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मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव 2018: आत्ममुग्धता के रथ पर सवार शिव और कमल

By राजेश सिरोठिया, वरिष्ठ पत्रकार
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भोपाल। मध्यप्रदेश में सूबे की विधानसभा चुनावों को लेकर भाजपा और कांग्रेस आत्ममुग्धता की सारी ऊंचाईयों को पार कर गए हैं। पंद्रह साल लंबे भाजपा के शासन उपजे सत्ता विरोधी मतों को कांग्रेस के मुखिया कमलनाथ ने अपना वोट बैंक मानकर अपनी जीत तय मान ली है तो भाजपाई मुख्यमंत्री को भरोसा है कि सरकार को रिजेक्ट कर रहे वोट कांग्रेस को कतई सिलेक्ट नहीं करेंगे। रिजेक्शन का वोट किसी के सिलेक्शन के वोट में तब्दील नहीं होने वाला।

madhya pradesh assembly elections 2018 shivraj singh chouhan bjp

तमाम रोष और आक्रोश के इजहार के बाद अंतत: यह वोट वापस भाजपा के वोट खजाने में आ जाएगा। फिर शिवराज से लेकर नरेंद्र मोदी तक और उनकी पार्टी के अमित शाह से लेकर कैलाश विजयवर्गीय जैसे रणनीतिकारों को लगता है कि बीते चार साल में मोदी जी ने देश में भाजपा के लिए नया वोट बैंक खड़ा है। यह मतादाताओं का वह वर्ग है जिसने इसके पहले भाजपा को कभी वोट नहीं दिया।

2013 में विधानसभा और 2014 में लोकसभा में भी नहीं मिला था। फिर मप्र में शिवराज ने भी मोदी के नक्शेकदम चलते हुए मतदाताओं का नया वर्ग खड़ा तो किया है। इसी के चलते ही शिवराज जन आशीर्वाद यात्रा पर यह मानकर निकल पड़े हैं कि हो न हो यही जनता जनार्दन उनकी अगुआई में जीत की हेट्रिक और भाजपा का विजयी चौका लगवाएंगे। शिवराज की यात्रा में उमड़ती भीड़ में कितनी स्वस्फूर्त है कितनी क्रत्रिम (बकौल कांग्रेस पूर्णत: प्रायोजित)इसका आकलन होना शेष है, लेकिन इस भीड़ ने अमित शाह जैसे नेता को भी चकित कर दिया है।

kamal

पिछली बार उन्होंने पार्टी के रूठे कार्यकर्ताओं में उत्साह भरने की गरज से ऐलान किया था कि इस बार भाजपा संगठन के बूते (चेहरे के सहारे नहीं ) चुनाव लड़ेगी। लेकिन जब कांग्रेस में चेहरे पर सवाल खड़े करने वालों से ज्योतिरादित्य सिंधिया ने यह दलील दी कि भाजपा भी बगैर चेहरे के चुनाव लड़ रही है तो कांग्रेस को लेकर यह सवाल क्यों? पर अमित शाह ने साफ कर दिया है कि शिवराजजी के लोकप्रिय चेहरा भाजपा का चेहरा होगा। लेकिन बावजूद इसके कांग्रेस को नहीं लगता है सीएम प्रोजेक्ट करने की जरूरत है।

कमलनाथ को अपने राजनीतिक अनुज और मध्यप्रदेश में कांग्रेस की राजनीति पर सबसे गहरी पकड़(?) रखने वाले दिग्विजय सिंह पर अटूट भरोसा है। और उन्हीं की मैदानी पकड़ के भरोसे कमलनाथ कांग्रेस के बैक आफिस में बैठकर रणनीति को अंजाम दे रहे हैं। कमलनाथ योद्धा की भूमिका के बजाए फैसीलिटेटर की भूमिका में ही कांग्रेस को जिताकर खुद को मुख्यमंत्री मान चुके हैं।

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कांग्रेस के गुजराती रणनीतिकार दीपक बावरिया से लेकर 2013 में कांग्रेस की बर्बादी का सबब बने मधूसूदन मिस्त्री और खुद कमलनाथ केवल जिताऊ उम्मीदवार को टिकट देने की बात कर रहे हैं। लेकिन अंदरखाने की जानकारी यह है कि नाथ और सिंह ने मिलकर 145 सीटों पर अपने समर्थकों के नाम सिर्फ नाम तय कर दिए हैं, बल्कि उनको चुनाव की तैयारी शुरू करने को भी कह दिया है। टिकट वितरण में जब झमेला मचेगा (जोकि मचेगा भी) तो बसपा से समझौते के बाद बची बाकी सीटों पर कांग्रेस के सिंधिया-पचौरी-अजय सिंह -अरूण यादव को अपने प्रत्याशी तय करने को कह दिया जाएगा।

कांग्रेस के दोनों का अनुमान है कि 145 में से करीब सौ प्रत्याशी जीतकर आ जाएंगे। जाहिर है कि चुनाव बाद मुख्यमंत्री का मसला जब खड़ा होगा तो नाथ-सिंह समर्थकों की भूमिका निर्णायक साबित होगी। लेकिन कांग्रेस और भाजपा की आत्ममुग्धता को भांपते हुए आप पार्टी तीसरी शक्ति के बतौर अपनी संभावनाओं को साकार करने के लिए मैदान में कूद पड़ी है। नर्मदा बचाओ आंदोलन से निकले आलोक अग्रवाल को आप ने भी मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट कर दिया है।

जाहिर है कि जनादेश की चिंता किए बगैर यदि चुनावी नतीजा नेताओं को ही तय करना है तो भला आप भी क्यों पीछे रहे। बावरिया पहले ही कमलनाथ के अलावा सिंधिया भी सीएम हो सकते हैं, जैसे बयान दे चुके हैं। उप मुख्यमंत्री भी उन्होंने घोषित करना शुरू कर दिया है। पर जो भी हो चुनावी रैलियों के तेज होते शोर के बीच मतदाता अभी से ठगा सा महसूस कर रहा है।

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madhya pradesh assembly elections 2018 shivraj singh chouhan bjp
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