Modi in USA: मोदी ने दे दिया एजेंडा पत्रकारों के सवालों का जवाब

Modi in USA: भारत में विपक्षी दलों का हमेशा एक आरोप रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्रेस कांफ्रेंस नहीं करते, जिसमें पत्रकार उनसे सवाल पूछ सकें| वह जबसे प्रधानमंत्री बने हैं अपने मन की ही बात करते रहते हैं, जनता के मन की बात सुनते ही नहीं| उनका मानना है कि मीडिया उनसे जनता के मन की बात पर सवाल पूछना चाहता है, लेकिन वह मौक़ा नहीं देते| वह एकतरफा संवाद चला रहे हैं| बीच में इक्का दुक्का पत्रकार भी टीवी चैनलों की डिबेट में भाजपा प्रवक्ताओं से यही सवाल पूछते हैं कि प्रधानमंत्री मीडिया के कटघरे में खड़े क्यों नहीं होते|

यह सच है कि नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद कोई प्रेस कांफ्रेंस नहीं की, लेकिन इसकी भी एक पृष्ठभूमि है| 2002 में जब गोधरा काण्ड हुआ, जिसमें 59 हिन्दुओं को ट्रेन के अंदर बंद करके ज़िंदा जला दिया गया था, तो उसकी प्रतिक्रिया में गुजरात में हिंसा हुई| उस हिंसा की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के मीडिया ने एकतरफा रिपोर्टिंग की| उस रिपोर्टिंग का उद्देश्य तथ्य जनता के सामने रखना नहीं बल्कि व्यक्तिगत रूप से मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को हिंसा के लिए जिम्मेदार ठहराना था| मीडिया का एक वर्ग पत्रकारिता का धर्म निभाने की बजाए, विपक्षी दल की भूमिका निभा रहा था|

Modi in USA: pm Modi answers to the questions of journalists on the agenda

भाजपा विरोधी मीडिया के इस एक प्रभावशाली वर्ग से मिलीभगत करके विपक्षी दलों और वामपंथी प्रभाव वाले एनजीओ ने मोदी को देश और दुनिया में दंगाई के रूप में पेश किया| इसका प्रमाण यह है कि बाद में जब केंद्र में वामपंथियों के समर्थन से कांग्रेस की सरकार बनी, तो उन पत्रकारों को पद्मश्री से सम्मानित किया गया, जिन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि खराब करने में सक्रिय भूमिका निभाई थी|

वह रिपोर्टिंग कितनी एकतरफा थी, इसका एक प्रमाण यह है कि एकतरफा रिपोर्टिंग करने वाले एक पत्रकार ने बाद में सोहराबुद्दीन शेख की मुठभेड़ में मौत के सिलसिले में झूठी रिपोर्टिंग करने के लिए 2019 में कोर्ट से माफी माँगी| यह एक उदाहरण है कि उस समय पत्रकारों के एक वर्ग ने किस तरह तथ्यहीन और एकतरफा रिपोर्टिंग की थी| यह सच है कि उस समय की तथ्यहीन रिपोर्टिंग करने वालों में 99 प्रतिशत दिल्ली से गए पत्रकार थे। उन्होंने खुद को श्रेष्ठ मानते हुए स्थानीय पत्रकारों की तथ्यपरक रिपोर्टिंग को पूरी तरह से नकार दिया|

Modi in USA: pm Modi answers to the questions of journalists on the agenda

पत्रकारिता के इस कुरूप चेहरे के कारण नरेंद्र मोदी के मन में एजेंडा पत्रकारों के प्रति नफरत का भाव होना स्वाभाविक है| जिसे दिल्ली के मीडिया ने 2014 के चुनावों में भी दोहराया, जब ज्यादातर पत्रकार पत्रकारिता करने के बजाए राजनीतिक प्रवक्ताओं की तरह व्यवहार कर रहे थे| लेकिन चुनाव में फैसला देश की जनता को करना था, न कि कुछ पत्रकारों को| जनता इस तरह की पत्रकारिता के बारे में क्या सोचती है, उसका जवाब जनता के 2014 के चुनाव में तो दिया ही, सितंबर 2014 में न्यूयार्क के मेडिसन स्क्वायर में भी दिया, जब एक पत्रकार को मोदी विरोधी टिप्पणी करने पर वहां उपस्थित स्थानीय लोगों ने बुरी तरह लताड़ा और वहां से जाने के लिए कहा|

यह है मोदी की प्रधानमंत्री बनने के बाद प्रेस कांफ्रेंस नहीं करने की पृष्ठभूमि| लेकिन जो सवाल मीडिया का एक वर्ग पूछना चाहता है, उसका नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनने से पहले और बाद में भी कई बार जवाब दे चुके हैं। सवाल एक ही है कि उनके मुख्यमंत्री रहते और प्रधानमंत्री बनने के बाद उनके शासन में मुस्लिमों के साथ भेदभाव और उनका तथाकथित उत्पीड़न| बस यह एक ही सवाल है, जिसे मीडिया का वह वर्ग पूछना चाहता है, महंगाई, बेरोजगारी आदि तो हर प्रधानमंत्री से स्थाई सवाल होते हैं|

मुस्लिम उत्पीड़न के बारे में जो सवाल मीडिया का वह एक वर्ग पूछना चाहता है, उसे विपक्ष एक नहीं अनेक बार संसद में उठा चुका है| खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी संसद में दिए गए अपने भाषणों में विपक्ष के इन आरोपों का जवाब दे चुके हैं| ये सभी आरोप उसी एजेंडा और दुर्भावना से प्रेरित हैं, जो दुर्भावना 2002 में भी थी, इनमें तथ्यात्मक कुछ भी नहीं है| मीडिया के इसी वर्ग ने पिछले कुछ सालों में मुस्लिम उत्पीड़न के मनगढ़ंत आरोप को मानवाधिकार का मुल्लमा चढ़ा कर अन्तरराष्ट्रीय बाज़ार में बेचा है|

पिछले कुछ समय से मुस्लिम उत्पीड़न के साथ दलितों को भी जोड़ दिया गया है, ताकि खबरों के अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में मानवाधिकार हनन की थ्योरी को आसानी से बेचा जा सके| इसकी शुरुआत मोदी के प्रधानमंत्री के रूप में उनके पहले कार्यकाल में रोहित वैमूला के आत्महत्या केस से शुरू हुई थी, जब एक ओबीसी को दलित के रूप में पेश किया गया था| प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हर विदेश यात्रा के समय मीडिया का यह वर्ग एक्टिव हो जाता है| जहां मोदी की यात्रा होती है उस देश में भारत में मानवाधिकार के तथाकथित हनन की कहानियों को खूब बेचा जाता है|

इस बार भी मोदी के अमेरिका दौरे से पहले वहां के अखबारों और पत्रिकाओं में इस मुद्दे पर खूब लिखा गया| ऐसे मौकों पर भारत के विपक्ष की नकारात्मक भूमिका भी सामने आती है। इस बार भी आई जब विपक्ष के एक प्रमुख चेहरे ने प्रधानमंत्री के अमेरिका दौरे से पहले खुद अमेरिका जा कर मुस्लिम-दलित उत्पीड़न के मुद्दे को जोर शोर से उठाया| मुस्लिम दलित के साथ उन्होंने सिख भी जोड़ दिया था| हमेशा की तरह ऐसे मौकों पर पाकिस्तानी तत्व भी भारत के मुसलमानों का मुद्दा उठाने के लिए सक्रिय हो जाते हैं| वे खालिस्तानियों के आन्दोलन में भी बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते हैं, हर देश में भारत विरोधी प्रचार में आगे रहते हैं। यूरोप से लेकर अमेरिका तक उनका एक अपना नेटवर्क है|

अमेरिका की डेमोक्रेटिक पार्टी में ऐसे सांसदों की काफी संख्या है, जो भारत विरोधी प्रचार और भारत विरोधी गतिविधियों में हिस्सा लेते रहते हैं| हालांकि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मौजूदा डेमोक्रेटिक सरकार ने ही न्योता दिया है, इसके बावजूद दो डेमोक्रेटिक मुस्लिम सांसदों इलहान उमर और रशीदा तालिब ने यह कहते हुए अमेरिकन कांग्रेस में मोदी के भाषण का बॉयकॉट किया कि उनके शासन में मुस्लिम उत्पीड़न हो रहा है और पत्रकारों को काम नहीं करने दिया जा रहा| जब उन्होंने अपने बयान में पत्रकार शब्द का भी इस्तेमाल किया, तो आप समझ सकते हैं कि उनके भारत विरोधी बयान के पीछे कौनसी शक्तियां काम कर रही होंगी|

इलहान उमर अमेरिका में पाकिस्तानपरस्त राजनेता के तौर पर जानी जाती हैं| पिछले दिनों उन्होंने पाकिस्तान का दौरा भी किया था, अपने दौरे के दौरान वह पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में भी गई थी| भारत क्योंकि पाक अधिकृत कश्मीर को अपना भूभाग मानता है, इसलिए भारत ने उनके पाक अधिकृत कश्मीर के दौरे पर अपना विरोध जताया था| जिस प्रकार कुछ दिन पहले फिल्मकार जावेद अख्तर ने पाकिस्तान में अपने एक कार्यक्रम में भारत में मुसलमानों के उत्पीड़न का मुद्दा उठाए जाने पर कहा था कि वे भारत के बारे में गलत प्रचार करना बंद करें, भारत के मुसलमान पाकिस्तान के मुसलमान से ज्यादा खुश हैं|

ठीक उसी तरह भारतीय अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष आतिफ रशीद ने अमेरिकन सांसद इलहान उमर को मुहं तोड़ जवाब दिया है| इलहान उमर के ट्विट को टैग करते हुए उन्होंने लिखा कि वह भारत के अल्पसंख्यक हैं, लेकिन वह नरेंद्र मोदी के शासन में अपनी धार्मिक आज़ादी और अपनी पहचान के साथ आज़ादी से रहते हैं| भारत के संसाधनों में उन्हें भी बराबर का हक है, वह बिना किसी डर के बोलते हैं| आतिफ रशीद ने इलहान उमर को सलाह दी है कि उन्हें अपना नफरती एजेंडा बंद करना चाहिए|

वैसे तो जावेद अख्तर और आतिफ रशीद ने उन सभी सवालों का जवाब दे दिया है, जो भारतीय मीडिया का एक वर्ग पिछले नौ सालों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से प्रेस कांफ्रेंस में पूछने को बेताब है| लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद भी उनकी यह साध पूरी कर दी है। नरेंद्र मोदी को बताया गया था कि अमेरिका में भारत में मानवाधिकार हनन, खासकर अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न के मुद्दे को मीडिया में बहुत ज्यादा उठाया जा रहा है, तो नरेंद्र मोदी ने वहां प्रेस कांफ्रेंस में इन आरोपों का जवाब देने का फैसला किया|

अमेरिकन राष्ट्रपति जो बाइडेन के साथ साझा प्रेस कांफ्रेंस में उन्होंने इस सवाल का जवाब दे दिया| उनसे भारत के लोकतंत्र पर मंडराते खतरे के बादल और अल्पसंख्यकों के मानवाधिकार हनन पर सवाल पूछा गया था| अमेरिकन मीडिया के साथ साथ विपक्ष के एक बड़े नेता ने भी पिछले हफ्ते ही अमेरिका में इन दोनों मुद्दों को उठाया था| प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने जवाब में कहा कि लोकतंत्र भारत की राष्ट्रीय पहचान है और साझा विरासत भारत का अभिन्न अंग है, जो उनकी रगों और आत्माओं से बहता है| लोकतंत्र भारत के संविधान और सरकार में प्रकट वास्तविकता है। भारत में हर सरकार संविधान के आधार पर चलती है, जिसे सैकड़ों सालों की लोकतांत्रिक परंपरा के आधार पर तैयार किया गया है| भारत में किसी भी आधार पर भेदभाव नहीं है। लोकतंत्र भारतीयों की रग रग में है, और लोकतंत्र के माध्यम से सरकार भारत के सभी नागरिकों की आकांक्षाओं को पूर्ण करने के लक्ष्य को प्राप्त करने की तरफ आगे बढ़ रही है|

अल्पसंख्यकों के प्रति भेदभाव या उत्पीड़न के आरोपों को नकारते हुए मोदी ने कहा कि भेदभाव का कोई सवाल ही नहीं है। उनकी सरकार हर किसी को साथ लेकर आगे बढ़ने में विश्वास रखती है, संसाधनों का लाभ बिना किसी धार्मिक या जातीय भेदभाव के, सभी को मिलता है| मोदी ने सब का साथ, सब का विश्वास का अपना नारा भी अपने जवाब में दोहराया| भारत में जो यह प्रचार किया जा रहा था कि अमेरिका भारत में मानवाधिकारों और प्रेस की आज़ादी को लेकर चिंतित है, उनकी चिंता भी खुद राष्ट्रपति बाइडेन ने दूर कर दी, जब उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के साथ अपने शुरुआती बयान में कहा कि प्रेस की स्वतंत्रता, धार्मिक स्वतंत्रता, सहिष्णुता, विविधता भारत की खूबी है, जो अब दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश है|

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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