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Indian Economy: देश की अर्थव्यवस्था में हर नागरिक की भागीदारी जरूरी

भारत को पांच ट्रिलियन डॉलर वाली अर्थव्यवस्था को मिशन मोड में रखा गया है लेकिन सवाल यह है कि अगर उत्पादन और विपणन का केन्द्रीकरण हो जाएगा तो यह लक्ष्य प्राप्त करके भी भारत के लोगों को क्या हासिल होगा?

need to every citizens participation in the indian economy

Indian Economy: पूंजी और केन्द्रीकरण ये एक दूसरे के साथी हैं। केन्द्रीकरण पूंजी का स्वभाव है इसलिए अगर हम भारत की परंपरागत अर्थव्यवस्था का अध्ययन करेंगे तो पायेंगे कि भारत में उत्पादन और पूंजी का विकेन्द्रीकरण इसकी समृद्धि का आधार रहा है। जब भारत संसार की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हुआ करता था उस समय भारत का उत्पादन तंत्र यहां की जातियों में निहित था। यानी यह पूरी तरह से विकेन्द्रित था।

भारतीय अर्थव्यवस्था में गांव इसकी मूल ईकाई हुआ करते थे और उत्पादन केन्द्र भी। गांव के लोगों की जरूरत की जितनी चीजें थीं उन्हें अधिकांशत: गांव में ही बनाया जाता था। जो अतिरिक्त वस्तुएं थी उन्हें आसपास के इलाकों से व्यापार के जरिए प्राप्त कर लिया जाता था। जैसे भारत में जो परंपरागत गांव हैं वहां हर प्रकार की जातियों का समावेश मिलता है। ऐसा इसलिए होता था क्योंकि इन जातियों के हाथ में ही उत्पादन होता था और उन्हें गांव में बसाकर रखा जाता था।

आज इक्कीसवीं सदी में ये बातें किसी कल्पनालोक की लग सकती हैं लेकिन आज भी ऐसे ग्राम्य जीवन में यह अर्थव्यवस्था देखने को मिल जाएगी जहां शहरी बाजार का प्रवेश नहीं हुआ है। भारत के गांवों में उपयोग की सारी जरूरत गांव में ही निर्मित करने पर कितना जोर रहता था इसे आप इस बात से समझ सकते हैं कि शीशा, पारा, लोहा जैसी धातुएं निर्मित करने की तकनीकी गांवों के पास थी और गांव गांव में इसके जानकार मिल जाते थे।

धीरे धीरे सारा उत्पादन तंत्र गांव के हाथ से निकलकर बड़े कारोबारियों के पास चला गया और जातियां अपना उत्पादन छोड़कर जातिवादी बहस और आरक्षण की लाइन में जा खड़ी हुई। यूरोप के औद्योगीकरण ने जिस तरह से पूंजी और उत्पादन के केन्द्रीकरण का रास्ता तैयार किया था, भारत भी उस रास्ते पर आने से कब तक बच सकता था? पहले सरकार नियंत्रित उत्पादन तंत्र और बाद में मुक्त बाजार की अर्थव्यवस्था ने भारत के गांवों से उनकी सामान्य जरूरत का उत्पादन भी उनसे छीन लिया।

अब लोगों के विकास से अधिक जोर पूंजी के विकास पर है। आज का जो विकास है मनुष्य के रोजगार की बजाय पूंजी और मशीनरी के रोजगार की चिंता ज्यादा करता है। पूंजी और मशीनरी को काम मिलना जरूरी है, इसके लिए भले ही मनुष्य को खाली हाथ घर बैठना पड़े। पूंजी और मशीन ने मानों मनुष्य के खिलाफ ही आपस में हाथ मिला लिया है।

ऐसे हालात में अर्थव्यवस्था का आकार तो बढ़ता है लेकिन बेरोजगारी भी उसी अनुपात में बढ़ती है। जो पूंजीवाद के पैरोकार हैं वो कहते हैं कि प्रत्यक्ष रोजगार भले घटता है लेकिन परोक्ष रोजगार बढ़ जाता है। लेकिन ऐसे लोग ये बात छिपा लेते हैं कि तकनीकी, मशीनरी और पूंजी के तालमेल से जो अर्थव्यवस्था निर्मित हो रही है उसमें 100 रोजगार जाता है तो केवल दस नया पैदा होता है। बाकी के नब्बे जो उनकी भाषा में अनस्किल्ड कह दिए जाते हैं उनके लिए इस अर्थव्यवस्था में क्या है?

इसका कोई जवाब किसी पूंजीवादी के पास नहीं होता। सरकारों के पास भी कोई जवाब नहीं है। सरकारों के सामने आधुनिक होने की चुनौती है और केन्द्र सरकार को दुनिया के देशों से कंपीटीशन भी करना है। क्या कोई देश तकनीकी को नकारकर आज के विश्व में टिका रह सकता है? इसलिए सरकार भी ऐसी नीतियों को बढ़ावा देती है जिससे पूंजी और उत्पादन का केन्द्रीकरण हो तथा उसकी आमदनी बढ़े।

लेकिन इसमें सबसे बड़ा संकट बाजार से उठने वाली मांग को लेकर पैदा होता है। अगर किसी अर्थव्यवस्था में बड़ी जनसंख्या के पास क्रयशक्ति ही नहीं बची तो उस अर्थव्यवस्था का विकास कैसे होगा? भारत को ही देखें तो यहां 5 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था का बड़ा शोर मचाया जाता है। इसमें कुछ गलत भी नहीं है। लेकिन उत्पादन तंत्र के केन्द्रीकरण से ये लक्ष्य प्राप्त भी हो गया तो भारत के लिए किस काम का होगा जब बड़ी जनसंख्या इसके लाभ से ही वंचित रहेगी?

भारत की बड़ी जनसंख्या को 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का लाभार्थी बनाने के लिए जरूरी है कि उत्पादन बढ़ाने के साथ ही लोगों की क्रयशक्ति को बढ़ाने पर भी जोर दिया जाए। यह सिर्फ तभी संभव होगा जब अर्थव्यवस्था का सख्ती से विकेन्द्रीकरण किया जाए। गिने चुने बड़े कॉरपोरेशन इतनी बड़ी जनसंख्या वाले देश के लिए लाभ से ज्यादा घाटे का सौदा हैं। इस नीति से हो सकता है कागजों में सरकार एक बड़ी अर्थव्यवस्था बन भी जाए लेकिन वास्तविक अर्थों में इस देश का जन सशक्त नहीं होगा। उसकी क्रयशक्ति नहीं बढ़ेगी जो अंतत: किसी भी अर्थव्यवस्था की मजबूती के लिए सबसे बड़ा कारण होता है। अगर लोगों के पास क्रयशक्ति ही नहीं रहेगी तो बाजार में मांग कहां से पैदा होगी?

यह एक ऐसा विरोधाभासी संतुलन है जिसे साधना किसी सरकार के लिए गंभीर चुनौती से कम नहीं है। ऐसे में कृषि, सर्विस सेक्टर, स्माल स्केल इंडस्ट्री, और खुदरा कारोबार ये ऐसे माध्यम हैं जहां जितनी अधिक जन भागीदारी होगी उतना देश आंतरिक रूप से मजबूत होगा।

सरकार को चाहिए कि एक बार फिर से कुछ क्षेत्रों को क्वाटिंटेटिव रेस्ट्रिक्शन के दायरे में लाने पर विचार करे ताकि यहां कुछ बड़े कारोबारी ही कब्जा न जमा सकें। इससे पूंजी और उत्पादन के विकेन्द्रीकरण में मदद मिलेगी। विकेन्द्रित अर्थव्यवस्था के जरिए ही भारत 5 ट्रिलियन या उससे भी अधिक वाली अर्थव्यवस्था का लक्ष्य भी प्राप्त करेगा और अपने नागरिकों से भी न्याय कर सकेगा।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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