Opposition and Modi: इन चार पब्लिक परसेप्शन पर टिका है विपक्ष का दारोमदार
विपक्ष जब तक राहुल गांधी, या केजरीवाल या विपक्ष का कोई और नेता या मीडिया भ्रष्टाचार का कोई ठोस सबूत पेश नहीं करता, तब तक मोदी के खिलाफ पब्लिक परसेप्शन नहीं बनता ।

विपक्ष की तरफ से चार विषयों पर नरेंद्र मोदी को निशाना बनाकर उनके खिलाफ पब्लिक परसेप्शन बनाया जा रहा है । विपक्ष की कोशिश यह है कि चुनाव से पहले ये चारों पब्लिक परसेप्शन मोदी के विरोध में बन जाएं । अगर ये चारों पब्लिक परसेप्शन बन जाते हैं, तो फिर विपक्ष को चुनाव लड़ने की जरूरत नहीं पड़ेगी, जनता खुद चुनाव लड़ेगी, जैसे 1977 में जनता ने चुनाव लड़ा था।
पहला पब्लिक परसेप्शन यह बनाया जा रहा है कि मोदी सरकार अपने विरोधियों के खिलाफ सीबीआई, ईडी आदि संस्थाओं का इस्तेमाल कर रही है । दूसरा परसेप्शन यह बनाया जा रहा है कि नरेंद्र मोदी ने अपने मित्र अडानी को नाजायज फायदा पहुंचाया है, जिस कारण 9 साल में उनकी संपति कई गुना बढ़ गई ।
तीसरा पब्लिक परसेप्शन यह बनाया जा रहा है कि राहुल गांधी से डर कर मोदी सरकार ने उनकी लोकसभा सदस्यता खत्म करवाई है । चौथा पब्लिक परसेप्शन यह बनाया जा रहा है कि अगर विपक्ष एकजुट हो जाता है तो 2024 में नरेंद्र मोदी को हराया जा सकता है ।

पहले विषय पर बात करते हैं कि मोदी सरकार अपने विरोधियों के खिलाफ सीबीआई और ईडी का इस्तेमाल कर रही है । अब यह पब्लिक परसेप्शन बन रहा है या नहीं तो इसका जवाब यह है कि मीडिया और विपक्ष आंकड़ों के साथ यह पब्लिक परसेप्शन बनाने में काफी हद तक कामयाब रहे हैं कि मोदी सरकार अपने विरोधियों के खिलाफ सीबीआई और ईडी का इस्तेमाल कर रही है ।
ममता बनर्जी ने तो यह पब्लिक परसेप्शन बनाने के लिए सीबीआई रेड के समय रेड के स्थान पर धरना भी दिया । लेकिन नरेंद्र मोदी इस बात को छुपा भी नहीं रहे। वह सीबीआई और ईडी अफसरों की कांफ्रेंसों में खुल कर कह रहे हैं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ उन्होंने जो अभियान शुरू किया है, उसे न सिर्फ जारी रखिए बल्कि और तेज गति से कार्रवाई शुरू कीजिए ।
यह बात ठीक है कि नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद सीबीआई और ईडी के लगभग सारे केस विपक्षी दलों के नेताओं पर बने हैं । भाजपा के किसी नेता पर कोई केस दाखिल नहीं हुआ, न ही कार्रवाई हुई ।
लेकिन सवाल यह है कि पब्लिक परसेप्शन किससे बनता है, इन खबरों से कि विपक्ष के नेताओं को चुन चुन कर निशाना बनाया जा रहा है, या जब विपक्षी नेताओं के ठिकानों पर छापों में नोटों के भंडार मिलते हैं, तब बनता है । विपक्ष के हमलावर होने से पब्लिक परसेप्शन बनता है या जब सत्येन्द्र जैन या नवाब मलिक या पार्थ चटर्जी को साल साल भर अदालत से जमानत नहीं मिलती, तब पब्लिक परसेप्शन बनता है ।
पब्लिक सीबीआई और ईडी की कार्रवाई पर तब भरोसा करने लगती है जब लालू यादव को चारे घोटाले में और ओम प्रकाश चोटाला को नौकरियों के बदले धन उगाहने में सजा होती है । चारा घोटाले में सजायाफ्ता लालू यादव के परिवार पर जब सीबीआई और ईडी रेलवे में नौकरी के बदले जमीने हथियाने के मामले पर कार्रवाई करते हैं और सबूत जनता के सामने आते हैं, तो पब्लिक सीबीआई ईडी पर भरोसा करती है ।
अब जो विच हंट का ताज़ा उदाहरण दिया जा रहा है, वह यह है कि साफ़ सुथरी छवि वाले मनीष सिसोदिया की गिरफ्तारी से आम आदमी पार्टी को तोड़ने के लिए सीबीआई और ईडी का बेजा इस्तेमाल किया गया है । लेकिन इस मामले में आम आदमी पार्टी सरकार ने सीबीआई जांच शुरू होने से पहले ही विवादास्पद शराब नीति को वापस लेकर एक पब्लिक परसेप्शन अपने खिलाफ बना ली थी ।
सीबीआई मनीष सिसोदिया के खिलाफ कोई ठोस सबूत भले ही नहीं दे पाई हो, लेकिन कोर्ट में इतने सबूत तो दे ही दिए हैं कि सत्येन्द्र जैन की तरह उनकी भी जमानत नहीं हो रही है । अरविन्द केजरीवाल ने शराब घोटाले पर चर्चा करने की बजाए बार बार शिक्षा नीति को ढाल बना कर भी इस पब्लिक परसेप्शन को मजबूत करने का काम किया है कि वह शराब नीति का बचाव क्यों नहीं कर रहे ।
दूसरा आरोप है मोदी का अडानी को फायदा पहुँचाने वाली नीतियाँ बनाना और उन्हें एयरपोर्ट और बन्दरगाहों के संचालन का काम देना । यह पब्लिक परसेप्शन काफी हद तक बन रहा है कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद अडानी मालामाल हुए हैं, तो उसमें जरुर नरेंद्र मोदी की भूमिका रही होगी ।
लेकिन जब तक राहुल गांधी, या केजरीवाल या विपक्ष का कोई और नेता या मीडिया भ्रष्टाचार का कोई ठोस सबूत पेश नहीं करता, तब तक मोदी के खिलाफ पब्लिक परसेप्शन नहीं बनता । मोदी के खिलाफ पब्लिक परसेप्शन तब बनेगा, जब ये सबूत दिए जाएंगे कि मोदी को फायदा हुआ, मोदी ने भ्रष्टाचार किया या उनके किसी मंत्री ने भ्रष्टाचार किया ।
विपक्ष के नेता इस बात को समझने लगे हैं कि मोदी को फायदे के आरोप लगाने होंगे, इसलिए राहुल गांधी ने अडानी के धंधों में मोदी के 20 हजार करोड़ लगे होने का आरोप लगाया है और केजरीवाल ने मोदी के 42 हजार करोड़ रूपए लगे होने का आरोप लगाया है ।
लेकिब जब तक ये दोनों नेता ठोस सबूतों के साथ कोर्ट नहीं जाते, या एफ़आईआर दर्ज नहीं करवाते तब तक यह पब्लिक परसेप्शन नहीं बनेगा कि मोदी ने भ्रष्टाचार किया । 2019 में जब राहुल गांधी ने राफेल को लेकर अनिल अंबानी को फायदा पहुँचाने के आरोप लगाए थे और चौकीदार चोर कहा था, तो वह पब्लिक परसेप्शन नहीं बना था ।
तीसरा पब्लिक परसेप्शन यह बनाया जा रहा है कि मोदी ने राहुल गांधी की लोकप्रियता से डर कर उनकी लोकसभा सदस्यता खत्म करवाई है । केस की क्रोनोलाजी यह साबित करती है कि राहुल गांधी की सदस्यता खत्म करवाने के लिए अदालत को प्रभावित किया गया होगा और उन्हें दो साल की सजा दिलवाई होगी, ताकि उनकी लोकसभा सदस्यता खत्म हो ।
यह पब्लिक परसेप्शन इसलिए भी बनता है क्योंकि अब तक किसी को मानहानि के केस में छह महीने से ज्यादा सजा नहीं हुई तो राहुल गांधी को क्यों हुई । इसलिए बड़ी उम्मीद यही बनती है कि आने वाले दिनों में उनके कन्विक्शन पर रोक लगेगी और उनकी सदस्यता बहाल होगी ।
चौथा पब्लिक परसेप्शन यह बनाया जा रहा है कि 2024 के चुनाव में विपक्षी एकता हो गई तो भाजपा को हराया जा सकता है । हालांकि अगर हम 2019 के आंकड़े देखें तो समूचे विपक्ष को भी उतने वोट नहीं मिले थे, जितने एनडीए को मिले थे । लेकिन पिछले दस सालों में एंटी इन्क्म्बेसी भी थोड़ी बहुत बनी होगी, इसलिए विपक्ष को ऐसा लगता है कि समूचा विपक्ष एकजुट हो जाए तो भाजपा को हरा सकते हैं ।
क्षेत्रीय दल जिस तरह एकजुट हो रहे हैं, मेल मुलाकातें बढ़ रही हैं । स्टालिन के जन्मदिन पर चेन्नई में जो बाते हुई हैं, उसमें बिना किसी चेहरे को आगे रखे, सारे देश में सीट एडजेस्टमेंट से भाजपा के सामने एक उम्मीदवार खड़ा करने की संभावनाए टटोली गई हैं ।
अगर राहुल को बैकग्राउंड में रख कर विपक्षी एकता होती है तो 2024 का मुकाबला थोड़ा बहुत कड़ा हो सकता है । लेकिन अगर राहुल को ही चेहरा बना कर विपक्षी एकता होती है तो फायदा भाजपा को होगा, क्योंकि राहुल गांधी ने भारत जोड़ो यात्रा से अपनी इमेज को जरुर थोड़ा बहुत सुधारा है, लेकिन नेता नहीं बने हैं । पब्लिक परसेप्शन उनके नेता बनने का नहीं बना है ।
इसलिए भाजपा का फायदा इसी में है कि विपक्षी एकता अगर हो, तो राहुल गांधी के नेतृत्व में हो, क्योंकि आज भी स्थिति यह है कि मोदी के सामने राहुल नहीं टिक पाते । इसलिए यह दूरगामी राजनीति का हिस्सा हो सकता है कि राहुल गांधी को ज्यादा चर्चा में रखा जाए, ताकि विपक्ष उन्हें ही सामने रखने पर मजबूर हो । शायद इसीलिए उनके लन्दन के भाषण को संसद में बड़ा मुद्दा बनाया गया हो, और शायद इसीलिए राहुल गांधी की लोकसभा सदस्यता खत्म करवाने की रणनीति बनी हो।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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