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हिन्दू-मुस्लिम सौहार्द हेतु ‘प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट’ की समीक्षा जरूरी

कुछ दिन पहले (09 सितम्बर 2022 को) सर्वोच्च न्यायलय ने 'प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट' (उपासना स्थल अधिनियम) के खिलाफ सुनवाई को मंजूरी दे दी। इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश यूयू ललित, जस्टिस एस रविन्द्र भट और जस्टिस पीएस नरसिम्हा की पीठ करेगी। केंद्र सरकार की ओर से सोलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुनवाई के लिए समय माँगा था, इसलिए अदालत ने सुनवाई की तारीख 11 अक्टूबर तय की है।

need to be review of Places of Worship Act

काशी के भूतपूर्व महाराज की पुत्री महाराजा कुमारी कृष्णाप्रिया ने अधिवक्ता जे साईं दीपक के माध्यम से इस मामले से जुड़ने का आवेदन दिया था। उनका कहना था कि काशी के सभी मंदिरों के संरक्षक काशी नरेश विभूति नारायण सिंह थे और उसी राजपरिवार से होने के नाते इस कानून को चुनौती देने का उन्हें अधिकार है। ये कानून उन्हें संविधान के अनुच्छेद 14, 25, 26, 29 और 32 द्वारा प्रदत्त अधिकारों का उल्लंघन करता है।

गौरतलब है कि ये वही कानून है जिसके जरिये काशी के शृंगार-गौरी मामले में निकल आये शिवलिंग को फव्वारा बताकर मुस्लिम पक्ष मामले को उलझाने का प्रयास कर रहा था। "प्लेसेस ऑफ़ वर्शिप एक्ट 1991" नाम से जाना जाने वाला ये कानून कहता है कि आजादी के दिन यानि 15 अगस्त 1947 को जो धार्मिक स्थल जिस स्वरुप में था उसी में रहेगा।

इस वजह से बर्बर हमलावरों द्वारा हथिया लिए गए कई मंदिर-गुरूद्वारे आदि धार्मिक स्थल वापस हिन्दू, बौद्ध, जैन, और सिक्ख समुदाय को नहीं दिए जा सकते। अज्ञात कारणों से अयोध्या के राम मंदिर को इस काले कानून से अपवाद स्वरुप अलग रखा गया था। किस हिसाब से 15 अगस्त 1947 की तिथि को तय किया गया था, ये भी कानून से कहीं स्पष्ट नहीं है। ये कानून मुश्किल से दो पन्नों का ही है।

अपने दावे में महाराजा कुमारी कृष्णप्रिया कहती हैं कि असंवैधानिक तरीके से बनाये गए कानून अगर पढ़ाने हों, तो इस कानून को किताबों में होना चाहिए। जिन पर इस कानून का असर होगा, उनके संवैधानिक अधिकारों पर विचार किये बिना ही इसे लागू कर दिया गया है। भारत में जिन्होंने गुलामी झेली उनके धार्मिक-सांस्कृतिक स्थलों को वापस लेने का अधिकार भी उनसे छीन लिया गया है।

जिस कानून के जरिये भारत के मूल निवासियों से ये अधिकार छीने गए, उस कानून पर केवल तीन दिन (23/08/1991, 09/09/1991 और 10/09/1991) संसद में बहस हुई और तीसरे दिन (10/09/1991) इसे कानून बना दिया गया। महाराजा कुमारी कृष्णप्रिया का दावा आगे ये भी कहते है कि अपनी ही संस्कृति से घृणा को तो ये कानून दर्शाता ही है, साथ ही मध्य एशियाई देशों और यूरोप की जो गुलामी हमें करनी पड़ी, उसका भी महिमामंडन करता है।

आखिर क्या शिकायत है इस "प्लेसेस ऑफ़ वर्शिप एक्ट" से?

इस एक्ट के खिलाफ कई पिटीशन दायर किये गए हैं और लगभग सभी का मकसद एक "ऐतिहासिक गलती" को सुधारना है। ये मामला इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि इसके फैसले पर दिल्ली, वाराणसी, मथुरा के अलावा सुप्रीम कोर्ट में चल रहे कुछ मामलों पर भी ये एक्ट लागू होगा या नहीं, ये तय होगा। विश्व भद्र पुजारी-पुरोहित महासंघ की और से अधिवक्ता विष्णु जैन कहते हैं कि किसी कानून की समीक्षा करना पूरी तरह से जायज है। इस मामले में वो मिनर्वा मिल्स फैसले का उदाहरण देते हैं, जिसमें कहा गया था कि किसी भी न्यायिक समीक्षा का अधिकार छीन लिया जाना एक तरह से केंद्र और राज्य को प्रदत्त विधायिका के अधिकारों का मजाक उड़ाना है, जिससे मौलिक अधिकार बेमानी हो जाते हैं।

मिनर्वा मिल्स फैसले के मुताबिक संसद को पूरी तरह कानून बनाने का एकाधिकार नहीं दिया जाना चाहिए। इससे कानूनों को बदलने-सुधारने जैसे जरूरी कदम उठाना संभव नहीं रह जायेगा। इसके विरोध में जमीअत-ए-उलेमा-ए-हिन्द की ओर से अधिवक्ता एजाज़ मकबूल का कहना था कि "प्लेसेस ऑफ़ वर्शिप एक्ट" एक केन्द्रीय कानून है जो अपने-आप ही संवैधानिक रूप से जायज है। इसके लिए वो रामजन्मभूमि के फैसले का उदाहरण देते हैं, जिसमें "प्लेसेस ऑफ़ वर्शिप एक्ट" को वैध ठहराया गया था। इसके विरुद्ध जे साईं दीपक का कहना है कि इससे अनुच्छेद 26 (अपने धार्मिक स्थलों/ धार्मिक मामलों के प्रबंधन का अधिकार) बाधित होता है।

मार्च 2021 में सर्वोच्च न्यायलय ने गृह, कानून और संस्कृति के केन्द्रीय मंत्रियों को नोटिस देकर अश्विनी उपाध्याय की एक पिटीशन पर जवाब माँगा था। उपाध्याय की दलील थी कि 15 अगस्त 1947 की तारीख मनमानी और निराधार है। उन्होंने इस कानून की धारा 2, 3 और 4 को चुनौती देते हुए कहा था कि ये धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों के खिलाफ है। पिटीशन में कहा गया है कि धारा 2, 3 एवं 4 अनुच्छेद 25 (पूजा, प्रार्थना और अपने धर्म के प्रचार-प्रसार के अधिकार), अनुच्छेद 26 (उपासना और तीर्थों का समुदाय द्वारा प्रबंधन का अधिकार), अनुच्छेद 29 (संस्कृति के संरक्षण का अधिकार) के खिलाफ तो है ही, साथ ही अनुच्छेद 49 (राज्य द्वारा ऐतिहासिक स्थलों के संरक्षण की जिम्मेदारी) और अनुच्छेद 51 अ (धार्मिक सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण) के भी खिलाफ जाती है।

दूसरी कई पिटीशन भी करीब-करीब यही बातें करती हैं। इनके अलावा एक अनिल कबोतरा की पिटीशन भी सुप्रीम कोर्ट में है, जो बताती है कि छत गिरा देने, दीवारें गिराने, नींव-खम्भे उखाड़ देने यहाँ तक की नमाज पढ़ने के बाद भी मंदिर मंदिर ही रहता है। उसकी प्रकृति नहीं बदलती।

कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि केवल एक राम जन्मभूमि मंदिर के मसले के अदालत में हल होने से मामला सुलझा नहीं है। रामजन्मभूमि विवाद में पहले जहाँ मुस्लिम पक्ष "अदालत का जो भी फैसला होगा, उसे मानेंगे" की बातें कहता था, वही अब कहने लगा है कि फैसला गलत हुआ। इसके अलावा जैसा कि "काशी-मथुरा बाकी है" जैसे नारों में सुनाई देता है, हिन्दुओं के लिए उन पर किये गए ऐतिहासिक जुल्मों के घाव भरे नहीं हैं। लेकिन अब ऐसा लगता है कि सहते जाने, सहिष्णु बने रहने की आदत हिन्दुओं ने छोड़नी शुरू कर दी है। इसकी वजह से ऐसे और भी ऐतिहासिक सुधारों से आने वाले दशकों में भारत को गुजरना ही होगा। यह भारत में रहनेवाले हिन्दू और मुसलमानों दोनों के सौहार्दपूर्ण संबंधों को बनाये रखने के लिए जरूरी है।

अतीत के रिसते घावों और पिसते मनोभावों से दोनों एक दूसरे के करीब आकर भी दूर ही बने रहेंगे। संबंधों को बेहतर बनाने के लिए जरुरी है कि इस साजिशपूर्ण कानून की संवैधानिक समीक्षा हो जिसके लिए सुप्रीम कोर्ट तैयार हो गया है।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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