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मोदी सरकार पर बेरोजगारी का आरोप, कितना सच कितना झूठ?

Berojgari ke aankde: पीएम मोदी ने 2014 के चुनाव में यह वायदा किया था कि वह सरकार में आने के बाद दो करोड़ लोगों को नौकरी देंगे। अब वही वायदा मोदी के लिए बेताल बन गया है।

मोदी सरकार 2014 से आज तक पीएफ खाते में हो रही बढ़ोतरी से अपना बचाव करने की कोशिश कर रही है। लेकिन देश में इतने ज्यादा बेरोजगार हैं कि किसी लॉलीपॉप से मानने के लिए तैयार ही नहीं हैं।

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वैसे भी पीएफ कोई नियमित रोजगार का आकड़ा नहीं होता, कंपनी में लोग नौकरी से जुड़ते हैं और फिर कुछ दिन बाद छोड़ कर चले भी जाते हैं। उससे पीएफ के आकड़े परिवर्तित नहीं होते। यह एक नियमित प्रक्रिया है और इसके आधार पर यह विचार करना कि रोजगार के अवसर बढ़ रहे हैं, मूर्खता होगी।

मोदी सरकार एक और दलील दे रही है कि स्टार्टअप की संख्या अब लाखों में पहुँच चुकी है और उनसे करोड़ों लोगों को रोजगार मिल रहा है। लेकिन अभी तक ऐसी कोई प्रामाणिक गणना सामने नहीं आई है, जिससे यह निष्कर्ष निकाला जाए कि करोड़ों नहीं तो लाखों में भी नौकरियाँ पैदा हुईं हैं।

दूसरी तरफ नोटबंदी और कोविड के कारण करोड़ों लोगों की नौकरियां चली गईं, इसका अध्ययन और इसके आकड़े सामने हैं। इसलिए रोजगार सृजन के वायदे को विपक्ष जुमला करार देने के प्रयास में कुछ हद तक सफल भी हुआ है। नौकरी की तरह 100 दिन में विदेश से काला धन लाने का वायदा भी मोदी सरकार को निरुत्तर करता है। बल्कि यह कहा जाता है कि 2014 से अब तक विदेशों में और भारत में काले धन रखने वालों की संख्या में वृद्धि ही हुई है।

यह तस्वीर का एक ही पहलू है और विपक्ष केवल इसे ही पेश करने की कोशिश कर रहा है। उसके रोजगार के आकड़े में केवल वे ही लोग शामिल हैं, जो एक कर्मचारी के तौर पर रोजाना 8 घंटे काम करते हैं, सप्ताह में एक या दो दिन छुट्टी लेते हैं। हर महीने की पहली तारीख को वेतन पाते हैं, टी.ए, डी.ए. और वार्षिक वेतन वृद्धि के हकदार होते हैं। लेकिन क्या वे पेशेवर भी बेरोजगार हैं जो रोजाना अपनी फ़ीस के रूप में हजारों की कमाई करते हैं?

डॉक्टर, सी ए, वकील, आर्किटेक्ट और दर्जनों पेशे के लोग सैकड़ों, हजारों में नहीं लाखों में हैं। देश में हजारों चाय पान वाले ऐसे हैं जिनकी कमाई 6 अंकों में है। कुशल और अर्ध कुशल लोग आसानी से अपनी जीविका चला रहे हैं। सवाल यही है कि जिन लोगों का रोजगार रिकॉर्ड नहीं है, क्या उन सबको बेरोजगारों की सूची में डालना उचित है?

भारतीय समाज की एक कमजोरी यह भी है कि लोग नौकरी के लिए तो 5-10 साल इंतजार तो कर लेते हैं, लेकिन कोई हुनर सीख कर पहल करने से बचते हैं। हर किसी को नौकरी नहीं मिल सकती। खासकर सारी सुविधाओं वाली सरकारी नौकरी बहुत ही सीमित संख्या में है। किसी एक डिग्री को भी वेतनभोगी नौकरी की गारंटी नहीं मान सकते। नौकरी की पुरानी परिभाषा नए परिप्रेक्ष्य में लागू करना अनुचित है। यदि दैनिक आधार पर कोई काम मिल रहा है, या खुद का व्यवसाय है, इसे भी रोजगार की श्रेणी में ही रखना पड़ेगा।

मोदी सरकार जब यह दावा कर रही है कि 10 करोड़ नागरिकों को अपना बिजनेस शुरू करने के लिए लोन दिया, तो इस आंकड़े को रोजगार के आंकड़े से उड़ा देना सही प्रक्रिया नहीं है। इसी तरह से एनएचएआई दोगुनी रफ्तार से हाईवे का निर्माण कर रहा है। 25 किमी प्रतिदिन की रफ्तार से। गांव की सड़कें 80 किमी प्रतिदिन बन रही थीं और अब यह 130 किमी प्रति दिन है। इसका मतलब है कि लोगों को रोजगार मिल रहे हैं।

सवाल उठता है कि फिर हमारे देश में इतने बेरोजगार नागरिक क्यों दिखाए जा रहे हैं। असल में सरकार नौकरियाँ देने में विफल रहने से ज्यादा संबंधित डेटा एकत्र करने में विफल रही। क्या इस थ्योरी में भी दम है कि केवल वे बेरोजगार हैं जो सरकारी नौकरियों की प्रतीक्षा में हैं। और इन्हीं के आंकड़े के दम पर विपक्ष वर्तमान सरकार को घेरने में लगा है। एक बात और क्या नौकरियाँ देना केवल सरकार का काम है। या सरकार का काम ऐसी अनुकूल नीतियां बनाना है जहां व्यवसाय फले-फूले और उसके नागरिकों के लिए रोजगार और धन का सृजन करें।

भाजपा का रिकार्ड रोजगार या नौकरी देने में बहुत खराब नहीं रहा है। अटल बिहारी वाजपेयी के सरकार में एनडीए ने 5 वर्षों में 60 मिलियन से अधिक नौकरियां पैदा की थी। इसी तरह प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार का आंकड़ा देखें और दो साल कोविड का निकाल दें तो यूपीए के आठ वर्षों की तुलना में अधिक नौकरियां पैदा करने में सक्षम रही है।

2014 के आम चुनावों से पहले हुए अध्ययन से पता चलता है कि 2004-05 और जनवरी 2012 के बीच 53 मिलियन नई नौकरियाँ पैदा हुईं, जबकि 1999-2000 और 2003-04 के बीच 60 मिलियन नौकरियाँ पैदा हुईं। मोदी सरकार के आने के बाद जनवरी 2015 में श्रम मंत्रालय ने पहले सर्वे में यह पाया कि छह महीनों के दौरान ही आठ प्रमुख क्षेत्रों में 2.75 लाख नौकरियां पैदा हुईं। लेकिन अचानक हुई नोटबंदी के कारण कंपनियों ने बड़ी संख्या में अपने कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया।

अब यह देखना दिलचस्प होगा कि 2024 के चुनाव में जीतने वाला दल या दलों का गठबंधन भारत में रोजगार पैदा करने के लिए क्या करेगा। इंडिया गठबंधन भी अलग-अलग लाखों करोड़ों लोगों को नौकरी देने का वायदा कर रहा है। क्या केंद्र में इतनी सरकारी नौकरियों की गुंजाइश है, या वह भी एक पैंतरा ही चल रहा है, यह आनेवाला समय बतायेगा। एनडीए हो या इंडिया सबकी कहीं ना कहीं राज्यों में सरकारें हैं, यदि वे अपने अपने राज्यों में सरकारी नौकरी दे देते तो बेरोजगारी का इतना बड़ा राष्ट्रीय आंकड़ा खड़ा नहीं होता।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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