारत जोड़ो यात्रा के अलावा ऐसा कोई वीडियो नहीं। सोशल मीडिया पर उसी तरह की प्रतिक्रियाएं भी आनी शुरू हो गई हैं।

दूसरा काम नरेंद्र मोदी ने यह किया कि अमेरिका जाने से एक दिन पहले गीता प्रेस, गोरखपुर को गांधी शान्ति पुरस्कार की घोषणा कर गए। देश भर के हिन्दू उनके इस पुण्य कार्य से प्रफुल्लित हो गए, क्योंकि वह गीता प्रेस, गोरखपुर ही है, जिसने पिछले सौ साल में हर हिन्दू घर में गीता और हिन्दू पंचांग बताने वाली पत्रिका कल्याण पहुचाने का काम किया। पहले एक हजार साल तक क्रूर मुगलों के राज में हिन्दुओं के घरों में हिन्दू धर्म ग्रन्थ रखना ही गुनाह हो गया था। मुगल राज में तलवार की नोक पर हिन्दुओं को मुसलमान बनाया गया, और बाद में ब्रिटिश राज में भी हिन्दू देवी देवताओं का अपमान करते हुए ईसाई धर्म का प्रचार प्रसार होता रहा।

आज़ादी के बाद भी मुसलमानों और ईसाईयों को हिंदुओं की आस्था का उपहास उड़ाते और उनके धर्मांतरण करवाने की खुली छूट जारी रही है, लेकिन घर वापसी गुनाह बताया जाता है। अभी मध्य प्रदेश का एक किस्सा सामने आया है, किस तरह एक हिन्दू युवक को छह मुस्लिम लड़कों ने गले में कुत्ते का पट्टा बाँध कर यह कर घुमाया कि तुम हिन्दू इसी लायक हो, मुसलमान बनो या कुत्ते की जिन्दगी जियो। इस शर्मनाक घटना का वीडियो भी बनाया गया। एक महीने बाद जब यह वीडियो वायरल हो गया तो मध्यप्रदेश सरकार ने उन सभी अपराधियों की गिरफ्तारी के बाद उनके अवैध निर्मित घरों पर बुलडोजर भी चला दिया गया।

यह घटना इसके बावजूद हुई है कि मध्यप्रदेश सरकार ने 2021 में गलत बयानी, प्रलोभन, बल की धमकी के इस्तेमाल, अनुचित प्रभाव, जबरदस्ती, विवाह या किसी अन्य धोखाधड़ी के माध्यम से धर्मांतरण पर रोक लगाने का क़ानून पास किया था, इसी तरह का एक क़ानून कर्नाटक की भाजपा सरकार ने भी पास किया था, जिसे कांग्रेस ने वापस लेने का वादा किया हुआ है।

कांग्रेस और अन्य कई विपक्षी दलों ने गीता प्रेस, गोरखपुर को गांधी शान्ति पुरस्कार दिए जाने का कड़ा विरोध किया है। कांग्रेस का आरोप यह है कि गीता प्रेस गोरखपुर भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने की वकालत करती है, और हिंदुत्व का प्रचार प्रसार करने का काम करती है। कांग्रेस के महासचिव जयराम रमेश ने अपने ट्विट में कहा है कि गीता प्रेस को सम्मान देना गोडसे और सावरकर को सम्मानित करने जैसा है। अपने ट्विट के साथ उन्होंने गीता प्रेस पर लिखी गई अक्षय मुकुल की किताब का चित्र भी लगाया है, जिसका शीर्षक ही है-" गीता प्रेस, एंड दि मेकिंग आफ हिन्दू इंडिया" जिसमें दो विवादास्पद लेख नेहरूवादी इतिहासकार रामचन्द्र गुहा और विवादास्पद लेखिका अरुंधती राय के भी हैं।

इन्हीं चेप्टर में कहा गया है कि गीता प्रेस का महात्मा गांधी के साथ धार्मिक, राजनीतिक और समाजिक विषयों पर हमेशा टकराव रहा। अब जब कांग्रेस कोई बात कहती है, तो आज का युवा तुरंत इंटरनेट पर सही सूचना जानने की कोशिश करता है, अब वह जमाना नहीं रहा जब सूचनाएं कुछ लोगों तक सीमित थी। जब युवा पीढ़ी इतिहास पढ़ती है, तो वह पाती है कि गीता प्रेस और गांधी का टकराव स्वाभाविक ही था, क्योंकि गीता प्रेस हिन्दुत्व का प्रचार प्रसार कर रहा थी, जबकि महात्मा गांधी ने इस्लामिक शासन की पैरवी करने वाले खिलाफत आन्दोलन का समर्थन किया था। इस आन्दोलन की परिणीति मोपला नरसंहार से हुई थी, जिसमें 10 हजार हिन्दुओं का कत्ल किया गया और ढाई हजार हिन्दुओं का जबरन धर्म परिवर्तन करवाया गया था। गीता प्रेस को पुरस्कार का विरोध करके कांग्रेस ने खुद युवा पीढ़ी को गढ़े मुर्दे उखाड़ने का मौक़ा दे दिया।

मोदी विपक्ष के लिए तीसरा काम समान नागरिक संहिता के खिलाफ वातावरण बनाने का छोड़ गए हैं। मुस्लिम स्कॉलरों के धड़ाधड़ बयान आने शरू हो गए हैं कि उन्हें इस्लामिक शरिया का कानून चाहिए, उन्हें समान नागरिक सहिंता कतई कबूल नहीं। विवादास्पद मुस्लिम स्कॉलर अशरद मदनी का बयान आ गया है कि समान नागरिक सहिंता साम्प्रदायिकता है। उन्होंने कहा है कि हिन्दू साम्प्रदायिक ताकतें मुस्लिमों के 1300 साल पुराने कायदों और कानूनों को बदलने की साजिश रच रहीं हैं।

शायद मदनी और अन्य मुस्लिम स्कॉलर भारत को इस्लामिक राष्ट्र समझते हैं, इसलिए वे 1300 साल पुराने इस्लामिक क़ानून कायदे की बात कर रहे हैं। जबकि कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल तो भारतीय संविधान को ही भारत का कानून कायदा मानते हैं। । कांग्रेस कम से कम इस तर्क के साथ तो समान नागरिक संहिता का विरोध नहीं कर सकती, क्योंकि कांग्रेस संविधान निर्माताओं को सांप्रदायिक तो नहीं कह सकती, जिन्होंने समान नागरिक संहिता को संविधान के अनुच्छेद 44 में रखा था।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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