Madhya Pradesh Elections: अजब एमपी की गजब पॉलिटिक्स

Madhya Pradesh Elections: कुछ साल पहले एमपी टूरिज्म का एक विज्ञापन आया था जिसमें बताया जाता था कि एमपी अजब है, सबसे गजब है। इस समय मध्य प्रदेश की राजनीतिक दशा बिल्कुल उस टूरिज्म डिपार्टमेन्ट के विज्ञापन जैसी हो गयी है। दो दलीय राजनीति के सिरमौर मध्य प्रदेश में इस बार के विधानसभा चुनाव में अजब गजब वाली स्थिति ही उत्पन्न हो गई है। एक ओर जहां भाजपा दूल्हे का नाम लिये बिना बारात सजाने में लगी है वही कांग्रेस में चुनावी दूल्हा तो तय है लेकिन बारातियों का फैसला नहीं हो पा रहा है।

भाजपा ने जहां आचार संहिता घोषित होते ही 57 प्रत्याशियों की चौथी सूची जारी कर दी है वहीं कांग्रेस अब तक नामों पर ही आम सहमति बनाने के प्रयास में है। हां, कांग्रेस में मुख्यमंत्री के चेहरे को लेकर कोई विवाद नहीं है और निर्विवाद रूप से अभी तक पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ही मुख्यमंत्री का चेहरा हैं जबकि भाजपा ने कार्यकर्ता आधारित चुनाव लड़ने के ऐलान के बाद मुख्यमंत्री के चेहरे पर संशय बढ़ा दिया है।

Madhya Pradesh Elections 2023 bjp congress politics of MP

तीन केंद्रियों मंत्रियों सहित 4 सांसद और राष्ट्रीय महासचिव के अलावा मुख्यमंत्री पद के कथित दावेदार 4 से 5 कैबिनेट मंत्रियों सहित वर्तमान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को टिकट देकर भाजपा नेतृत्व ने मैदान खुला रखा है। यदि पुनः भाजपा की सरकार बनती है तो सबसे अधिक राजनीति मुख्यमंत्री पद को लेकर होना तय है। राजनीति तो ख़ैर अभी भी हो रही है क्योंकि जैसे-जैसे भाजपा प्रत्याशियों का ऐलान कर रही है, टिकट के संभावित उम्मीदवार बग़ावत पर उतर आए हैं। कटनी से भाजपा की अधिकृत पूर्व महापौर प्रत्याशी ज्योति विनय दीक्षित ने चौथी सूची आते ही अपने सैकड़ों समर्थकों के साथ भाजपा को अलविदा कह दिया है। ज्योति विनय दीक्षित को विजयराघोगढ़ के विधायक और पूर्व मंत्री संजय पाठक का करीबी माना जाता है। बग़ावत के समाचार अन्य स्थानों से भी हैं जो भाजपा के लिए शुभ संकेत नहीं है।

भाजपा संगठन इस बग़ावत की धार को कैसे कुंद करता है यह देखना दिलचस्प होगा किंतु एक बात तो तय है कि अब जबकि मध्य प्रदेश में मतदान के मात्र 37 दिन शेष हैं, भाजपा ने अधिकृत प्रत्याशियों को चुनाव प्रचार और जनता के बीच जाने का समय दिया है जबकि कांग्रेस की ओर से टिकट की आस लगाए प्रत्याशी हाईकमान का मुंह ताकने को विवश हैं। ऐसे संकेत मिले हैं कि अभी पितृ पक्ष में कांग्रेस प्रत्याशियों की सूची होल्ड पर ही रहेगी। अर्थात नवरात्रि में सूची आने के बाद अधिकृत कांग्रेस प्रत्याशियों के पास चुनाव प्रचार हेतु एक माह से भी कम समय रहेगा।

अब इस एक माह में वह पहले अपनी ही पार्टी में गुटबाजी को रोकेगा, संभावित भीतरघात से बचने के लिए डैमेज कंट्रोल करेगा और फिर जनता के बीच जाकर वोट मांगेगा। यह स्थिति ठीक ऐसी ही है मानो व्यक्ति ने स्वयं को राजा तो घोषित करवा दिया किंतु उसके मंत्रिमंडल में कौन होगा इसका अभी उसे ही पता नहीं है।

प्रदेश के दो बार मुख्यमंत्री रहे दिग्विजय सिंह को लेकर भी कांग्रेस की उहापोह सार्वजनिक हो गई है। संघ के गढ़ शाजापुर जिले में कांग्रेस सांसद राहुल गांधी की आमसभा में दिग्विजय सिंह दूसरी पंक्ति में खड़े नजर आए मानो उनका चेहरा पार्टी आगे करना ही नहीं चाहती हो। दरअसल, भाजपा नेतृत्व चाहता है कि दिग्विजय सिंह की चुनावी सक्रियता जनता को दिखे ताकि उनकी कार्यशैली, उनका विकासहीन कार्यकाल और उनके हिंदू विरोधी बयानों को आधार बनाकर कांग्रेस को बैकफुट पर लाया जा सके। कांग्रेस भी भाजपा की मंशा को समझती है अतः उसने दिग्विजय सिंह को पर्दे के पीछे ही रखा है।

इसके अलावा दिग्विजय सिंह के समर्थकों को लेकर भी कांग्रेस सतर्क है। ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल होने के बाद अब कांग्रेस में मुख्यतः दो ही क्षत्रप शेष हैं। एक कमलनाथ और दूसरे दिग्विजय सिंह। शेष सुरेश पचौरी, अजय सिंह राहुल, अरुण यादव, कांतिलाल भूरिया जैसे पुराने क्षत्रपों ने इनकी शरण में आना उचित समझा है जिससे इनके समर्थक भी अब 'राजाजी' और कमलनाथ में बंट गए हैं।

जैसे दूध का जला छांछ भी फूंक-फूंक कर पीता है, वैसे ही कांग्रेस आलाकमान दिग्विजय सिंह को लेकर अति सावधान है। 2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के जितने नेता बागी बनकर निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरे थे, उनमें 60 प्रतिशत से अधिक दिग्विजय सिंह के कोटे से थे और कांग्रेस 2008 के मुकाबले 13 सीटें गंवाकर मात्र 58 सीटों पर सिमट गई थी।

2018 में ज्योतिरादित्य सिंधिया के चलते कांग्रेस में ऐसी स्थिति नहीं बनी किन्तु अब पुनः दिग्विजय सिंह के खास समर्थक टिकट मांग रहे हैं और यदि उन्हें टिकट नहीं मिला तो कईयों ने निर्दलीय मैदान में उतरने का मन बना लिया है। कांग्रेस की यही उहापोह संभवतः प्रत्याशियों की सूची को सार्वजनिक करने से रोक रही है और मैराथन बैठकें कर 'आम सहमति' बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं।

2018 में मुख्यमंत्री बने कमलनाथ यदि 5 वर्षों तक सत्ता चला लेते तो जनता के समक्ष उनके कार्यकाल की समीक्षा का अवसर भी होता किन्तु मात्र डेढ़ वर्ष में ज्योतिरादित्य सिंधिया की बगावत से उन्हें अपदस्त कर शिवराज सिंह चौहान पुनः मुख्यमंत्री बने। कांग्रेस और कमलनाथ को लगता है कि यही एक कारण उन्हें जनता के बीच भावनात्मक जीत दिलवा देगा जबकि ऐसा नहीं है। एक ओर जहां भाजपा बीते तीन माह से चुनावी मोड में है और केंद्रीय मंत्रियों की फौज प्रदेश में उतर चुकी है, वहीं कांग्रेस न तो सड़क पर दिख रही है और न ही जनता के बीच।

इतने पर भी कमलनाथ का अति-आत्मविश्वास कहीं न कहीं यह दर्शा रहा है कि वे इस मुगालते में हैं कि जनता उनकी मुख्यमंत्री पद से विदाई का बदला भाजपा को हरा कर लेगी जबकि ऐसा नहीं है। भाजपा के समक्ष असल चुनौती कांग्रेस नहीं बल्कि पार्टी के भीतर घर कर गई 'कांग्रेसी संस्कृति' है जिसके चलते गुटबाजी, भितरघात, पार्टी संगठन की अनदेखी, क्षेत्रों में क्षत्रप राजनीति करना आदि भाजपा में आ गई हैं। फिर इतने वर्षों की एंटी-इन्कंबेंसी भी भाजपा के विरोध में जा सकती है अन्यथा तो मध्य प्रदेश में अभी तक भाजपा के पक्ष में ही माहौल है बशर्ते 'चेहरे' को लेकर स्थिति साफ हो जाए।

चंबल, महाकोशल और विंध्य क्षेत्र में जहां कांग्रेस मजबूत दिख रही है वहीं मालवा, निमाड़, मध्य भारत और बुंदेलखंड में भाजपा का दम दिखाई देता है। अब सारा फोकस इस बात पर है कि कांग्रेस की ओर से प्रत्याशी कौन हो? क्योंकि न तो भाजपा रण छोड़ेगी और न ही कांग्रेस को वाकओवर देगी। फिलहाल तो भाजपा के अधिकृत प्रत्याशी घर-घर जाकर कांग्रेस पर बढ़त बना चुके हैं जिसका नुकसान कांग्रेस को होना तय है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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