Tamil Nadu: तमिलनाडु में पहली बार द्रविड़ राजनीति को चुनौती

द्रविड़ पार्टियों के वर्चस्व वाले तमिलनाडु में पहली बार गैर द्रविड़ भारतीय जनता पार्टी द्रविड़ पार्टियों द्रमुक और अन्ना द्रमुक को चुनौती देती दिखाई दे रही है| 1967 के बाद कुछ समय तक तो कांग्रेस द्रविड़ पार्टियों को चुनौती देती दिखाई देती थी, लेकिन धीरे धीरे कांग्रेस अप्रासंगिक हो गई और अपना अस्तित्व बचाने के लिए द्रमुक की सहयोगी पार्टी बन कर रह गई।

Tamil Nadu

1972 में द्रमुक से टूट कर बनी अन्नाद्रमुक और द्रमुक दोनों द्रविड़ पार्टियां ही बारी बारी से सरकारें बनाती रही हैं। भारतीय जनता पार्टी को तमिलनाडु में ब्रह्मणों की और हिन्दी भाषी पार्टी माना जाता है, इसलिए वह कभी भी अपने पाँव नहीं जमा पाई, लेकिन 1998 में अन्नाद्रमुक के समर्थन से ही अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बन पाए थे।

जयललिता खुद ब्राह्मण थी, लेकिन वह द्रविड़ राजनीति करती थीं| वाजपेयी के पास समर्थन नहीं था और जयललिता ने समर्थन की शर्तें रख दी थीं| जब जयललिता ने चिठ्ठी दी, तभी राष्ट्रपति के. आर. नारायण ने वाजपेयी को सरकार बनाने का न्योता दिया था| लेकिन उन्हीं जयललिता ने 13 महीने बाद सोनिया गांधी से सांठगाँठ करके एक वोट से वाजपेयी सरकार गिरा दी थी।

चुनावों के बाद द्रमुक भाजपा के साथ आ गई थी, जो लगभग पांच साल सरकार को समर्थन देती रही, लेकिन 2004 के लोकसभा चुनाव से पहले एनडीए सरकार से बाहर हो गई| इसके बाद पिछले 20 सालों में अन्नाद्रमुक के एनडीए में आने और जाने का सिलसिला चलता रहा|
पिछले वर्ष 23 जून को जिस दिन इंडी गठबंधन की पटना में पहली बैठक हुई थी, उस दिन अन्नाद्रमुक नरेंद्र मोदी की ओर से बुलाई गई एनडीए की बैठक में शामिल थी| प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष के. अन्नामलाई ने पिछले तीन साल की मेहनत से भाजपा को दोनों द्रमुक पार्टियों के मुकाबले में खड़ा कर दिया| उन्होंने पहली बार खुल कर द्रविड़ राजनीति को ही चुनौती दे दी है, जिससे द्रमुक विरोधी सारी शक्तियाँ भाजपा के साथ आकर खडी हुई दिखाई दे रही हैं।

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अन्नामलाई ने अन्नाद्रमुक पार्टी में बड़ी सेंधमारी भी की है| अन्नामलाई की बढ़ती लोकप्रियता से अन्नाद्रमुक इतनी परेशान हो गई कि उसने भाजपा से अन्नामलाई को प्रदेश भाजपा अध्यक्ष पद से हटाने की मांग रख दी, जिसे भाजपा ने अस्वीकार कर दिया और आखिर सितंबर में अन्नाद्रमुक एनडीए से बाहर आ गई।

1972 के बाद संभवत यह पहला मौक़ा है कि भाजपा ने जबर्दस्त सोशल इंजीनियरिंग करके दोनों द्रविड़ पार्टियों की नींद हराम कर दी है| प्रदेश भाजपा अध्यक्ष अन्नामलाई और अन्नाद्रमुक के प्रमुख नेता और पूर्व मुख्यमंत्री ई. पलानीस्वामी दोनों एक ही गौंडर जाति से हैं|
यह जाति तमिलनाडु के पिछड़ों में उतनी ही मजबूत है, जैसे उत्तर भारत में पिछड़ों में यादव और कुर्मी मजबूत हैं| भाजपा के दो विधायक इसी जाति के हैं, भाजपा ने अन्नामलाई को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बना कर तमिलनाडु में पार्टी की वैसी ही पहचान बनाने की कोशिश शुरू की है, जैसे पिछले दस साल में उत्तर भारत में भाजपा को पिछड़ों की पार्टी के तौर पर उभारा है।

जयललिता मंत्रिमंडल में पूर्व मंत्री नैनार नागेंद्रन को विधायक दल का नेता बनाकर भाजपा ने शक्तिशाली थेवर समुदाय को भी लुभाया है| इसके अलावा अनुसूचित जाति की सात उपजातियों का समूह वेल्लार है, जो अनुसूचित जाति की श्रेणी से बाहर निकलकर खुद को ओबीसी में शामिल करवाना चाहता है| भाजपा किसानी करने वाली इन जातियों के समर्थन में आ गई है| अन्नामलाई की रणनीति है कि अगर पिछड़े, ब्राह्मण और नाडार भाजपा के साथ आ जाएं, तो वह बड़ी ताकत के रूप में उभर आएगी|

भाजपा की रणनीति खुद को अन्नाद्रमुक का विकल्प बनने या तीसरी ताकत के रूप में उभारने की है| उसने दोनों द्रमुक गठबन्धनों के सामने अपना खुद का गठबंधन बना कर चुनावी लड़ाई को त्रिकोणीय बना दिया है| कुछ सीटों पर अन्नाद्रमुक और भाजपा उम्मीदवारों में कड़ा मुकाबला देखने को मिल सकता है।

अनाद्रमुक अब उतनी मजबूत तो नहीं रही जितनी 2016 में जयललिता के देहांत से पहले थी| 2019 के लोकसभा चुनाव अन्नाद्रमुक और भाजपा ने मिलकर लड़े थे, लेकिन इस गठबंधन का सफाया हो गया था| 39 में से 38 सीटें द्रमुक गठबंधन जीता था, जिनमें से 23 सीटें द्रमुक, आठ सीटें कांग्रेस, दो सीपीएम और एक सीपीआई जीती थी| द्रमुक इस बार 22 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, उसके गठबंधन में आठ दल हैं, जिनमें कांग्रेस को 9, माकपा को 2, भाकपा को दो, वीसीके को दो, एमडीएमके, केडीएमके और मुस्लिम लीग को एक एक सीट दी गई है।

वहीं चार दलों के साथ गठबंधन में अन्नाद्रमुक खुद 34 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, जिनमें से पुथिया तमिलगम और सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया के एक-एक उम्मीदवार शामिल हैं, जो अन्नाद्रमुक की टिकट पर ही चुनाव लड़ रहे हैं| इसके अलावा देसिया मुरपोकु द्रविड़ कड़गम को पांच सीटें दी गई हैं।

भाजपा ने भी आठ दलों के साथ गठबंधन करके 9 दलों का तीसरा मोर्चा बना लिया है, जिसमें भाजपा 23 सीटों पर, पीएमके 10 सीटों पर, तमिल मनिला कांग्रेस 3 सीटों पर और अन्नाद्रमुक से अलग हुए पूर्व मुख्यमंत्री ओ. पनीरसेल्वम निर्दलीय के तौर पर लड़ रहे हैं| दिनाकरन की अम्मा मक्कल मुनेत्र कड़गम 2 सीटों पर चुनाव लड़ लड़ रही है| इंडिया जननायक कटची, पुथिया नीधि कटची और तमिलगा मक्कल मुनेत्र कड़गम सभी एक-एक सीट पर भाजपा के चुनाव चिन्ह पर ही चुनाव लड़ रहे हैं।

त्रिकोणीय मुकाबले में विपक्षी वोटों के बंटने से द्रमुक को फायदा भी हो सकता है, लेकिन भाजपा को द्रविड़ विरोधी सोशल इंजीनियरिंग की राजनीति का फायदा होने की उम्मीद ज्यादा है| यह बिलकुल वैसा ही है जैसे हरियाणा में सभी गैर जाट भाजपा के साथ खड़े हो गए थे और दोनों जाट पार्टियों का सफाया हो गया था।

द्रविड़ राजनीति का इतिहास सौ साल से भी पुराना है। द्रविड़ राजनीति 1916 में ब्राह्मणों के वर्चस्व को चुनौती देने के लिए शुरू हुई थी| ब्रिटिश शासनकाल में ब्राह्मणों ने अपने बच्चों को अंग्रेजी सीखाना और अंग्रेजी शिक्षा देनी शुरू कर दी थी, जिसका नतीजा यह निकला कि सरकारी नौकरियों में उन्हें जगह मिलने लगी।

इसके खिलाफ सी एन मुदलियार ने 1916 में गैर ब्राह्मणों को एकजुट करके जस्टिस पार्टी का गठन किया| इसे द्रविड़ आन्दोलन की शुरुआत कहा जाता है| कांग्रेस ने असहयोग आन्दोलन के चलते 1920 के चुनावों में हिस्सा नहीं लिया, जस्टिस पार्टी ने ब्राह्मणवाद के विरोध को मुद्दा बनाते हुए चुनाव में हिस्सा लिया, और 98 निर्वाचित (34 मनोनीत) सदस्यों वाली मद्रास विधानसभा की 63 सीटें जीत कर सरकार बनाई।

पहले चुनाव में 17 ब्राह्मण, 57 गैर ब्राह्मण, 13 मुस्लिम, 5 ईसाई और 6 एंग्लों इंडियन चुने गए थे| सत्रह साल तक जस्टिस पार्टी की सरकार रही, लेकिन 1937 में कांग्रेस के चुनाव में उतरने के बाद जस्टिस पार्टी कभी उभर नहीं पाई| 1937 में कांग्रेस के सी. राजगोपालाचारी प्रेजीडेंसी विधान परिषद के नेता बने थे।

जस्टिस पार्टी ने 1937 से 1940 तक हिन्दी विरोधी आन्दोलन चलाया और होम रूल आन्दोलन या कहिए कि भारत की आज़ादी का भी इसलिए विरोध किया था, क्योंकि जस्टिस पार्टी को लगता था कि आज़ादी के बाद ब्राह्मणों का राज स्थापित हो जाएगा| जस्टिस पार्टी ने महात्मा गांधी के असहयोग आन्दोलन का भी विरोध किया था| ईवी पेरियार के प्रभाव ने जस्टिस पार्टी को ब्राह्मण विरोधी, हिन्दू विरोधी और नास्तिक रूख की ओर धकेल दिया| उन्होंने कंबा रामायण और पेरिया पुरानम का विरोध किया, जिस कारण उनका तमिल विद्वानों के साथ टकराव हुआ।

बाद में जस्टिस पार्टी के भीतर ही पेरियार का विरोध शुरू हो गया, पेरियार विरोधियों का नेतृत्व सी.एन. अन्नादुरैई कर रहे थे। 1944 में जस्टिस पार्टी के राष्ट्रीय सम्मेलन में दोनों गुटों का संघर्ष हुआ, जिसमें पेरियार जीत गए| बाद में सम्मेलन में जो जाति तोड़क जैसे प्रस्ताव पास हुए, उन प्रस्तावों को अन्नादुरई ने ही तैयार किया था। इसी सम्मेलन में जस्टिस पार्टी खत्म कर दी गई, और अन्नादुरई की अध्यक्षता में द्रविड़ कषगम का गठन हुआ| लेकिन कुछ लोगों ने इसे स्वीकार नहीं किया, और जस्टिस पार्टी को ज़िंदा रखने की कोशिश की|
बची खुची जस्टिस पार्टी के नए नेतृत्व ने कांग्रेस और उसके भारत छोड़ो आन्दोलन का समर्थन किया| लेकिन 1946 के चुनाव में जस्टिस पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली, जबकि आज़ादी के बाद पहले चुनावों में जस्टिस पार्टी ने विधानसभा की 9 सीटें लड़ कर सिर्फ एक सीट जीती, जबकि लोकसभा में खाता भी नहीं खुला।

उधर पेरियार के साथ मतभेदों के चलते 1949 में द्रविड़ मुनेत्र कषगम का निर्माण हुआ, जिसने अपना हिन्दी विरोध और हिन्दू विरोध का एजेंडा जारी रखा, जिस कारण द्रमुक का प्रभाव बढ़ता गया और कांग्रेस का प्रभाव घटता गया| 1952 में मद्रास राज्य विधानसभा का पहला चुनाव हुआ, कांग्रेस जीती और सी. राजगोपालाचारी ही मुख्यमंत्री बने। लेकिन 1954 में जवाहर लाल नेहरू के साथ मतभेदों के चलते उन्होंने इस्तीफा दे दिया।

इसके बाद के. कामराज मुख्यमंत्री बने, जो 1963 तक मुख्यमंत्री रहे। उनके बाद भक्तवत्सलम 1967 तक मुख्यमंत्री रहे| 1967 के विधानसभा चुनाव में द्रमुक ने कांग्रेस को परास्त कर दिया और सी.एन. अन्नादुराई मुख्यमंत्री बने| 1972 में एमजी रामचन्द्रन ने द्रमुक का विभाजन करके अन्नाद्रमुक का गठन किया| लेकिन 1967 के बाद कभी द्रमुक और कभी अन्नाद्रमुक की सरकार बनती रही| इसके बाद कांग्रेस कभी सत्ता में नहीं आ पाई।

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