Nawaz Sharif: वतन वापसी में नवाज शरीफ के सामने दोहरी चुनौती

Nawaz Sharif: नवाज शरीफ 21 अक्टूबर को वापस पाकिस्तान आ रहे हैं। उनकी यह वतन वापसी लगभग 4 वर्ष बाद हो रही है। नवंबर 2019 में कोर्ट के आदेश पर वह इलाज कराने लंदन गए थे। उसके पहले वह एवन फील्ड और अल अजिजिया मामले में दोषी करार दिए जाने के बाद सात साल की सजा भुगतने के लिए जेल में थे। लंदन जाने से पहले वह लगभग एक साल जेल में रहे, जहां उनकी हालत खराब बतायी गई और उसी के आधार पर उन्हें लंदन जाने दिया गया। अब सिर्फ एक सवाल लोगों के जेहन में है कि क्या उनकी वतन वापसी सत्ता में भी उनकी वापसी की गारंटी होगी या उन्हें फिर से जेल में डाल दिया जाएगा?

जेल में इसलिए कि अभी उनकी पहचान एक फरार मुजरिम की है। समय पर कोर्ट में ना पेश होने के कारण अदालत ने उन्हें फरार घोषित कर रखा है। पाकिस्तान में जो इस समय हालात हैं उसमें नहीं लगता कि उन्हें तत्काल जेल भेजा जाएगा, क्योंकि उनकी वापसी ही तभी कराई गई है, जब उनकी पार्टी नेताओं को यह यकीन हो गया कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट से कोई ना कोई राहत मिल ही जाएगी। इसके लिए उनकी लीगल टीम तैयारी कर रही है। हालांकि नवाज की पार्टी को छोड़कर इन दिनों पाकिस्तान कीं हर पार्टी के नेता यह कह रहे हैं कि पूर्व प्रधानमंत्री एक डील के तहत आ रहे हैं। यहां तक कि हाल तक सत्ता में साथ रही पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के नेता भी यही कह रहे हैं।

pakistan: Double challenge before Nawaz Sharif in returning home

डील पर यकीन करने के पर्याप्त कारण भी हैं। पहला यह कि नवाज शरीफ की वतन वापसी के खिलाफ पाकिस्तान की फौज नहीं है। अलबत्ता वापसी के पहले आर्मी चीफ ने यह संदेश जरूर उनके भाई शहबाज शरीफ के जरिए ही लंदन भिजवा दिया था कि नवाज शरीफ को सिर्फ उसी सूरत में तकलीफ हो सकती है, जब वह अपनी तकरीरों और बयानों में आर्मी को निशाना बनाएंगे, चाहे वह पूर्व आर्मी चीफ जनरल कमर जावेद बाजवा के खिलाफ ही क्यों ना हो।

पाकिस्तान की आर्मी की एक खास बात है कि वह कभी वर्तमान या पूव सैन्य अधिकारियों के खिलाफ कोई आवाज नहीं सुन सकती। जिस किसी राजनीतिक नेता या पत्रकार ने आर्मी के खिलाफ आवाज उठाई या तो वह जान से गया या अपने परिवार से गया। पिछले दिनों कई पत्रकार और नेता इसका स्वाद चख चुके हैं।

नवाज शरीफ को यकीन है कि उनके खिलाफ कुछ नहीं होगा तभी वह आते ही लाहौर के मीनार ए पाकिस्तान में जलसे का आयोजन करा रहे हैं। मीनार ए पाकिस्तान लाहौर की वह जगह है, जहां 23 मार्च 1940 को ऑल इंडिया मुस्लिम लीग ने अलग मुस्लिम देश के लिए प्रस्ताव पास कराया था। उसे लाहौर डिक्लयेरेशन भी कहते हैं। बाद में 1960 से 68 के दौरान यहां एक 70 मीटर उंची मीनार खड़ी की गई और तब से इसका नाम मीनार ए पाकिस्तान पड़ गया। यहां बहुत बड़ा मैदान है जिसमें डेढ से दो लाख लोग जमा हो सकते हैं। पाकिस्तान का कोई भी राजनेता जब ऐतिहासिक रैली की बात करता है तो यहीं आता है। बेनजीर भुट्टो और इमरान खान भी यहां जलसा कर चुके हैं।

लेकिन नवाज शरीफ का यकीन अपनी जगह है, कानूनी पहलू अपनी जगह है। नवाज शरीफ को सुप्रीम कोर्ट ने ही 28 जुलाई 2017 को पनामा केस में कसूरवार मानते हुए आजीवन चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहरा दिया था। तब इस फैसले को सुनाने वाली सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय पीठ में जस्टिस उमर अता बांदियाल भी थे, जो पिछले 17 सिंतबर को पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस पद से रिटायर हुए हैं। यह पाकिस्तान जैसे देश में ही संभव है कि सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस के रूप में बांदियाल अपने रिटायरमेंट से पहले चुनाव कराने का आदेश दे चुके थे, जिसे शहबाज शरीफ की सरकार बड़ी मुश्किल से टालने में सफल हुई थी।

नवाज शरीफ की वतन वापसी में देरी और इसकी तिथि 21 अक्टूबर को करने के पीछे एक बड़ी वजह जस्टिस बांदियाल भी थे, क्योंकि पाकिस्तान मुस्लिम लीग उनके पद पर रहते नवाज को पाकिस्तान लाने का जोखिम लेने के लिए तैयार नहीं थी। खैर जस्टिस बांदियाल जाते जाते नैब के कानून में बदलाव के पाकिस्तान की नेशनल असेम्बली के प्रस्ताव को ही गैर कानूनी ठहरा गए, जिसके तहत सार्वजनिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले खास लोगों पर नैब के अधीन मुकदमा दायर करने से छूट मिल सकती थी।

नवाज शरीफ पर इस समय दो केसों में सजा और कम से कम चार चल रहे मुकदमों का बोझ है। वह इनसे निकलेंगे और चुनाव में अपनी पार्टी का नेतृत्व करेंगे, इसको लेकर तमाम दावे हैं। पीएमएलएन ने जो प्लान किया है उसके मुताबिक नवाज शरीफ दुबई से चार्टर प्लेन के जरिए इस्लामाबाद पहुंचेगे। उसी दिन वह इस्लामाबाद हाई कोर्ट में पेश होकर नियमित जमानत हासिल करगें। इस बीच प्रोटेक्टिव बेल के लिए इस्लामाबाद हाईकोर्ट में उनकी लीगल टीम ने जमानत याचिका लगा दी है। फिर जीटी रोड से रैली निकाल कर लाहौर पहुंचेंगे। उसके बाद शाम को वह मीनार ए पाकिस्तान से आवाम को संबोधित करेंगे।

बहरहाल नवाज शरीफ के लिए मामला बहुत आसान भी नहीं होगा। हालांकि मौजूदा चीफ जस्टिस काजी फैज ईसा के होने से उन्हें राहत मिलने की उम्मीद पूरी है। फिर भी उन्हें दो मोर्चों पर अभी संघर्ष करना पड़ सकता है। पहला यह कि क्या उन्हें तत्काल जमानत मिल जाएगी और वह राजनीतिक अभियान शुरू कर सकेंगे और दूसरा कि क्या उन पर लगे आजीवन प्रतिबंध की मियाद खत्म मानी जाएगी? दोनों मामलों में सुप्रीम कोर्ट को अपना फैसला देना है।

संसद को सुप्रीम मानते हुए जस्टिस काजी अपने ही पूर्ववर्ती जज के फैसले को बदल कर यह राहत दे सकते हैं। जैसे नैब कानून में संशोधन और किसी राजनीतिज्ञ को अधिकतम पांच साल के प्रतिबंध के प्रस्तावों को नये चीफ जस्टिस सही ठहरा सकते हैं। वैसे जस्टिस काजी यह पहले टिप्पणी कर चुके हैं कि नेशनल एसेम्बली यदि कानून बनाने का अधिकार रखता है तो उसमें परिवर्तन का भी अधिकार उसके पास है।

नवाज शरीफ अब 73 साल के हो चुके हैं। 35 साल से अधिक समय से वह राजनीति में हैं। उन्हें पाकिस्तान में जरनल जिया उल हक का दत्तक पुत्र भी कहा जाता है। इमरान खान तो सार्वजनिक सभाओं में भी कहते हैं कि नवाज शरीफ जनरल जिया के जूते पोलिश किया करता था। जो भी हो नवाज शरीफ पंजाब के मुख्यमंत्री के साथ साथ पाकिस्तान के तीन बार प्रधानमंत्री रह चुके हैं। वह 1990,1997 और 2013 में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने। वर्ष 1998 में पाकिस्तान के न्यूक्लियर बम के टेस्ट का श्रेय उन्हीं को जाता है। पर इस समय पाकिस्तान महंगाई और गरीबी के न्यूक्लियर बम पर बैठा हुआ है। ऐसे में वतन वापसी के साथ नवाज शरीफ के लिए दोहरी चुनौती होगी।

उनके वापस लौटने से पीएमएल (एन) की धाक तो बढेगी और हो सकता है चुनाव में उसे इसका फायदा भी मिले। लेकिन पीएम बनने से पहले नवाज शरीफ के सामने जितनी मुश्किलें हैं पीएम बनने के बाद वो और अधिक बढेंगी। अब देखना यह है कि एक तरफ कुआं और दूसरी तरफ खाईं वाली परिस्थिति में वो अपनी और पार्टी की नैय्या कैसे पार लगाते हैं।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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