Madhya Pradesh: जीत के अति आत्मविश्वास से नीरस होता आम चुनाव
Madhya Pradesh: मध्य प्रदेश में इस बार का लोकसभा चुनाव नीरस होता जा रहा है। प्रत्याशियों की घोषणा के बावजूद पार्टी कार्यालयों में पसरा सन्नाटा, कार्यकर्ताओं की उदासीनता, बैनर-झंडों से लेकर ढोल-धमाकों का अभाव यह इंगित कर रहा है कि लोकतंत्र के सबसे बड़े पर्व का उत्साह कहीं न कहीं ठंडा पड़ा है।
अभी कुछ महीनों पहले ही विधानसभा चुनाव से फ्री हुई जनता हो या पार्टियों के कार्यकर्ता, सब ठंडे पड़े हैं। जनता और कार्यकर्ता के बीच "आएगा तो मोदी ही" जैसे नारे ने नकारात्मक असर डाला है।

सत्ता में वापसी की असीम संभावनाओं के उत्साहित भाजपा के सामने बिखरे और अनुशासनहीन विपक्ष के चलते यह उदासीनता बढ़ती जा रही है। चहूँओर यही चर्चा है कि "आएगा तो मोदी ही"। ऐसे में सबसे बड़ा संभावित डर यह है कि यदि यही उदासीनता मतदान के दिन भी रही तो मतदान प्रतिशत अपने निचले स्तर तक जा सकता है जो लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है।
"आएगा तो मोदी ही" और "अबकी बार 400 पार" जैसे नारे विपक्ष को मनोवैज्ञानिक तौर पर तोड़ने के लिए आवश्यक हो सकते हैं किंतु ये अब जनता के उत्साह को भी कम कर रहे हैं। वैसे भी जब कांग्रेस में डेली बेसिस पर टूट हो रही हो और जीत के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हों तो चौराहों पर होने वाली चुनावी चर्चायें बंद होने से भी नीरसता का माहौल है।
हर बूथ से 370 कांग्रेसियों को तोड़ने की कवायद
यूं तो प्रदेश में भाजपा के संगठन और सरकार की मजबूती किसी से छुपी हुई नहीं है, इसके बाद भी जिस तरह थोक के रूप में कांग्रेसियों को भगवा गमछा पहनाया जा रहा है, वह अब भाजपा कार्यकर्ताओं के ही गले नहीं उतर रहा। असंतोष अधिक न बढ़े इसलिए मंत्री कैलाश विजयवर्गीय से लेकर पूर्व मंत्री भूपेंद्र सिंह तक अपने अंदाज में भाजपा कार्यकर्ताओं को समझा रहे हैं। हालांकि इस समझाइश से भी विवाद की स्थिति बन रही है।
दरअसल, एक जनसभा को संबोधित करते हुए भूपेंद्र सिंह गृह मंत्री अमित शाह के हवाले से कह गए कि जब भाजपा में 15 साल रहने वाले कार्यकर्ता को कुछ नहीं मिला तो कांग्रेस से आने वाले नेताओं को 15 दिनों में क्या मिलेगा? अब भूपेन्द्र सिंह अपनी पार्टी की खूबियां बता रहे थे या खामियां गिना रहे थे, यह तो वो ही जाने लेकिन यह बात उनकी पार्टी के लिए ही नकारात्मक संकेत करती है।
हालांकि कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आनेवाले नेता घाटे में नहीं हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके गुट के नेताओं से लेकर कांग्रेस छोड़कर आए पूर्व कांग्रेसी और वर्तमान में दमोह से लोकसभा प्रत्याशी राहुल लोधी को भाजपा कार्यकर्ताओं से अधिक ही मिल चुका है। अब सुरेश पचौरी, संजय शुक्ला, विशाल पटेल से लेकर छिंदवाड़ा से कमलनाथ का दामन छोड़कर आए कांग्रेसियों को देर-सवेर भाजपा सरकार में कोई न कोई पद देना ही पड़ेगा क्योंकि ये सभी अपने क्षेत्रों में कांग्रेस की सियासी ताकत के झंडाबरदार थे।
फिर जिस प्रकार अभी भी बड़ी संख्या में कांग्रेसी भाजपा में शामिल हो रहे हैं, उससे कांग्रेस में भगदड़ जैसी स्थिति बन गई है। आलम यह है कि सुबह कांग्रेस कार्यालय में बैठकें लेने वाले नेताजी शाम को भगवाधारी होकर भाजपा की बैठकों में दिखने लगते हैं। भाजपा ने भी हर बूथ से 370 कांग्रेसियों को अपने पाले में लाने की तैयारी कर ली है ताकि प्रधानमंत्री के "भाजपा 370 पार" के नारे को चरितार्थ किया जा सके।
इससे बूथों पर कांग्रेस की हिम्मत भी पस्त होगी और जनता में भी भाजपा की सियासी ताकत का संदेश जाएगा। हालांकि इस पूरी प्रक्रिया के चलते भाजपा कार्यकर्ताओं में क्या और कैसा संकेत जाएगा तथा भविष्य में "पार्टी विथ डिफ़्रेंस" कैसी दिखेगी, यह भी सामने आ जाएगा।
लाखों में हो रहे जीत के दावे
केंद्र सरकार द्वारा सीएए के नोटिफ़िकेशन के बाद सिंधी समाज के बड़े नेता शंकर लालवानी को भाजपा नेतृत्व ने इंदौर से पुनः प्रत्याशी बनाया तो ऐसा लगा था कि जनता में उनकी छवि और पिछली बार लहर में उनकी जीत का जो मार्जिन था, वह इस बार कम होगा। चूंकि उनके साथ शहर के बड़े नेता भी बेमन से खड़े हैं इसलिए भी उन्हें अतिरिक्त मेहनत की आवश्यकता थी किंतु कांग्रेस ने अक्षय कांति बम की उम्मीदवारी घोषित कर भाजपा ने इंदौर में "अबकी बार आठ लाख पार" का नारा लगा दिया है।
गौरतलब है कि पिछले लोकसभा चुनाव में लालवानी कांग्रेस के मजबूत प्रत्याशी पंकज संघवी से पांच लाख से ऊपर वोटों से जीते थे जबकि इस बार कांग्रेस ने ऐसा प्रत्याशी दिया है जिसके राजनीतिक जीवन का यह पहला चुनाव है और जिसे कांग्रेस के बचे-खुचे बड़े नेताओं ने "बलि का बकरा" बना दिया है। इसी प्रकार भाजपा का गढ़ बने चुके भोपाल में ब्राह्मण प्रत्याशी के सामने कांग्रेस के वैश्य उम्मीदवार की हार की भविष्यवाणी भी लाखों में हो रही है जबकि देखा जाए तो भोपाल में वैश्य और मुस्लिम का गठजोड़ भाजपा के लिए परेशानी खड़ी कर सकता है।
परंतु कमजोर संगठन, हवा-हवाई प्रदेश अध्यक्ष और साथ छोड़ रहे कार्यकर्ताओं के चलते जनता तक कांग्रेस की पकड़ नहीं बन पा रही है। कई बूथों पर बैठने के लिए कार्यकर्ता भी नहीं बचे हैं कांग्रेस में। वहीं भाजपा के उत्साह का आलम यह है कि वह इस बार छिंदवाड़ा का "कमलनाथ" तिलिस्म भी तोड़ने की जिद पाले बैठी है। पूरी सरकार ने वहां डेरा डाल लिया है। भाजपा के लिए अभेद इस सीट पर अब भाजपाई जीत के दावे लाखों में किए जा रहे हैं।
कांग्रेस के बड़े नेताओं से कितनी आस?
कांग्रेस नेतृत्व ने न चाहते हुए भी राजगढ़ से दिग्विजय सिंह और रतलाम-झाबुआ से कांतिलाल भूरिया जैसे बड़े नेताओं को चुनावी मैदान में उतार कर कार्यकर्ताओं में जोश भरने और भाजपा से लड़ने का दम दिखाया है किंतु चुनावी बिसात पर यह कदम कितना सही होगा, इसका निर्णय चुनाव परिणाम के दिन हो जाएगा। चूंकि अभी खंडवा से कांग्रेस प्रत्याशी की घोषणा नहीं हुई है अतः पूर्व प्रदेशाध्यक्ष अरुण यादव को भी यहां से चुनाव लड़ना पड़ सकता है जबकि वे दावेदारी सिंधिया के सामने गुना से कर रहे थे।
अपनी परंपरागत खंडवा सीट छोड़कर गुना की मांग करना नेतृत्व को समझ आ गया था कि सिंधिया जैसे बड़े नेता से हार भी निजी कद तो बढ़ा ही देगी। फिर दिग्विजय सिंह को भी अरुण यादव का अपने क्षेत्र में आना नागवार गुजरता क्योंकि यदि अरुण यादव की जीत होती तो उनके बेटे जयवर्धन सिंह का क्षेत्र में राजनीति करना और स्थापित होना, दोनों खतरे में आ जाता।
अब जबकि गुना से कांग्रेस ने राव यादवेंद्र सिंह उतार दिया है तो पार्टी अरुण यादव को खंडवा से चुनाव लड़ने के लिए बाध्य कर सकती है। बाध्य तो मंदसौर से मीनाक्षी नटराजन को भी किया जा सकता था किंतु राहुल खेमे की होने के चलते शायद किसी की हिम्मत न हुई हो।
इन सबमें सवाल यह उठता है कि क्या ये बड़े नेता अपनी सीट निकाल सकते हैं? संभव है और नहीं भी। सभी अपने सियासी जीवन की अंतिम लड़ाई लड़ने जा रहे हैं और इसमें हार इनके सियासी जीवन का अंत कर देगी। लेकिन समस्या वही है। जनमानस में घर करता भाजपायी नैरेटिव व कांग्रेस कार्यकर्ताओं का अभाव चुनाव को नीरस बना रहा है जिसके चलते ये भी असमंजस में हैं।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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