MSME Exchange: गेमचेंजर साबित हो सकता है लघु उद्योगों का अपना स्टॉक एक्सचेन्ज
MSME Exchange: प्रतिवर्ष 27 जून को विश्व एमएसएमई दिवस मनाया जाता है। लघु उद्योगों के सामने आनेवाली समस्याओं पर कम से कम इस दिन विचार किया जाता है लेकिन इस पर विमर्श के दौरान इस वर्ग की मूलभूत समस्या पूंजी और बड़ी मछली के बीच छोटी मछली के रूप में दब जाना गायब रहता है। इसका समाधान तभी होगा जब रेगुलर स्टॉक एक्सचेंज से इतर एमएसएमई के लिए समर्पित स्वतंत्र स्टॉक एक्सचेंज की स्थापना होगी। जब तक यह सुधार नहीं होगा इस वर्ग का स्वतंत्र विकास हमेशा संघर्ष करेगा।
हम सबको मालूम है एमएसएमई सेक्टर भारतीय अर्थव्यवस्था का मेरुदंड है। एमएसएमई की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार भारत में कुल एमएसएमई 6.33 करोड़ हैं, और उसमें से 6.08 करोड़ यानि लगभग 95.98 फीसदी एमएसएमई एकल व्यवसाय में हैं। यह दर्शाता है कि एमएसएमई द्वारा कॉरपोरेट फॉर्म या अन्य संगठित रूप बहुत कम पसंद किये जा रहें हैं और यही कारण है कि इस सेक्टर की एक बहुत बड़ी संख्या अनमैप्ड और अपंजीकृत हैं।

भारत में यह क्षेत्र अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है क्योंकि यह अन्त्योदय के सिद्धांतों के अनुसार अंतिम छोर के भारतीय के विकास में योगदान देता है। वर्ष 2018-19 के रिपोर्ट के अनुसार एमएसएमई अपनी विशाल वितरित उपस्थिति के साथ करीब करीब 11 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार, जीडीपी में 29 फीसदी तो जीवीए में 31.83 फीसदी और निर्यात में 48.10 फीसदी का योगदान दे रहा है।
इतना सब होने के बावजूद भी इस सेक्टर की सबसे बड़ी चिंता इसका बड़ी संख्या में अनमैप्ड और अपंजीकृत होना है। इसमें बड़ी संख्या में लोग एकल व्यवसाय में हैं और लगातार नकदी संकट से जूझते रहते हैं चाहे वह कार्यशील पूँजी हो या स्थाई पूंजी। जबकि इनके मुकाबले बड़े उद्यम के लिए कार्यशील पूंजी एवं स्थाई पूंजी की उपलब्धता अधिक है।
एक बड़े संस्थागत प्रयास के रूप में इनके लिए पूँजी बाजार को आकर्षक बनाना जरुरी है जिस कारण ये व्यवसाय के अनौपचारिक फॉर्म छोड़कर औपचारिक फॉर्म में आएं। उनकी समस्या को एमएसएमई के लिए समर्पित स्टॉक एक्सचेंज बनाकर दूर किया जा सकता है। आज की तारीख में देश के दो बड़ी स्टॉक एक्सचेंज बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज अपनी व्यवस्थाओं के अधीन एमएसएमई के लिए अलग से प्रकोष्ठ खोले हुए हैं लेकिन यह बड़े बरगद के नीचे छोटे पेड़ों के न फूलने फलने लायक परिस्थिति बनती है। पूर्व एमएसएमई मिनिस्टर नितिन गड़करी भी कुछ माह पहले राष्ट्रीय एमएसएमई स्टॉक एक्सचेंज बनाने की बात कर रहे थे लेकिन वह एक स्वतंत्र स्टॉक एक्सचेंज की बजाय इन बड़े बरगद रूपी बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज या नेशनल स्टॉक एक्सचेंज के अधीन ही बात कर रहे थे।
एमएसएमई को अगर लम्बी अवधि के हिसाब से पूंजीगत मजबूती देनी है और बड़ी कंपनियों के बराबर मैदान देना है तो उन्हें स्टॉक एक्सचेंज की मजबूती देनी पड़ेगी। लेकिन यह तब तक संभव नहीं है जब तक एमएसएमई का एक स्वतंत्र स्टॉक एक्सचेंज ना बने। पूरे देश के करीब 15% एमएसएमई यूपी से आते हैं और बिहार को जोड़ दें तो करीब एक चौथाई इन्हीं दोनों राज्यों से हैं। इसलिए अगर ऐसा स्टॉक एक्सचेन्ज कानपुर में बना दिया जाए तो दोनों राज्यों को इसका लाभ मिलेगा। मुंबई बड़े उद्यम का प्रतिनिधि और यूपी एमएसएमई का प्रतिनिधि पूंजीबाजार में करे तो भारत का आर्थिक संतुलन बनाया जा सकता है।
हालांकि आज भी छोटी कंपनियां स्टॉक एक्सचेंजों में खुद को सूचीबद्ध कर सकती हैं, लेकिन आमतौर पर वे बीएसई और एनएसई की पात्रता मानदंडों को पूरा करने में अपने आप को अक्षम पाती हैं। दुनिया भर में भी लगभग सभी प्रमुख पूंजी बाजारों ने एमएसएमई वर्ग के लिए एक अलग एक्सचेंज की आवश्यकता महसूस की है। 20 से अधिक देश अलग एसएमई बाजार संचालित करते हैं। बीएसई और एनएसई ने भी जो एमएसएमई के लिए अपना प्लेटफॉर्म लॉन्च किया उसके तहत सूचीबद्ध एमएसएमई बाद में बिना आईपीओ के ही शेयर बाजार के मेन बोर्ड में जा सकते हैं। यह सुविधा एमएसएमई आईपीओ के लिए एक नया रास्ता हैं और बड़ी कम्पनियों की तुलना में न्यूनतम अनुपालन और लागत के साथ लिस्टिंग का अवसर प्रदान करते हैं।
एमएसएमई एक्सचेंज की रूपरेखा पहली बार 2008 में सेबी द्वारा सोची गई थी और इस दिशा में एक प्रमुख कदम जनवरी 2010 में एमएसएमई के लिए प्रधान मंत्री टास्क फ़ोर्स द्वारा दी गई रिपोर्ट थी। इस रिपोर्ट में एमएसएमई एक्सचेंज की स्थापना की सिफारिश की गई थी। इसके बाद ही 2012 में, बीएसई और एनएसई में अलग प्लेटफार्म की स्थापना की गई। लेकिन इसका इलाज तभी होगा जब इसे बड़े स्टॉक एक्सचेंज से निकालकर एक स्वतंत्र संस्थान के रूप में स्थापित किया जायेगा।
एमएसएमई लिस्टिंग न केवल कंपनियों को लाभ प्रदान करेंगी बल्कि निवेशकों को भी लाभ देगी। साथ ही प्राइवेट इक्विटी निवेशकों के लिए एक निकास मार्ग प्रदान करने के साथ-साथ ESOP होल्डिंग कर्मचारियों को तरलता देंगी। इनकी लिस्टिंग ग्राहकों, आपूर्तिकर्ताओं, निवेशकों, वित्तीय संस्थानों और मीडिया के बीच इनकी सार्वजनिक छवि मजबूत करेगी जिससे इन्हें कई तरह के लाभ मिलेंगे।
विश्व स्तर पर आईपीओ बाजार ई-कॉमर्स, सोशल मीडिया और मोबाइल प्रौद्योगिकी फर्मों के साथ एक नई शुरुआत कर रहा है। जबकि भारत में ऐसा नहीं हो रहा है। कुछेक अपवाद को छोड़ यहां आज भी स्टार्टअप स्टॉक एक्सचेंज की जगह निजी इक्विटी निवेशकों के दरवाजे खटखटा रहे हैं। ये स्टार्टअप कंपनियां भारत में तो सूचीबद्ध नहीं है लेकिन विदेशों में सूचीबद्ध हो रही हैं। भारत में ऐसे कई स्टार्टअप और एमएसएमई हैं जिन्हें ग्रोथ कैपिटल की जरूरत है। बड़े स्टार्टअप तो आगे की पूंजी के लिए निजी इक्विटी निवेशकों को टैप कर सकते हैं, लेकिन छोटे लोगों और एमएसएमई के पास वर्तमान में पूंजी जुटाने के लिए सीमित विकल्प हैं। उनके लिए ही नहीं केवल, निवेशकों के लिए भी समर्पित एमएसएमई स्टॉक एक्सचेंज एक सकारात्मक कदम होगा। यदि ऐसा होता है तो एसएमई प्लेटफॉर्म स्टार्टअप को पूंजी जुटाने के लिए एक व्यावहारिक विकल्प के रूप में उभरेगा।
लघु एवं मध्यम उद्योगों के लिए समर्पित स्टॉक एक्सचेंज के अतिरिक्त सरकार को अन्य सुधार भी करना चाहिए। आज एमएसएमई के तहत मध्यम और सूक्ष्म उद्योगों के बीच बहुत बड़ा फासला है। 1 लाख रूपये की बिक्री और 250 करोड़ बिक्री करनेवालों को एक बास्केट में नहीं रखा जा सकता, अन्यथा सूक्ष्म उद्योग की रियायतें मध्यम वर्ग को ही ज्यादा मिलेगी। इससे एमएसएमई के उद्देश्य को चोट पहुचेगी। इसलिए यह जरुरी है कि एमएसएमई एक्स्चेन्ज के तहत माइक्रो एंटरप्राइजेज के लिए अलग से प्रकोष्ठ बनाया जाए ताकि उनका हित भी सुरक्षित रहे।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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