वोट के लिए देश को चोट पहुंचा रहे हैं अब्दुल्ला और मोदी?
नई दिल्ली। ध्रुवीकरण की राजनीति क्षेत्रीय दलों का हथियार हुआ करता है। राष्ट्रीय दलों में बीजेपी की यह पसंदीदा रणनीति रही है। एक ही विषय पर जब ध्रुवीकरण को लेकर क्षेत्रीय और राष्ट्रीय राजनीति में तनातनी होती है तो नुकसान उन दलों को होने लगता है जो इस राजनीति में पड़ना नहीं चाहती। ध्रुवीकरण की राजनीति से तटस्थ रहने पर नुकसान सबसे ज्यादा होता है। 2019 के चुनाव में ऐसे ही कुछेक मुद्दों पर ध्यान देना जरूरी है।

जम्मू कश्मीर पर सियासत
बात जम्मू-कश्मीर से शुरू करें। नेशनल कान्फ्रेन्स के नेता उमर अब्दुल्ला ने जम्मू-कश्मीर में अलग प्रधानमंत्री और अलग राष्ट्रपति की तान छेड़ दी है। राष्ट्रीय राजनीति हमेशा से ऐसी व्यवस्था के खिलाफ रही है। इस व्यवस्था को खत्म करने का श्रेय भी पंडित जवाहर लाल नेहरू और कांग्रेस को जाता है। मगर, कश्मीर में पिछले पांच साल में जो आक्रोश पैदा हुआ है केन्द्र सरकार के ख़िलाफ़, उसे भुनाने के लिए नेशनल कान्फ्रेन्स ने इस मुद्दे को चुनावी मौसम में वोट के लिए टॉस कर दिया है।
उमर अब्दुल्ला के बयान से बीजेपी को भी मौका मिला है। अब्दुल्ला जम्मू-कश्मीर के वोटरों को संबोधित कर रहे हैं तो बीजेपी देश के वोटरों को। बीजेपी अब जम्मू-कश्मीर के लिए अपनी उस नीति को सही ठहराएगी, जिसका भाव होता है, "लातों के भूत बातों से नहीं मानते"। नतीजा क्या होगा? ताकत के दम पर कश्मीर को काबू में करने वाली सियासत पर बीजेपी देशव्यापी स्तर पर ठप्पे लगवाएगी, जबकि इसका विरोध करने के नाम पर नेशनल कान्फ्रेन्स यही काम कश्मीर में करेगी।
अब कांग्रेस और उसकी राह पर चलने वाले दलों का हाल देखिए। उनसे नरेंद्र मोदी लगातार पूछते रहेंगे कि क्या आप उमर अब्दुल्ला से सहमत हैं? क्या है आपका स्टैंड? चुनाव की स्थिति ऐसी होती है कि अपना साफ स्टैंड भी राजनीतिक दल साफ तौर पर रख नहीं पाते। अगर कांग्रेस यह पूछ भी दे कि नरेंद्र मोदी बताएं कि कश्मीर में किसने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री पदों को समाप्त किया, तो नरेंद्र मोदी के सवाल का वह मुकम्मल जवाब नहीं होता। अगला सवाल यही होता है कि आप नेशनल कान्फ्रेन्स के साथ हैं क्यों?

चुनाव के समय ध्रुवीकरण, चुनाव बाद सरकार हो जाती है प्राथमिकता
कुछ समय पहले तक जब पीडीपी और बीजेपी की साझा सरकार जम्मू-कश्मीर में थी, तब भी स्थिति वही थी। मगर, तब चुनाव नहीं थे। पत्थरबाजों के साथ क्या सलूक किया जाए, इस पर पीडीपी और बीजेपी का रुख अलग-अलग था। पीडीपी ने हज़ारों की संख्या में पत्थरबाजों के खिलाफ मुकदमे वापस लिए। तत्कालीन मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने मारे गये आतंकवादियों को शहीद बताया। तब भी नरेंद्र मोदी से पूछा जा सकता था कि क्या आप महबूबा मुफ्ती से सहमत हैं? खुद महबूबा मुफ्ती ने भी यह जानते हुए कि धारा 370 पर बीजेपी का क्या रुख है, बीजेपी के समर्थन से सरकार बनायी। दोनों दलों की प्राथमिकता चुनाव के बाद सरकार हो गयी। यही होता है जब चुनाव का समय हो, तो ध्रुवीकरण चाहिए और जब चुनाव ख़त्म हो जाए तो सरकार।
बीजेपी ने ध्रुवीकरण की सियासत को आगे बढ़ाते हुए भगवा आतंकवाद और हिन्दू आतंकवाद का मुद्दा भी छेड़ दिया है। खुद पीएम मोदी ने इस मुद्दे को छेड़ा है। वे कांग्रेस को इन शब्दों का जनक बता रहे हैं। मगर, सच्चाई क्या है? शब्द तो बस अभिव्यक्ति का माध्यम होते हैं। चुनाव के समय इस सवाल का जवाब देना कांग्रेस के लिए मुश्किल है। वहीं, इस मौसम में सवाल पूछना बीजेपी के लिए उतना ही फलदायक। विगत चुनावों में सवाल कुछ अलग किस्म से पूछे जाते थे- बताओ आपको राम पसंद है या बाबर? चूकि अयोध्या में राममंदिर निर्माण की शर्त ही हो गयी थी कि केंद्र और उत्तर प्रदेश में बीजेपी सरकार हो, इसलिए शर्त पूरी हो जाने के बाद अब उन सवालों पर लौटना बीजेपी के लिए थोड़ा मुश्किल हो गया है। सवाल बदलने के पीछे वजह यही है।

धार्मिक पहचान को अक्सर लालायित रहता है आतंकवाद
धार्मिक पहचान के लिए अक्सर आतंकवाद लालायित रहता है। जब कोई इस रूप में उसकी पहचान करता है तो वह प्रफुल्लित होता है मानो मकसद पूरा हो गया हो। चाहे आतंकवाद को इस्लामिक बोला जाए या हिन्दू, भगवा या इसी तरह कुछ और, यह चंद लोगों की विधटनकारी मकसद को पहचान दिलाने के बराबर है जिससे बहुसंख्यक जनता दूर रहती है। सवाल ये है कि भगवा आतंकवाद और हिन्दू आतंकवाद की पहचान करने की कोशिश बड़ा गुनाह है या ऐसे आतंकवाद की पृष्ठभूमि तैयार करने वाले ब़ड़े गुनहगार हैं? क्या 6 दिसम्बर 1992 में अयोध्या की धरती पर किसी किस्म का आतंकवाद देखने को नहीं मिला था? उसके बाद देशभर में हुए दंगे उसी की परिणति नहीं थे? फिर प्रतिक्रिया स्वरूप देश ने आतंकवाद के नये युग में प्रवेश नहीं किया? अगर हां, तो उन परिस्थितियों को किस आतंकवाद के नाम से पहचाना जाएगा? उसका जिम्मेदार कौन होगा?
मालेगांव और समझौता ब्लास्ट में आरोपी बरी हो गये। इससे भगवा आतंकवाद और हिन्दू आतंकवाद के तौर पहचाने गये चंद विघटनकारी तत्वों की मौजूदगी खारिज नहीं हो जाती है। वह सोच सही नहीं हो जाती है जिस कारण ये घटनाएं घटीं। आखिर दोषी कौन था? व्यवस्था और इस देश की राजनीति ने अगर वास्तविक गुनहगारों के विरुद्ध सबूत इकट्ठे नहीं किए, या वास्तविक गुनहगारों को सलाखों के पीछे नहीं डाला तो इससे भगवा आतंकवाद और हिन्दू आतंकवाद से जुड़े तथ्य समाप्त नहीं हो जाते। आतंकवाद को धर्म और सम्प्रदाय के नाम पर पहचानने की सोच विघटनकारी है, मगर इन आधारों पर आतंकवाद को मजबूत करना उतना ही आसान रहता है। समाज के रक्षकों के सामने यही तो चुनौती है। सभी हिन्दू या सभी मुस्लिम या सभी किसी और धर्म के लोग दंगाई नहीं होते। दंगाई तो चंद लोग होते हैं। फिर भी वे बड़ी आसानी से धर्म का इस्तेमाल कर जाते हैं। यही बात मजहब के नाम पर आतंकवाद फैलाने वालों पर भी लागू होती है। ऐसे नाजुक विषय को चुनाव के मैदान में खुली बहस का हिस्सा बनाना, जिसका मकसद जनता की भावनाएं सहलाना या भड़काना होता है यह उस आतंकवाद से भी ख़तरनाक है।

और भी हैं चुनाव के मौसम में उठने वाले सवाल
क्या तमिलनाडु में राष्ट्रीय दल हिन्दी की वकालत करते हुए राजनीति कर सकते हैं? क्या चुनाव के मौसम में डीएमके और एआईडीएमके जैसी क्षेत्रीय पार्टियों से पूछा जाए कि वे हिन्दी की वकालत करने वाली राष्ट्रीय पार्टियों के साथ गठबंधन क्यों कर रहे हैं? क्या बिहार और यूपी की बीजेपी से पूछा जाए कि वह महाराष्ट्र में बिहारियों को मार भगाने की राजनीति करने वाले शिवसेना से गठबंधन क्यों कर रहे हैं? ये सवाल सुविधा और मतलब की ऐसी राजनीति है जिससे चुनाव के दौरान सिर्फ और सिर्फ भावनाएं भड़कायी जा सकती हैं। निश्चित रूप से उमर अब्दुल्ला ने क्षेत्रीय स्तर पर ध्रुवीकरण की राजनीति का गुनाह किया है, लेकिन नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय स्तर पर यही गुनाह करते दिख रहे हैं।
(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)












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