Parliament Inauguration: स्वर्ग जैसे शासन का आश्वासन, फिर भी विपक्ष विहीन उद्घाटन
सेंगोल रूपी कथित राजदंड को स्थापित करके प्रधानमंत्री मोदी ने स्वर्ग जैसे शासन का आश्वासन तो दे दिया लेकिन 20 दलों के बहिष्कार के कारण यह उद्घाटन लगभग एक पक्षीय आयोजन बनकर रह गया।

यह 1912-13 की बात है। उस समय 1911 में किंग जार्ज पंचम का दिल्ली दरबार सज चुका था और राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली लाने का निर्णय भी हो चुका था। भारत के वाइसरॉय और गवर्नर जनरल के लिए नया भवन और सचिवालय पर काम शुरु हो चुका था। उसी समय यह निर्णय भी हुआ कि एक इम्पिरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल बिल्डिंग का निर्माण भी किया जाएगा। 1909 में ब्रिटिश पार्लियामेन्ट ने निर्णय लिया था कि कानून बनाने में भारत के लोगों को भी शामिल किया जाएगा। इसे बहुचर्चित मार्ले मिन्टो रिफॉर्म के नाम से भी जाना जाता है।
ब्रिटिश पार्लियामेन्ट की तर्ज पर यहां भी हाउस ऑफ लॉर्ड्स और हाउस ऑफ कॉमन्स जैसे दो चैम्बर बनाने का निर्णय हुआ था जिसमें एक में राजा रजवाड़ों तथा विशिष्ट लोगों को नियुक्त किया जाना था तो दूसरे में सीमित मताधिकार के जरिए जनप्रतिनिधियों को शामिल करना था। इसे लागू करने से पहले एक पार्लियामेन्ट का होना जरूरी था। इसलिए 1912-13 में नयी दिल्ली की रचना कर रहे दो ब्रिटिश वास्तुकार एडविन लुटियन और हर्बर्ट बेकर को जिम्मेदारी दी गयी कि वो इसके लिए अपना अपना डिजाइन प्रस्तुत करें।
एडविन लुटियन जहां गोल घेरे में इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल हाउस (बाद में पार्लियामेन्ट) का भवन बनाना चाहते थे, वहीं हर्बर्ट बेकर इसे त्रिभुज आकार में निर्मित करना चाहते थे। हर्बर्ट बेकर उसे वहीं बनाना चाहते थे जहां आज पुराना संसद भवन है जबकि लुटियन इसे कहीं और बनाना चाहते थे। खैर दोनों की एक एक बात मान ली गयी जहां लुटियन का गोल घेरे वाला डिजाइन फाइनल हुआ वहीं बेकर जहां बनाना चाहते थे, उस जगह पर ही उस भवन को बनाने का निर्णय किया गया।
फरवरी 1921 में उस भवन का शिलान्यास ड्यूक ऑफ कनॉट प्रिंस आर्थर के हाथ से करवाया गया। करीब सात साल में यह भवन बनकर तैयार हुआ और 1927 में इसका उद्घाटन किया गया। ब्रिटिश पार्लियामेन्ट ने भले ही भारत के लोगों को कानून निर्माण में शामिल करने के लिए इस नये भवन को बनाया था लेकिन 1929 में भगत सिंह ने इसमें घुसकर बम फेंक दिया जो इस बात की निशानी था कि भारत के लोग ब्रिटिश रहमो करम पर अपनी भागीदारी नहीं चाहते थे। हालांकि इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल हाउस के उद्घाटन के बाद हुए रिसेप्शन में राजस्थान और पंजाब के कई रजवाड़ों को निमंत्रित किया गया था। अपनी अपनी रॉल्स रॉयस में पगड़ी और साफा बांधे राजे रजवाड़े आये भी लेकिन क्रांतिकारियों और आम जनता के मन मानस में तो कुछ और ही चल रहा था। वह था पूर्ण स्वराज।
खैर, इतिहास के उतार चढाव के साथ 1952 में बतौर पार्लियामेन्ट (संसद) के रूप में लुटियन्स के उसी गोल घर को स्वीकार कर लिया गया और स्वतंत्रता के लगभग सत्तर साल उसी गोल घर से भारत के विधायी कार्य संपन्न होते रहे। समय के साथ वह भवन धीरे धीरे कमजोर और अप्रांसगिक भी होने लगा था। यह भी एक संयोग ही कहा जाएगा कि जिस समय इस संसद का उद्घाटन हुआ और उसमें रिसेप्शन रखा गया उस समय ही इसकी छत का एक टुकड़ा टूटकर गिर गया था। इसके बाद कई ऐसे उदाहरण बताये जाते हैं जब इस भवन की भीतरी कमजोरी उजागर हो जाती थी।
इसलिए यूपीए सरकार के समय में लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने नये संसद भवन की चर्चा शुरु की थी। हालांकि उस समय सरकार ने इस पर बहुत ध्यान नहीं दिया। लेकिन प्रस्ताव को एकदम से खारिज भी नहीं किया गया। नये संसद भवन की जरूरत तो थी ही इसलिए मोदी के दूसरे कार्यकाल में 2020 में इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गयी। लुटियन्स दिल्ली में कई बड़े निर्माण का प्रस्ताव किया गया। इसमें थल सेना भवन को यहां से बाहर ले जाने, शास्त्री भवन, कृषि भवन और उद्योग भवन को तोड़कर उनकी जगह नया भवन बनाने तथा इंदिरा गांधी कलाकेन्द्र की जमीन पर केन्द्रीय मंत्रालय के कार्यालय बनाने का काम सेन्ट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के रूप में शुरू हुआ। इस परियोजना के तहत उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री निवास को भी राष्ट्रपति भवन परिसर में ही लाने का प्रस्ताव था।
सिर्फ वाइसरॉय हाउस (राष्ट्रपति भवन) को छोड़कर सेन्ट्रल विस्टा प्रोजेक्ट पूरा होने पर लुटियंस के सभी निर्माण धरोहर में बदल दिये जाएंगे। पार्लियामेन्ट बिल्डिंग के बाद वर्तमान नार्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक को भी म्यूजियम में परिवर्तित कर दिया जाएगा जहां अभी प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, रक्षामंत्री और वित्त मंत्री के कार्यालय हैं। राजपथ को कर्तव्यपथ बनाकर उसका कायाकल्प किया ही जा चुका है।
लेकिन कांग्रेस और उसके अन्य समान विचारधारा वाले दल पहले दिन से इस पूरी सेन्ट्रल विस्टा परियोजना को फिजूलखर्ची बताकर इसका विरोध करते आ रहे हैं। कांग्रेस या उसके सहयोगी दलों को यह समस्या क्यों है, इसका कोई ठोस कारण भी नजर नहीं आता। प्रस्ताव तो उनकी ही सरकार में लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार ने ही दिया था। केवल प्रस्ताव ही नहीं दिया था बल्कि शहरी विकास मंत्रालय को इस संबंध में 2012 में उनके ओएसडी की ओर से पत्र भी लिखा गया था। उस पत्र में कहा गया था नया संसद भवन स्पीकर की प्राथमिकता में है और उन्होंने इसकी अनुमति भी दे दी है।
बहरहाल कांग्रेस तथा उसके साथ कुछ और दलों का विरोध अंत तक खत्म नहीं हुआ। अब जबकि उद्घाटन हो गया है तब एनसीपी नेता सुप्रीया सुले कह रही हैं कि उन्हें वाट्सएप पर निमंत्रण भेजा गया था। बात केवल विपक्ष के नेताओं को बुलाने की ही नहीं है। भारतीय जनता पार्टी की नेता और पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन को मात्र 24 घण्टे पहले सूचित किया गया कि वो कार्यक्रम में शामिल हों। अगर इन बातों में सच्चाई है तो इससे इतना जरूर समझ में आता है कि लोकसभा सचिवालय की ओर से विपक्षी दलों को ही नहीं अन्य जरूरी लोगों को बुलाने में भी कोताही बरती गयी। मानों सबकुछ बहुत हड़बड़ी में और जल्दी जल्दी हो गया। जब विपक्ष ने बहिष्कार की बात की तो सत्ता पक्ष की ओर से भी किसी को मनाने या बुलाने का प्रयास भी नहीं किया गया। उल्टे भाजपा समर्थक विपक्ष को ऐसे 'राक्षस' की संज्ञा देकर ताना मारने लगे जो 'दैवीय कार्य' से खुद ही बहिष्कार करके चला गया।
एक ओर लोकसभा में राजदंड को स्थापित करके स्वर्ग जैसे शासन का आश्वासन और दूसरी ओर अधिकांश विपक्षी दलों का ऐसे ऐतिहासिक मौके पर बहिष्कार किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए उचित नहीं, भले ही सत्ता में कोई भी बैठा हो। आज भले ही हर्बर्ट बेकर की वह अधूरी इच्छा पूरी हो गयी जो उसने 1912 में जताई थी कि काउंसिल हाउस त्रिकोणीय आकार में बनाया जाना चाहिए, लेकिन एकांगी उत्सव ने संपूर्ण विश्व को स्वस्थ संदेश नहीं दिया है। नयी संसद की दीवार पर जो 'उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुंबकम्' का संदेश लिखा है, उसका उसके उद्घाटन में ही उल्लंघन हो गया। उस उदार चरित्र का प्रदर्शन न सत्तापक्ष की ओर से दिखा, न विपक्ष की ओर से, जो इस महत्त्वपूर्ण मौके पर उन्हें करना चाहिए था।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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