लोकसभा चुनाव 2019: कहीं बर्रे के छत्ते में तो हाथ नहीं डाल दिया है कांग्रेस ने

नई दिल्ली। बर्रे के छत्ते में हाथ डालने का मतलब होता है कोई ऐसी बात अथवा काम करना जो बेहद कठिन माना जाता हो। लोकसभा चुनाव 2019 के लिए जारी अपने चुनावी घोषणापत्र में कांग्रेस ने ऐसे वादें किए हैं जिससे यही आभास होता है। आर्थिक और सामाजिक मुद्दों पर उसके वादों पर सवालिया निशान लगाए ही जा रहे हैं, धारा 124ए और सशस्त्र बल विशेष शक्तियां अधिनियम (आफ्स्पा) को लेकर घोषणापत्र में जो कुछ कहा गया है, वह बर्रे के छत्ते में हाथ डालने जैसा ही ज्यादा लग रहा है। इनमें से पहला देशद्रोह से जुड़ा हुआ है तो दूसरा सैन्य बलों को दिए गए अधिकारों से संबंधित है। ये दोनों ही मुद्दे ऐसे रहे हैं जिन पर शायद ही कभी किसी पार्टी ने इस तरह की बातें की हों जैसी कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में की हैं। यह अलग बात है कि समाज और न्यायपालिका में इन मुद्दों पर कुछ बातें हुई हैं, लेकिन वह कभी निर्णायक नहीं बन सकी हैं और यह दोनों लगातार बरकरार हैं। अब कांग्रेस कह रही है कि वह सत्ता में आई, तो इन दोनों पर नए सिरे से विचार करेगी।

कहीं बर्रे के छत्ते में तो हाथ नहीं डाल दिया है कांग्रेस ने

इस पर सबसे तीखी प्रतिक्रिया सत्ताधारी पार्टी भाजपा और उसकी सरकार की ओर से आई है, जिसे एक तरह के संकेत के रूप में लिया जा सकता है कि उसका रवैया इस पर क्या होगा। वैसे इसमें कुछ भी छिपा हुआ नहीं है कि हमारी सरकारें इन दोनों मुद्दों को कैसे डील करती रही हैं और सत्ताधारी पार्टियों का इन पर अतीत में क्या रुख रहा है। खुद कांग्रेस की देश में कई दशक तक सरकारें रही हैं। लेकिन कभी भी इन दोनों प्रावधानों के साथ छेड़छाड़ नहीं की गई। इतना ही नहीं, कमोबेश इनका उपयोग भी उसी तरह किया गया जैसा अभी की सरकार कर रही है। लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि समय-समय पर धारा 124ए को खत्म अथवा संशोधित करने की मांगें की जाती रही हैं। इसी तरह आफ्स्पा को भी सीमित करने को लेकर भी बातें की जाती रही हैं। अब जैसे अभी ही अरुणाचल के कुछ जिलों से आफ्स्पा को हटा लिया गया है। लद्दाख से भी कभी इसे हटा लिया गया था। लेकिन जब भी इस आशय की बातें उठती हैं, तब राष्ट्रीय सुरक्षा और सेना के मनोबल का सवाल सबसे पहले और प्रमुखता के साथ खड़ा किया जाने लगता है। हालात के उदाहरण भी दिए जाने लगते हैं और यह बताया जाने लगता है कि फिलहाल के हालात में यह बेहद जरूरी है। इसीलिए कोई भी पार्टी यह जोखिम उठाने के लिए कभी तैयार नहीं हुई कि इनमें किसी तरह के संशोधन की बात तक की जाए।

अब जब कांग्रेस की ओर से ये मुद्दे उठाए गए हैं और वह भी चुनाव के वक्त अपने घोषणा पत्र के जरिये, तो स्वाभाविक रूप से किसी को भी यह लग सकता है कि पार्टी ने जानबूझकर बर्रे के छत्ते में हाथ डाल दिया है। कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में कहा है कि सत्ता में आने पर वह राजद्रोह को परिभाषित करने वाली धारा 124ए को खत्म करेगी क्योंकि इसका दुरुपयोग किया गया है। पार्टी ने आफ्स्पा की समीक्षा करने की भी बात कही है। स्वाभाविक रूप से इस पर तीखी प्रतिक्रिया होनी थी और वह हुई भी। भाजपा नेता और केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बिना देर किए संवाददाता सम्मेलन कर कांग्रेस के घोषणापत्र को देश को तोड़ने वाला करार दिया। यह भी कहा कि लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को एक भी वोट नहीं मिलना चाहिए। जेटली ने स्पष्ट कहा कि अपने घोषणापत्र में 124ए को हटाने और आफ्स्पा की समीक्षा की बात कर वह जम्मू-कश्मीर में सेना को कमजोर और पत्थरबाजों को मजबूत करना चाहती है। रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने आफ्स्पा पर कांग्रेस को आड़े हाथ लिया और कहा कि इसकी समीक्षा की बात सेना के खिलाफ है और इससे आतंकवादियों को लाभ मिलेगा। यह सुरक्षाबलों को कमजोर करने का प्रयास है। कांग्रेस सुरक्षा बलों की प्रतिरोधक क्षमता कम करने की कोशिश कर रही है।

धारा 124ए के बारे में एक तथ्य यह है कि यह अंग्रेजों ने बनाई थी। तब उसका उद्देश्य अंग्रेज शासन के विरोध में उठने वाली आवाजों को दबाना और ऐसा करने वालों को दंडित करने का था। इस धारा के तहत ही महात्मा गांधी और बाल गंगाधर तिलक को भी दंडित किया गया था। दोनों के खिलाफ कार्रवाई लेख लिखने पर की गई थी। तिलक को तो छह महीने की कैद भी हुई थी। अभी हाल का सबसे चर्चित मामला जेएनयू का रहा है जहां छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार और उनके कुछ अन्य साथियों पर इसी धारा के तहत कार्रवाई की गई थी। दरअसल, इस धारा में कहा गया है कि अगर कोई व्यक्ति किसी भी ऐसी गतिविधि में संलग्न पाया जाता है जिससे देश को खतरा उत्पन्न सकता हो, उसके खिलाफ इस धारा के तहत कार्रवाई की जा सकती है। इसमें ऐसी गतिविधियों का किसी भी रूप में समर्थन करने वालों के खिलाफ भी कार्रवाई का प्रावधान है। यह धारा पुलिस को असीमित अधिकार प्रदान करती है। आफ्स्पा सशस्त्र बल विशेष शक्तियां अधिनियम 1958 में संसद द्वारा पारित किया गया था। इस कानून के तहत अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड के अशांत इलाकों में तैनात सैन्य बलों को विशेष अधिकार दिए गए थे। कश्मीर में आतंकी गतिविधियां में वृद्धि के बाद 1990 में यह कानून सशस्त्र बल (जम्मू एवं कश्मीर) विशेष शक्तियां अधिनियम के रूप में लागू किया गया। इस कानून के तहत सशस्त्र बलों को तलाशी लेने, गिरफ्तार करने और बल प्रयोग करने आदि में अधिक स्वतंत्रता है। उल्लेखनीय है कि इसका भी विरोध होता रहा है। मणिपुर की सामाजिक कार्यकर्ता इरोम शर्मिला ने आफ्स्पा हटाने के लिए 16 वर्षों तक लगातार उपवास किया था।

इन दोनों प्रावधानों का जहां लगातार समाज के कुछ हिस्सों द्वारा विरोध होता रहा है वहीं हाल के वर्षों में इसके समर्थकों की संख्या में भी इजाफा हुआ है। ऐसे में इनको किसी भी रूप में बदलने या हटाने की किसी भी बात को आसानी से स्वीकार कर लिया जाएगा, इसमें संदेह ही लगता है। इसके बावजूद कांग्रेस ने अगर इसे अपने घोषणापत्र में शामिल किया है, तो माना जा सकता है कि इसके खतरों से भी वाकिफ ही होगी। जोखिम उठाने के भी अपने जोखिम होते हैं। इसमें दोनों तरह का खतरा विद्यमान रहता है। यह पक्ष में भी जा सकता है और विपक्ष में भी। कांग्रेस ने इस खतरे को उठाया है, तो शायद उसे लगा हो कि इस पर उसे जनसमर्थन मिल सकता है। सवाल यह है कि क्या यह उतना आसान होगा जितना कांग्रेस मानकर चल रही होगी। बहरहाल, इसके परिणाम उसके पक्ष में जाएं अथवा विरोध में, यह तो लग रहा है इन वादों ने राजनीतिक हलकों में एक खास तरह की हलचल जरूर पैदा कर दी है। शायद इसीलिए यह कहा जाने लगा है कि कांग्रेस ने बर्रे के छत्ते में हाथ डाल दिया है।

(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)

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