पाकिस्तानी गुप्तचर एजेंसी का मकड़जाल और भारत के इस्लामी संस्थान
इन दिनों समाचारपत्रों में एक पाकिस्तानी पत्रकार नुसरत मिर्जा द्वारा भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी से मित्रता के दावे और भारत से गुप्त जानकारी लेकर पाकिस्तान की गुप्तचर एजेंसी को देने की चर्चा गरम है। इस पाकिस्तानी पत्रकार ने दावा किया है कि हामिद अंसारी के आमंत्रण पर भारत यात्रा में उसे अनेक गुप्त और संवेदनशील मामलों की जानकारी मिली थी जिसे उसने पाक्स्तिानी गुप्तचर एजेंसी इंटर सर्विसेस इंटेलिजेंस (आईएसआई) तक पहुंचाया।

देश में इस दावे पर हंगामा हो रहा है लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि देश की अनेक मुस्लिम संस्थाओं के साथ पाकिस्तानी गुप्तचर एजेंसी के तार जुड़े हुए पाए गए हैं। पाकिस्तान से इन भारतीय इस्लामी संस्थाओं के रिश्तों के ऐतिहासिक कारण हैं। देश के विभाजन के बाद भारत में सक्रिय इस्लामी संगठनों से संबंधित जो लोग पाकिस्तान चले गए उन्होंने वहां पर अपनी संस्थाएं स्थापित कर लीं। लेकिन उनके संबंध अपनी मूल संस्थाओं से पूर्णतः जुड़े रहे। इन संबंधों का पाकिस्तानी गुप्तचर एजेंसियों ने पूरा-पूरा लाभ उठाया और उनके सहारे भारत में जासूसी का मकड़जाल फैलाने में लगी रही।
जमीयत उलेमा इस्लामी विद्वानों का एक पुराना संगठन है, जिसकी स्थापना 1920 के खिलाफत आंदोलन के दौरान की गई थी। यह संगठन वहाबी विचारधारा से प्रभावित है और इसके द्वारा बहुचर्चित दारूल उलूम देवबंद का संचालन किया जाता है, जो कि इस्लामी जगत में इस्लामी शिक्षा का दूसरा सबसे बड़ा केंद्र है। देश के विभाजन के बाद देवबंदियों का एक वर्ग, जिसके प्रमुख मौलाना फजलुर रहमान आदि थे, पाकिस्तान चला गया और वहां पर जमीयत उलेमा पाकिस्तान नामक एक संगठन बना दिया। इस पाकिस्तानी संगठन से जुड़े हुए मुस्लिम विद्वान देवबंद के लगातार चक्कर काटते रहे हैं और देवबंद के संचालक उन्हें मेहमान का दर्जा देते रहे हैं।
दारूल उलूम देवबंद इस बात से इंकार करता रहा है कि उसका इस्लामिक आतंकवाद से कोई रिश्ता नहीं है, मगर यह कड़वी हकीकत है कि देश के विभिन्न हिस्सों में गत एक दशक में जो लोग पाकिस्तान के लिए जासूसी करने के आरोप में पकड़े गए उनमें से 152 के संबंध किसी न किसी रूप में इस संगठन से जुड़े हुए पाए गए। सबसे रोचक बात यह है कि जमीयत उलेमा खुलेआम इन पाकिस्तानी जासूसों और आतंकवादियों का समर्थन करती रही है। इस गंभीर आरोप में जो लोग पकड़े जाते हैं जमीयत उलेमा द्वारा स्थापित डिफेंस कमेटी न सिर्फ उन्हें कानूनी सहायता प्रदान करती है बल्कि उनके परिवारजनों को नियमित रूप से मासिक आर्थिक सहायता भी देती है। इस कमेटी के संयोजक गुलजार आजमी का दावा है कि अब तक वे आतंकवाद और जासूसी के आरोपों में पकडे गए 252 मुसलमानों को कानूनी और आर्थिक सहायता दे चुके हैं।
इस बात से भी कोई इंकार नहीं कर सकता कि देश के विभिन्न राजनीतिक दल गत कई दशकों से मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति का अनुसरण कर रहे हैं। इस संदर्भ में 26 सितंबर 1994 में लखनऊ के दारूल उलूम नदवा के होस्टल पर केंद्रीय गुप्तचर ब्यूरो के छापे के घटनाक्रम का उल्लेख करना जरूरी है। मीडिया के अनुसार केंद्रीय गुप्तचर ब्यूरो को इस बात की जानकारी मिली थी कि आईएसआई से जुड़े हुए कुछ कश्मीरी आतंकवादी इस इस्लामिक शिक्षा संस्थान में डेरा डाले हुए हैं। इस पर केंद्रीय गुप्तचर ब्यूरो के अधिकारियों ने उत्तर प्रदेश पुलिस के सहयोग से दारूल उलूम नदवा के अतहर छात्रावास के कमरा नंबर 20 पर छापा मारा। कहा जाता है कि पुलिस को इस होस्टल के गेट पर काफी देर तक रोके रखा गया। इसी दौरान आतंकवादियों को एक पिछले दरवाजे से भगा दिया गया। पुलिस ने इस कमरे और आसपास के कमरों से कुछ विद्यार्थियों को गिरफ्तार कर लिया। उन्होंने इस बात की पुष्टि की थी कि इस कमरे में जो कश्मीरी छात्र रह रहे थे वे पुलिस छापे से कुछ समय पूर्व वहां से भाग गए थे।
इस संदर्भ में यह उल्लेखनीय है कि दारूल उलूम नदवा की स्थापना 1898 में की गई थी और यह इस्लामिक जगत का पांचवां सबसे बड़ा धार्मिक शिक्षा संस्थान है। उन दिनों दारुल उलूम नदवा के प्रमुख मौलाना सैयद अब्दुल हसन नदवी थे, जिन्हें अली मियां कहा जाता था। जब इस शिक्षा संस्थान पर छापे की खबर मीडिया में छपी तो अरब जगत और समूचे देश के मुसलमानों में बवाल मच गया। अली मियां के मुस्लिम देशों के साथ गहरे रिश्ते थे जिसे उन्होंने खूब भुनाया।
देश और विदेश के दबाव के कारण तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव को वरिष्ठ मुस्लिम नेता और तत्कालीन रेलवे मंत्री जाफर शरीफ को अली मियां से व्यक्तिगत रूप से माफी मांगने के लिए लखनऊ भेजना पड़ा। छापे मारने वाले जांच ब्यूरो के सभी अधिकारी निलंबित कर दिए गए। उन दिनों उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी सत्तारूढ़ थी। मुलायम सिंह यादव ने व्यक्तिगत रूप से अली मियां से माफी मांगी और इस छापे के कारण छात्रावास को जो क्षति पहुंची थी, उसके मुआवजे के तौर पर दो लाख रुपये का भुगतान सरकारी खजाने से किया गया। जिन छात्रों को पुलिस ने हिरासत में लिया था उन्हें 50-50 हजार रुपये मुआवजा भी प्रदान किया गया और छापा मारने वाले सभी पुलिस अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया।
इस संदर्भ में हैदराबाद के इस्लामिक संगठन दीनदार अंजुमन के मामले का जिक्र करना भी जरूरी है। इसकी स्थापना 1928 में की गई थी। हैदराबाद के भारत में विलय के बाद इसके प्रमुख मोहम्मद सादिक भागकर पाकिस्तान चले गए थे और वे पाकिस्तान के मर्दान नगर में अपना एक अलग संगठन चला रहे थे। मगर वे नियमित रूप से भारत में चक्कर लगाया करते थे।
1997 से लेकर वर्ष 2000 के दौरान आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और गोवा की 35 मस्जिदों, मंदिरों और गिरजाघरों में विस्फोट हुए। कहा जाता है कि ये विस्फोट आईएसआई के इशारे पर हुए थे और इनका लक्ष्य भारत में सांप्रदायिक दंगे भड़काना था। गुप्तचर ब्यूरो को इस बात का सुराग नहीं मिल रहा था कि इन धमाकों के पीछे किसका हाथ है। इसी दौर में हैदराबाद से विस्फोटक सामग्री ले जा रही एक मारूती वैन में विस्फोट हुआ। जब इस मामले की जांच हुई तो इसके तार दीनदार अंजुमन से जुड़े पाए गए। इस पर इस गिरोह से जुड़े हुए 45 व्यक्तियों को गिरफ्तार किया गया। जबकि दीनदार अंजुमन के प्रमुख सादिक पाकिस्तान फरार होने में सफल हो गए। इस आतंकवादी संगठन पर भारत सरकार को प्रतिबंध लगाना पड़ा और इससे जुड़े हुए 335 सरकारी कर्मचारियों को नौकरी से बर्खास्त किया गया।
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(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)
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