राहुल की कांग्रेस का पहला मेनिफेस्टो, उदारीकरण के बाद भारत की राजनीति में बड़ा शिफ्ट

कांग्रेस का मेनिफेस्टो, उदारीकरण के बाद भारत की राजनीति में बड़ा शिफ्टराहुल की कांग्रेस का पहला मेनिफेस्टो, भारत की राजनीति में बड़ा शिफ्ट

नई दिल्ली। कांग्रेस पार्टी ने लोकसभा चुनाव के लिये अपना घोषणापत्र जारी कर दिया है. इसको लेकर हो रही चर्चायें बता रही हैं कि इसमें देश की मौजूदा राजनीति में बह रही हवा से कुछ अलग बातें कही गयी हैं. इस घोषणापत्र का पार्टी के समर्थकों के अलावा भी कई हलकों में स्वागत किया जा रहा है और इसे उदारीकरण के बाद पहली बार कांग्रेस पार्टी के नजरिये में बुनियादी फर्क के रूप में देखा जा रहा है. कांग्रेस पार्टी ने वादों से भरे अपने इस घोषणा पत्र को “जन-आवाज” के तौर पर पेश करते हुये “हम निभाएंगे” का वादा भी किया है और दावा किया है कि इसमें कोई वादा झूठ पर आधारित नहीं है. कांग्रेस के इस घोषणा पत्र के बिन्दुओं पर जिस तरह से बहस हो रही है वो सुखद है उम्मीद है इससे इस चुनाव में देश के राजनीति को वास्तविक मुद्दों पर वापस आने में मदद मिलेगी।

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मुश्किल लेकिन महत्वपूर्ण घोषणायें

इस घोषणापत्र में कई घोषणायें ऐसी की गयी हैं जो देश के मौजूदा समस्याओं और भविष्य की चुनौतियों को संबोधित करती हैं और इसे देख कर लगता है कि इसे काफी मेहनत और गंभीरता से बनाया गया है. इसमें सबसे अहम घोषणा न्यूनतम आय योजना (न्याय) है जिसके तहत देश सबसे गरीब परिवारों की सालाना आय को कम से कम 72 हजार रुपए सालाना सुनिश्चित करने का वादा किया गया है. अंदाजा है कि इस योजना के दायरे में देश के करीब 5 करोड़ परिवार आ सकेंगे।

दूसरी अहम घोषणा बेरोजगारी को लेकर की गयी है, इसके तहत मार्च 2020 तक केंद्र सरकार के 22 लाख खाली पदों को भरने, ग्राम पंचायत और शहरी निकायों में 10 लाख नये 'सेवा मित्र’ पदों का सृजन करने, मनरेगा के अंतर्गत में रोजगार गारंटी को 100 दिनों से बढ़ाकर 150 दिन जैसे वादे किये गये हैं. किसानों के लिये भी कई महत्वपूर्ण घोषणायें की गयी हैं जिसमें अलग से “किसान बजट” लाने और कर्ज नहीं चूका पाने पर किसानों पर आपराधिक मामला नहीं लगाने जैसे बातें की गयी हैं।

शिक्षा,स्वास्थ्य को लेकर भी घोषणापत्र में कुछ बहुत ही सारे बिंदु हैं. इसमें सबसे महत्वपूर्ण शिक्षा के क्षेत्र में जीडीपी का 6 फीसदी हिस्सा खर्च करने का वादा किया गया है. गौरतलब है कि मोदी सरकार के दौर में शिक्षा पर खर्च लगातार घटा है और वर्तमान में शिक्षा पर जीडीपी लगभग ढाई फीसदी ही खर्च किया जा रहा है. इसी तरह से कांग्रेस के घोषणापत्र में प्राइवेट इंश्योरेंस बेस्ड हेल्थकेयर को नकारते हुये सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने की बात की गयी है. इसके लिये साल 2023-24 तक सावर्जनिक स्वास्थ्य सेवाओं पर जीडीपी का 3 प्रतिशत तक खर्च बढ़ाने की बात की गयी है, इसके साथ ही सभी के लिये स्वास्थ्य का अधिकार कानून लागू करने का वादा भी किया गया है।

इस घोषणापत्र में घृणा अपराधों को रोकने और सांप्रदायिक सद्भाव, भाईचारा को बढ़ावा देने का इरादा भी जाहिर किया गया है, इसके लिये अनुसूचित जातियों, जनजातियों, महिलाओं और अल्पसंख्यकों के खिलाफ होने वाले हिंसा,घृणा अपराधों और लिंचिंग को रोकने का वादा किया गया है. इसी के साथ दंगों, उन्मादी भीड़ की हिंसा और घृणा अपराधों के मामलों के रोकथाम और दंड के लिये 17 वीं लोकसभा के पहले सत्र में ही नया कानून पारित करने की बात की गयी है जिसमें पीड़ितों को मुआवजा देने और इन मामलों में जिला प्रशासन की जिम्मेदारी तय करने की बात की गयी है।

इसी क्रम में सामाजिक एकता, एकजुटता, सांप्रदायिक सद्भाव, भाईचारा और आपसी मेल मिलाप की प्रक्रिया को मजबूती प्रदान करने के लिए राष्ट्रीय एकता परिषद् का पुर्नगठन की बात की गयी है. इसके साथ ही कांग्रेस विभिन्न सम्प्रदायों, समुदायों और धार्मिक एवं सांस्कृतिक मान्यताओं को मानने वाले धर्म गुरुओं को शामिल करते हुए एक Inter faith council के गठन की बात की गयी है जो समाज में सहिष्णुता और बंधुत्व को बढ़ावा देने के लिये काम करेगी।

कांग्रेस ने अपने इस घोषणापत्र में जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 की यथास्थिति बनाये रखने और “अफस्पा” यानी (आर्म्ड फोर्स स्पेशल पावर एक्ट) के समीक्षा करने और ब्रिटिश शासनकाल की राजद्रोह को परिभाषित करने वाली भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए को समाप्त करने की बात की है. इसे लेकर भाजपा उसपर निशाना साध रही है. वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कांग्रेस के इस घोषणापत्र को देश को तोड़ने वाला 'एजेंडा’ बताया है।

दरअसल पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा द्वारा तमाम तरह के वादे और दावे किए गए थे लेकिन इसबार वो जमीनी मुद्दों से बच कर निकल जाना चाहती है और पूरी तरह से ध्रुवीकरण व भावनात्मक मुद्दों पर आश्रित हो गयी लगती है. इस बार उसकी चुनावी थाली में राष्ट्रवाद, पाकिस्तान और हिन्दू-मुस्लिम जैसे मुद्दे ही नजर आ रहे हैं।

राहुल की कांग्रेस

कांग्रेस पार्टी को 2014 में अपने सबसे बड़े चुनावी पराजय का सामना करना पड़ा था. वैसे तो चुनाव में हार-जीत सामान्य है और इससे पहले कांग्रेस जब कभी भी सत्ता से बाहर हुई थी तो उसकी वापसी को लेकर इतना संदेह नहीं किया जाता था लेकिन 2014 की हार कुछ अलग थी. इसके बाद कांग्रेस की वापसी को लेकर कई गंभीर सवाल थे लेकिन आज चार साल से अधिक समय बीत जाने के बाद ऐसा लगता है कि कांग्रेस अपने सबसे बड़े संकट के दौर से उबर चुकी है. कांग्रेस ने अपना यह कायाकल्प बहुत ही विपरीत परिस्थितयों में किया है. बिना किसी चमकदार चेहरे, संसाधन विहीन, लुंज-पुंज संगठन, हताश कार्यकर्ताओं और भौपू मीडिया के बावजूद उसने अपने अस्तित्व को बचाया और नये तरीके से गढ़ा है. पिछले साल के आखिरी महीनों में हुये पांच राज्यों के चुनावी नतीजों ने कांग्रेस को जीवन दान दे दिया है।

2014 के बाद से यह पहली बार था जब विलुप्त मानी जा रही कांग्रेस पार्टी ने सीधे मुकाबले में भाजपा को मात दिया था वो भी एक नहीं तीन राज्यों में. इस जीत ने राहुल गांधी को भी एक नेता के तौर पर स्थापित कर दिया है और अब ऐसा कहा जाता है कि लगभग मृतशैया पर पड़ी पार्टी को उन्होंने काफी हद तक खड़ा कर दिया है.यह इसलिये भी महत्वपूर्ण है कि राहुल गांधी का इससे पहले का सफर संघर्ष और विफलताओं से भरा रहा है. इस दौरान उन्हें पराजय,जबरदस्त आलोचनायें और दुष्प्रचार को झेलना पड़ा और लम्बे समय तक उन्हें पार्टी के अंदर और बाहर दोनों जगह एक प्रेरणादायक और चुनाव जीता सकने वाले नेता के तौर पर स्वीकृति नहीं मिली. लेकिन धीरे-धीरे राहुल गाँधी ने मोदी-शाह के केंद्रीकृत व निरंकुश राजनीतिक शैली के बरक्स अपना एक अलग नैरेटिव पेश करने की कोशिश की जो ज्यादा विनम्र और समावेशी है और सबको साथ लेकर चलने की कोशिश करती है. यह “ब्रांड राहुल” की पेशकश थी जो “ब्रांड मोदी” के बिलकुल उल्ट है।

आज राहुल गांधी विपक्ष की तरफ से ना केवल विकल्प बनकर उभरे हैं बल्कि काफी हद तक वे देश के राजनीति का एजेंडा तय करने की स्थिति में भी आ गये हैं. दरअसल विपक्ष में रहते हुये राहुल गांधी की सबसे बड़ी सफलता यही रही है कि वे मोदी साकार को आर्थिक मोर्चे पर घेरने में सफल रहे हैं। यह घोषणापत्र इस बात का संकेत है कि 1990 के बाद पहली बार कांग्रेस अपनी नीतियों में बुनियादी बदलाव करने जा रही है. अगर यह यह संकेत सही हैं तो उदारीकरण के बाद भारत की राजनीति में यह एक बड़ा शिफ्ट होने जा रहा है।

(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)

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