Criminal Code: नयी न्याय संहिता नौकरशाही केंद्रित न होकर नागरिक केंद्रित बने

संसद के मानसून सत्र के आखिरी दिन शुक्रवार को गृहमंत्री अमित शाह ने एक 'ऐतिहासिक पहल' करते हुए भारतीय दंड संहिता (इंडियन पीनल कोड) में आमूलचूल बदलाव का प्रस्ताव संसद के सामने प्रस्तुत किया। हालांकि यह प्रस्ताव अभी सदन पटल पर रखने के साथ ही स्टैंडिग कमेटी के पास भेज दिया गया है। भविष्य में विधेयक के पारित होते ही ब्रिटिश शासकों द्वारा बनाये गये इंडियन पीनल कोड (आईपीसी 1860) का अंत हो जाएगा और उसकी जगह भारतीय न्याय संहिता 2023 कानूनों का नया आधार बनेगी।

criminal code

लोकसभा में बोलते हुए गृहमंत्री अमित शाह ने प्रधानमंत्री मोदी के हवाले से कहा कि उन्होंने 2019 में ही कहा था कि ब्रिटिश उपनिवेशवादियों द्वारा बनाये गये कानूनों की गहन समीक्षा की जरूरत है। तब से अब तक गृह मंत्रलाय ने इस दिशा में राज्य सरकारों, केन्द्र शासित प्रदेशों, उच्च न्यायालयों और विधि विश्वविद्यालयों के साथ लंबे विचार विमर्श के बाद 'भारतीय न्याय संहिता 2023' की रुपरेखा तैयार की है जो संसद से पास हो जाने के बाद आईपीसी 1860 की जगह लेगी।

ब्रिटिश शासकों ने मैकाले के नेतृत्व में 1934 में पहली कमेटी बनायी थी जिसे भारत की जनता पर शासन करने के लिए कानूनों का निर्माण करना था। मैकाले ब्रिटिश शासकों द्वारा बनाये गये पहले लॉ कमीशन के पहले चेयरमैन भी थे। एक साल के भीतर उन्होंने अपना ड्राफ्ट ब्रिटिश शासन को सौंप दिया। लेकिन इसके बाद अगले 25 साल तक कानून बनाने पर ब्रिटिश शासकों द्वारा विचार विमर्श चलता रहा। 1857 की क्रांति ने उन्हें एक बार फिर से कानूनों पर नये सिरे से विचार करने के लिए विवश किया। आखिरकार 1860 में 'भारतीयों पर शासन करने' के उद्देश्य से इंडियन पीनल कोड बनाने में सफल हुए जिसे 1861 में ब्रिटिश पार्लियामेन्ट से मिली मंजूरी के बाद भारत में लागू कर दिया गया था।

अब जबकि शासन करने और दंड देने वाले कानूनों की एक रूपरेखा बन गयी थी इसलिए साक्ष्य को लेकर भी कानून की जरूरत महसूस हुई। इसलिए 1872 में एविडेन्स एक्ट बनाया गया। इसके बाद 1882 में क्रिमिनल प्रोसीजर कोड जिसे सामान्य भाषा में सीआरपीसी कहते हैं उसका निर्माण किया गया। इस तरह तीन अलग अलग प्रावधानों से ब्रिटिश हुकूमत ने भारत में दंड व्यवस्था की स्थापना और संचालन को सुनिश्चित किया। समय समय पर इनमें नये कानून जुड़ते रहे। पूर्व के कानूनों में बदलाव भी होते रहे लेकिन मूल ढांचा वही रहा जिसका उद्देश्य नागरिकों को न्याय देने से अधिक अपराध करने पर कठोर दंड देने पर केन्द्रित था।

इसलिए गृहमंत्री अमित शाह ने शुक्रवार को जब लोकसभा में यह कहा कि भारत में लोग कहते हैं कि सजा की कोई जरूरत नहीं है। कोर्ट कचहरी के चक्कर लगाना ही भारत में सजा है, तो कुछ गलत नहीं कह रहे थे। 1862 में जब पहली बार ब्रिटिश हुकूमत ने कलकत्ता के फोर्ट विलियम में हाईकोर्ट की स्थापना की थी, तब से लेकर अब तक भारत का कोर्ट सिस्टम न्याय पाने से अधिक सजा दिलाने या सबक सिखाने के लिए ही इस्तेमाल होता है। हत्या और यौन हिंसा जैसे गंभीर अपराधों में भी सजा सुनिश्चित होते होते जीवन बीत जाता है।

भारत की कानून व्यवस्था में इस देरी के लिए बढ़ती जनसंख्या और संसाधनों की कमी को जिम्मेवार ठहराया जाता है। लेकिन जिस एक बात की पूरी तरह से अनदेखी की जाती है वह यह कि पूरी कानूनी प्रक्रिया ही इतनी उलझी हुई है कि पेशेवर अपराधी या फिर 'पहुंच वाले लोग' इसका दुरुपयोग करके बच निकलते हैं। इसके उलट हजारों गरीब लोग सालों साल जेलों में इसलिए पड़े रहते हैं क्योंकि उनके पास जमानत कराने का पैसा नहीं होता या जमानतदार की व्यवस्था नहीं हो पाती।

कुछ कमियों की ओर अमित शाह ने शुक्रवार को लोकसभा में भी संकेत किया। जैसे कई बार यह सुनने में आता है कि अगर किसी को फंसाना हो तो सर्च या जब्ती के नाम पर पुलिस ही आपत्तिजनक वस्तु को उस व्यक्ति के घर में रखकर उसे फंसा देती है। अब अगर भारतीय न्याय संहिता को संसद से मंजूरी मिलती है तो इसे रोकने के लिए सर्च और जब्ती के समय वीडियोग्राफी को अनिवार्य किया जाएगा। इसी तरह पुलिस कई बार आरोपियों को घर से उठा लेती है लेकिन उसकी गिरफ्तारी को रिकार्ड में दर्ज नहीं किया जाता। नये प्रावधान के तहत अब अगर पुलिस किसी को उठाती है तो उसके परिवार को लिखित गारंटी देनी होगी कि उस व्यक्ति की सुरक्षा की जिम्मेवारी पुलिस की है।

और भी कुछ प्रावधानों का उल्लेख अमित शाह ने किया है। जैसे चार्जशीट को अब अधिकतम 90 दिन और कोर्ट से अनुमति मिलने के बाद 180 दिन में अनिवार्य रूप से दाखिल करना होगा। सात साल से अधिक सजा वाले कानूनों में पुलिस द्वारा क्लोजर रिपोर्ट लगाने से पहले पीड़ित का बयान दर्ज करना होगा, आदि।

प्रस्तावित भारतीय न्याय संहिता में एफआईआर दर्ज करने, उसकी चार्जशीट लगाने और फिर अदालती कार्रवाई में प्रमाण सहित अपराध को साबित करने के बीच जो समय का लंबा अंतराल है उसे कम करने की कोशिश की जाएगी। इसी तरह जिन अपराधों में सात साल या उससे अधिक की सजा का प्रावधान होगा उसमें फोरेन्सिक जांच को अनिवार्य किया जाएगा ताकि किसी को गलत तरीके से फंसाया न जाए और दोषी निर्दोष न सिद्ध होने पाये।

अदालतों का भी बोझ कम करने के लिए समरी ट्रायल को बढ़ाने पर जोर दिया जाएगा जिससे अदालतों पर 40 प्रतिशत तक केसों का बोझ कम हो जाएगा। इसका प्रावधान सीआरपीसी संशोधन 1973 के तहत किया गया था। अदालतों में तीन तरह के ट्रायल होते हैं। वारन्ट, सम्मन और समरी। वारंट और सम्मन ट्रायल में समय अधिक लगता है, वहीं समरी ट्रायल में केसों का निपटारा जल्दी होता है। इसमें अपेक्षाकृत कम संवेदनशील अपराधों का निपटारा किया जाता है। इसलिए अगर इसे प्रोत्साहन मिलता है तो न केवल त्वरित न्याय मिलेगा बल्कि अदालतों पर से पेंडिंग केस का बोझ भी कम होगा। इसी तरह मानहानि या ऐसे ही मुकदमों में संबंधित समाज की सेवा को दंड के रूप में रखने का प्रस्ताव है।

राजद्रोह को खत्म करके उसकी जगह देशद्रोह का प्रावधान करने का प्रस्ताव है। देशद्रोह में किसी ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह को दंडित किया जाएगा जो देश की एकता, अखंडता को नुकसान पहुंचाने के लिए कार्य कर रहा है। इसी तरह भीड़ हिंसा (मॉब लिंचिंग) को भी प्रस्तावित न्याय संहिता में गंभीर अपराध की श्रेणी में रखा जाएगा। गृहमंत्री के अनुसार महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा को सर्वोपरि रखते हुए कई प्रावधान किये जाने का प्रस्ताव है जिसमें पहचान छिपाकर किसी महिला से शारीरिक संबंध बनाने जैसे अपराध को भी शामिल किया गया है। इसी तरह डिजिटल युग में साक्ष्य से लेकर ट्रायल तक डिजिटल प्रयोग को मान्य करने का प्रावधान भी प्रस्तावित भारतीय न्याय संहिता में किया गया है।

ये सभी घोषणाएं गृहमंत्री ने संसद में की हैं और निश्चय ही यह स्वागतयोग्य है। लेकिन जो प्रस्तावित ड्राफ्ट है उसे देखकर लगता है जैसे ब्रिटिश हुकूमत को इंडियन स्टेट से बदल दिया गया है। आईपीसी में भी हुकूमत को नागरिक समूहों द्वारा दी जाने वाली चुनौती किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं थी और प्रस्तावित न्याय संहिता में स्टेट की कार्रवाई में बाधा डालने वालों के खिलाफ कठोर कार्रवाई का प्रस्ताव किया गया है। अगर स्टेट ही सर्वअधिकार संपन्न बना रहेगा तो फिर उसे आईपीसी कहें या न्याय संहिता, उसके व्यवहार में क्या बेहतरी आयेगी?

नई कानून संहिता के साथ साथ नौकरशाही और पुलिस को भी जनता के प्रति जवाबदेह बनाये जाने की जरूरत है। गृहमंत्री ने अपने संबोधन में कुछ चुनी हुई बातें कही जो आकर्षक हैं लेकिन जो ड्राफ्ट है वो स्टेट और नौकरशाही को असीमित ताकत देता हुई दिख रहा है। इसका कारण संभवत: यह है कि जिन नौकरशाहों ने ये सारी कवायद की होगी वो स्टेट की सर्वोच्चता के बहाने अपने प्रभुत्व को किसी न किसी रूप में बहाल रखना चाहते हैं। यही समस्या पुरानी व्यवस्था में भी थी और अगर यही समस्या नयी संहिता में भी बनी रहेगी तो इस पूरी कवायद के केन्द्र में नागरिक कैसे आ पायेगा?

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+